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आँधी के कॉंग्रेसी नेता नदीम खान पठान* ने कहा कि शब-ए-बारात के लिए इस्लाम में कहा जाता है कि इस रात को की जाने वाली हर जायज दुआ को अल्लाह जरूर कुबूल करते हैं. इस पूरी रात लोगों पर अल्लाह की रहमतें बरसती हैं.इसीलिए मुस्लिम समुदाय के लोग रात भर जागकर नमाज और कुरान पढ़ते हैं। इतना ही नहीं मुस्लिम समुदाय के लोग अपने पूर्वजों की कब्रों पर जाकर उनकी मगफिरत की दुआ करते हैं।
यह शब्द पठान ने जिक्र ए शब ए बारात पर कहे।
पठान ने कहा कि शब-ए-बारात की खास अहमियत है. इस्लामिक कैलेंडर के लिहाज से आठवां यानी शाबान के महीने की 15 वीं तारीख की रात में शब-ए-बारात मनाई जाती है, जिंदगी और मौत का सारा हिसाब-किताब शब – ए – बारात पर होता है। इसीलिए शब – ए – बारात इबादत, फजीलत, रहमत और मगफिरत की रात मानी जाती है। यह रात अल्लाह अपने बंदों के लिए एक नया मौका देता है कि वे अपने अतीत की गलतियों को सुधारें और नेक रास्ते पर चलें।
पठान ने कहा कि शब-ए-बारात शाम को मगरिब की अजान होने के साथ मुसलमान मनाना शुरू कर देते हैं। पूरी रात अल्लाह की इबादत करते हैं और दूसरे दिन को शाबान का रोजा रखते हैं। शब-ए-बारात अरबी भाषा का शब्द है जो दो शब्दों से मिलकर बना है. पहला शब है, जिसका अर्थ रात है जबकि ‘बरात’ के मायने क्षमा है। इस तरह से माफी की रात भी कही जा सकती है। इसीलिए लोग रात भर इबादत करते हैं और अल्लाह अपने बंदों की हर एक दुआ कुबूल करता है। इसी कारण इस रात हर कोई अपने गुनाहों की माफी मांगता है।
शब ए बारात पर घरों में रंग किया जाता है घरों को सजाया जाता है खुशबू लगाई जाती हैं अपने पूर्वजो की याद में विभिन्न प्रकार के हलवे बनाकर फ़ातेहा लगाई जाती है।