केरल में हिन्दू एकता की सुगबुगाहट

लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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दक्षिण के प्रमुख राज्य केरल में आम तौर पर यह कहा जाता है कि राज्य में सामाजिक तथा राजनीतिक रूप से जितना मुस्लिम तथा ईसाई समुदाय संगठित है, उतना हिन्दू समुदाय नहीं . लेकिन पहली बार विधानसभा के चुनावों से कुछ पूर्व यहाँ “हिन्दू एकता” की सुगबुगाहट हो रही है . यह कहना गलत नहीं होगा कि इसका कुछ असर विधानसभा चुनावों में भी दिखेगा।
2011 की जनगणना अनुसार राज्य की आबादी लगभग 3.50 करोड़ है . इसमें हिन्दू आबादी लगभग 54 प्रतिशत है . मुस्लिम लगभग 27 तथा ईसाई मोटे तौर पर 19 प्रतिशत है .अगर पिछले कई चुनावों पर नज़र डाली जाये तो यह साफ़ दिखता है कि आम तौर पर ईसाई तथा मुस्लिमों के अधिकतर लोगों ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतान्त्रिक मोर्चे के पक्ष में वोट दिया . मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाले वाम लोकतान्त्रिक मोर्चे को भी इन समुदायों के वोट मिले लेकिन वह हिन्दू वोटों के बल पर ही सत्ता में आता रहा है . यहाँ बीजेपी के नेतृत्व वाला एन.डी.ए. है जरूर लेकिन इसका कोई बड़ा प्रभाव नहीं .2021 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी या इसके सहयोगी दलों को एक भी सीट नहीं मिली थी . हाँ , 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी का एक उम्मीदवार सुरेश गोपी , जो इस समय केंद्रीय मंत्री है , जीता था . राज्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की काफी उपस्थिति जरूर है लेकिन इसका लाभ बीजेपी को उतना नहीं मिला जितना यह पार्टी उम्मीद करती रही है . आम तौर संघ के सदस्यों को बीजेपी के पैदल फौज कहा जाता है।
राज्य में हिंदुयों के दो बड़े संगठन है . पहला है नायर सर्विस सोसाइटी . इसका आबादी में हिस्सा लगभग 13 प्रतिशत है . यह हिन्दुयों का उच्च वर्ग का संगठन है . इस समुदाय की आबादी भले ही कम हो लेकिन इसका सामाजिक तथा राजनीतिक प्रभाव बहुत अधिक है . हिंदुयों का सबसे बड़ा वर्ग एझावा है . यह राज्य का अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में आता है इनकी आबादी लगभग 23 प्रतिशत है. ये दोनों मिलकर हिन्दू समुदाय के बड़ा हिस्सा है . लेकिन ये दोनों समुदाय एक दूसरे के विरोधी रहे हैं . इसके चलते चुनावों में हिन्दू मतों का विभाजन होता रहा है . लगभग डेढ़ दशक पूर्व इन दोनों समुदायों को एक छत के नीचे लाये जाने का प्रयास किया गया था लेकिन यह सफल नहीं हो सका. हालाँकि अपने तौर पर दोनों ही समुदाय वाम मोर्चे की ओर झुकाव रखते है, इन दोनों समुदायों के नेताओं का कहना है कि जब भी राज्य में कांग्रेस नीत मोर्चे की सरकार बनी तो इसमें मुस्लिमों का दबदबा अधिक रहा . राज्य की मुस्लिम लीग कांग्रेस मोर्चे का हिस्सा है . आंकडे बताते है कि जब भी राज्य में कांग्रेस नीत मोर्चे की सरकार बनी तो अधिकतर मलाईदार पद मुस्लिम विधायकों को मिले. एझावा समुदाय के संगठन का नाम श्री नारायण परिपालना योगम है . इसके नेता नातेसन का दावा है कि कुल बजट का लगभग 61 प्रतिशत हिस्सा मुस्लिम विधायकों के पास रहता रहा है . कांग्रेस इसी इस तरह हिंदुयों को निराश करती रही है, नातेसन को मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नज़दीक माना जाता है . इनके बेटे तुषार ने भी अपना एक दल भारत धर्म जन सेना बना रखा है . सेना एन डी. ए. का हिस्सा है तथा तुषार राज्य में इसके संयोजक है।
पिछले दिनों नायर सर्विस सोसाइटी तथा श्री नारायण धर्म परिपालना योगम के नेताओं की एक बैठक हुई. इसमें एक बड़ा फैसला हुआ कि दोनों संगठन मिलकर हिन्दू एकता का अभियान चलाएंगे . अभी यह कहना कठिन है कि यह हिन्दू एकता होती भी है या नहीं . लेकिन इन दोनों संगठनों के नेताओं के बयानों से यह सन्देश जरूर गया है कई इस बार राज्य हिन्दू एक होकर किसी पार्टी का समर्थन कर सकते हैं . यह कहना गलत नहीं होगा कि इसका सीधा असर चुनावों के नतीजों पर पड़ेगा।
वाम मोर्चे के नेताओं को विश्वास है कि इसका लाभ सीधे तौर पर उनको मिलेगा क्योंकि हिन्दू मतों पहले जैसा विभाजन नहीं होगा. राज्य में पहले लोकसभा की एक सीट जीत कर और फिर स्थानीय निकायों और पंचायतों के चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करने के बाद बीजेपी के नेताओं आत्मविश्वास बढ़ गया है . पार्टी को इन चुनावों में 14 प्रतिशत मिले थे तथा राज्य में तीसरे बड़े दल के रूप में सामने आई थी . इन नेताओं को लग रहा है कि राज्य में हिन्दू एकता लाभ सबसे अधिक उनकी पार्टी को ही मिलेगा। (लेखक के अपने विचार हैं)

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