महिला दिवस की सार्थकता? : लता अग्रवाल

लेखिका : लता अग्रवाल
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)
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कल महिला दिवस अत्यंत धूमधाम से मनाया गया। जगह-जगह महिलाओं का सम्मान किया गया। क्या वर्ष में केवल मात्र एक दिन महिला दिवस मना लेने से या रक्षाबंधन और महिला दिवस पर मुफ्त की बस यात्रा करवाने से महिला दिवस की सार्थकता सफल हो जाती है?
भारतीय संस्कृति में नारी का महत्व देंगे। जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की और उनसे यह सृष्टि नहीं संभाली गई तो उन्होंने नारी के रूप में मां बना दी यानी की नारी को सृष्टि का सृजन करने व संभालने का दायित्व सौंप दिया। पुराणों में कहा गया कि जहां नारी की पूजा होती है वहां देवताओं का निवास होता है। हमारी भारतीय संस्कृति में नारी का कितना गरिमामय स्थान है।
नारी को ब्रह्मा जी ने कमंडल दिया, शिवजी ने अपना त्रिशूल दे दिया, अग्नि देव ने शक्ति दी, सागर ने कमल का फूल दिया, विष्णु जी ने अपना चक्र दिया, काल ने तलवार दी, इंद्र देव ने ब्रज दिया, विश्वकर्मा ने फरसा दिया, वायु ने धनुष और बाण दिया, सूर्य देव ने पूरे शरीर में तेज भर दिया, वरुण देव ने शंख दिया, सभी देवता ने माता को शक्ति स्वरूपा बना दिया।
क्या वर्तमान समय में समाज में नारी का गरिमा पूर्ण स्थान है? बचपन से ही हर जगह प्रताड़ित किया जाता है मां-बाप के घर में बचपन से रोक टोक शुरू हो जाती है। बात-बात पर सुनाया जाता है कि कल को ससुराल जाना है, मर्यादा में रहो, घर का काम सीखो। अगर नारी पढ़ लिखकर नौकरी करने जाती है तो कार्य स्थल पर पुरुष अधिकारियों द्वारा यौन उत्पीड़न किया जाता है। इससे आहत होकर कई बार तो महिलाएं नौकरी छोड़ने पर विवश हो जाती है। शादी करके ससुराल जाती है तो दहेज प्रताड़ना शुरू हो जाती है बात-बात पर मायके के ताने दिए जाते हैं। कितने दुख की बात है जो नारी सृष्टि का सृजन करती है वह अपने लिए एक घर निर्माण नहीं करवा सकती। उसका अपना कोई घर नहीं होता है। मायका भाई का घर होता है। ससुराल पति का घर होता है। पति के मरने के बाद बेटे का घर होता है। सदियों से चली आ रही इस अंतहीन पीड़ा का क्या कोई समाधान है?
सबसे मुख्य बात आए दिन सैकड़ो मासूम बच्चियों, नाबालिग लड़कियां, बुजुर्ग महिलाओं को दुष्कर्म का शिकार बनाया जा रहा है्। बलात्कारी को सजा देने में वर्षों गुजर जाते हैं क्या दुष्कर्म कांड में इतना समय लगता है कि उसको साबित करने में जिंदगी गुजर जाए। यह एक ऐसा कानून है कि पीड़िता को ही साबित करना होता है कि उसके साथ दुष्कर्म हुआ है। पुरुष को कुछ भी नहीं करना पड़ता। सबसे शर्मनाक बात तो यह है कि जब ट्रायल कोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष का वकील पीड़िता से ऐसे बेहूदे सवाल जवाब करता है कि पीड़िता को ऐसा लगता है मानो बलात्कार हुआ है। और ऐसा एक बार नहीं होता जब तक सुनवाई पूरी नहीं हो जाती यह दंश पीड़िता को हर बार झेलना पड़ता है।
क्या हमारे देश की न्यायपालिका और कार्यपालिका अंग्रेजों के बने हुए इस कानून में कोई बदलाव नहीं कर सकती। अंग्रेजों ने यह कानून इस प्रकार बनाए थे कि भारतीय महिलाओं का यौन शोषण कर सके और अपना बचाव कर सके। यह एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा है जो समस्त नारी जाति के अपमान से जुड़ा हुआ है। सरकार अपने वोट बैंक के लिए तो कोई भी कानून बदल सकती है पर इस कानून में कोई बदलाव नहीं कर सकती यह हमारे लिए कितने शर्म की बात है। पीड़ित मासूम बच्चियों अपनी जान गंवा देती हैं। कई लड़कियां आत्महत्या कर लेती है। कई महिलाएं आजीवन इस दंश को झेलती हैं। तो क्या मात्र एक दिन के लिए महिला दिवस मनाने का कोई औचित्य है? (लेखिका का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)

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