जंगल पेड़ों से नहीं झाड़ियों से बनता है – राम भरोस मीणा

लेखक : राम भरोस मीणा
प्रकृति प्रेमी व जाने माने पर्यावरणविदों है।
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जंगल पेड़ों, झाड़ियों, वनस्पतियों की संघनता से बनता है, पेड़ व झाड़ियां आपस में एक दुसरे से उलझे रहते हैं, जहां सभी प्रकार के वन्य जीव, पशु – पक्षी एक साथ निवास करते हैं, वन या जंगल कहें जातें है। जंगल को परिभाषित करते हुए ख़ास कर इन्हें ध्यान रखा जाता है, कि पेड़ पौधों के साथ वनस्पति झाड़ियों का प्रतिशत क्या है। सामान्यत 30 प्रतिशत पेड़ों के साथ 70 प्रतिशत झाड़ियां पाईं जाती रही है, जो वन्य जीवों की सुरक्षा के साथ शाहकारी जानवरों के भोजन का सन्तुलन कायम रखतीं हैं। जंगल वनस्पतियों झाड़ियों के अभाव में अपने आप में पूर्ण नहीं होता, बड़े पेड़ मात्र वन जैसे दिखाई दे सकते हैं, लेकिन जहां वनस्पतियों का अभाव है वहां वन्य जीवों की भूमिका नगण्य होती है, वन्य जीव नहीं होने पर वनों का विकास सम्भव नहीं हो सकता, यह कटू सत्य है।
वनों के महत्व उपयोगिता को आदिमानव ने हजारों वर्ष पूर्व समझ लिया था, उसे सरंक्षण दिया, विकास में सहायक बना, परिवार, कुटुम्ब को सहभागी बनाया , इसे अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझते हुए वृक्षों की पुजा- अर्चना करने, देवतुल्य मानने की पहल की। वृत उपवास, पुजा- पाठ, अनुष्ठानों में प्रथम स्थान दिया। उपयोग किया लेकिन विनाश नहीं। जीवन का आधार समझा, वनों के नजदीक रहकर भी वन्य जीवों के साथ मित्रवत व्यवहार किया, एक साथ रहा। वह सच्चा प्रकृति उपासक रहा। उसे मिट्टी, पानी, वायु, अग्नि, आकाश, पहाड़, सुर्य, चन्द्रमा में ईश्वर दिखाई देता, जों आज भी सनातनी परम्पराओं में देखने को मिलता है, प्रार्थना होती है।
व्यक्ति अपने बौद्धिक विकास के साथ परम्परागत ज्ञान से दूर चला गया, आधुनिक विज्ञान से अपने को श्रेष्ठ मानते हुए, हजारों वर्ष के अनुसंधानों, विचारों, अनुभवों से पनपते ज्ञान को भुल गया। उपयोगिता को भूलना प्रारम्भ कर दिया, स्वार्थी, लालची बन कर शोषण करने लगा। वन की परिभाषा से दुर हट, झाड़ियों को अनुपयोगी समझने लगा, विकास को प्रमुखता देते हुए वन भूमि से जंगल उजाड़ने के लिए पेड़ों की संख्या गिनना, आमजनों का ध्यान भटकाना, प्रचलन बन गया। राष्ट्रिय राजमार्ग निर्माण, नई रेल लाइन विस्तार, खदान आवंटन, शहरीकरण, बांधों के निर्माण या पश्चिम राजस्थान में सोलर पावर प्लांट जैसे किसी भी परियोजना में पेड़ों की संख्या गिनाते हुए नजर आते हैं, वनस्पतियों को भुला जाता है, या भुला दिया जाता है। राजस्थान में खेजड़ी के लाखों पेड़ काटे, हंस देव में जंगल उजाडे। अब हम चाहे सिंगरोली के घिरोली कोल ब्लाक, देव भूमि चारधाम यात्रा परियोजना, अंडमान निकोबार द्वीप में विकास परियोजनाओं, तेलंगाना में हाइवे चौड़ाई करण या गढ़चिरौली की बातें करें, एक लाख से दस मिलियन तक पैडों की बलि दी जा रही है। लेकिन वन्यजीवों के आवास छोटी झाड़ियों, मध्यम स्तरीय पेड़ों की संख्या, भू भाग का आंकलन नहीं किया जाता, जों बहुत बड़ी बेईमानी साबित होती है।
यह सत्य हैं, की सरकारें विकास के चलते वनों को शुभ से नहीं लाभ की दृष्टि से देखने लगी है। जंगलों में सुविधाएं ढूंढने लगी है।वन आर्थिक समृद्धि के श्रोत समझें जाने लगें हैं। नतिजन वन नष्ट होते चले जा रहे हैं, पहाड़ पाताल पहुंच गए हैं। 20 नवम्बर 2025 को अरावली की परिभाषा बदलने का सर्वोच्च न्यायालय का फैसला भी अरावली में लाभ ढूंढने वाला साबित होता दिखाई दे रहा था, जिसका पुरज़ोर विरोध हुआ, वापस लिया गया। राजस्थान में प्रस्तावित डूंगरी बांध का विरोध इसलिए तेज़ होने लगा, कि लोग शुभ को समझने लगे हैं। हमें वन में पेड़ नहीं वनस्पतियों को समझना होगा। वनस्पतियां इकोलॉजिकल सिस्टम को मजबूत बनाने में कामयाब हैं, मिट्टी में नमी बनातीं है, तापमान को नियंत्रित करतीं हैं, पोल्यूशन को कम करती है, मरुस्थल को बढ़ने से रोकती है, भूगर्भीय जल को बढ़ावा देती है, मिट्टी के कटाव को रोकतीं है, यही नहीं ये ग्रामीण आजिविका के श्रोत भी है। वनस्पतियां शुभ और लाभ दोनों हैं जो हमारे अनुकूल वातावरण बनाएं रखतीं हैं, जिनके बदोलत पशु पक्षियों वन्य जीवों को आश्रय मिलता है। अतः वनों के साथ वनस्पतियों के महत्व को समझते हुए उन्हें संरक्षण देने की आवश्यकता है, क्योंकि जंगल पेड़ों से नहीं झाड़ियों से तैयार होता है। लेखक के अपने निजी विचार है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)

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