
30 मार्च राजस्थान स्थापना दिवस विशेष
लेखक : वेदव्यास
लेखक साहित्य मनीषी व वरिष्ठ पत्रकार हैं
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हमारे यहां साल में 364 दिन सरकार, बाजार और राजनीति की बात ही होती रहती है। महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और अपराध को लेकर ही मार-धाड़ बनी रहती है। क्योंकि, इधर गरीबों की पांच पीढ़ियां कर्ज में हैं, तो उधर पैसे वालों की सात पीढ़ियों की पांचों अंगुलियां घी में है। लेकिन, हमारा राजस्थान देश अन्य सभी प्रदेशों से हटकर है, क्योंकि यहां अकाल और अभाव से आगे बढ़कर केवल जात-पांत की चर्चा ही चौपाल पर बैठी रहती है। कोई हमें गुजरात जैसा बनने की प्रेरणा देता है, तो कोई हमें उत्तर प्रदेश जैसा पिछड़ा राज्य बताता है, तो कोई हमें हरियाणा और मध्य प्रदेश की तरफ झांकने को कहता है। बहरहाल! इस राजस्थान से कभी कोई यह नहीं कहता कि-तुम अपने भीतर तो झांको।
ऐसे में, राजस्थान का मूल संकट आज यह है कि वह आत्मगौरव से विमुख है और सामाजिक-आर्थिक असमानता के दलदल में सिर से पैर तक धंसा हुआ है। 30 मार्च को ‘राजस्थान दिवस‘ है। किंतु, चारों तरफ राजस्थान के सांस्कृतिक वैभव को लेकर घनघोर अंधेरा दिखाई दे रहा है। संत, सती और सूरमाओं का कहीं कोई नामलेवा ही नहीं है। राजस्थान अपनी स्थापना (30 मार्च, 1949) के 77 साल बाद भी आत्मगौरव से वंचित है, क्योंकि भाषा, साहित्य और कला-संगीत के सभी रास्तों पर राजनीति और विकास का अजगर बैठा हुआ है। आत्मगौरव का लोकतंत्र सचमुच इतना उदास है कि राजस्थान की स्थापना का उल्लास मन और विचार से ओझल है। आत्मगौरव को भूलने का ही राजस्थान में आज यह परिणाम है कि प्रदेश के सभी 22 सांस्कृतिक प्रतिष्ठान अनाथालय में बदल गए हैं, पशु मेले भी पर्यटन और मनोरंजन स्थलों में तब्दील हो गए हैं, तो महल, हवेलियों और किलों में होटल, मोटल और रिसोर्ट खुल गए हैं। मांगणियार लंगों और कालबेलियों के नृत्य-संगीत सभी तरफ बारात के बैण्ड-बाजों की तरह चल रहे हैं। एक ऐसी पराभव की मानसिकता का शिकार हुए राजस्थान का कुछ ऐसा हाल बन गया है कि लेखक, कलाकार, गायक, नर्तक, हस्तशिल्पी और संस्कृतिकर्मी-खम्माघणी अन्नदाता की चौखट से बाहर ही नहीं आ पा रहे हैं। यहां तक कि, प्रदेश के किसी भी एक विश्वविद्यालय में राजस्थान की भाषा, साहित्य और संस्कृति पर केंद्रित कोई अध्ययन और अनुसंधान तक नहीं हो रहा है, जबकि खेत, खून और पसीना तथा धरती और पहाड़-सभी यहां संपन्न है।

हम कई बार ऐसा सोचते हैं कि आखिर राजस्थानी भाषा की दो हजार वर्ष की सृजनात्मक संपन्नता में क्या कमी है, जो इसे संविधान की भाषाई मान्यता नहीं दी जाती है? हमें आश्चर्य होता है कि यह सरकार संरक्षण और विकास के नाम पर रजवाड़ों के महल और किलों की तो सुरक्षा और चिंता करती है, लेकिन लोक संस्कृति और लोक संगीत तथा लोक कलाओं को प्रोत्साहन और संरक्षण देने की इच्छा क्यों नहीं रखती?
आज राजस्थान में पिछले 77 साल के विकास की मुख्यधारा में मीरांबाई, दादूदयाल और ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती तक का योगदान कहीं क्यों नहीं सुनाई पड़ता? यहां तक कि करोड़ों प्रवासी राजस्थानी भी अपनी आर्थिक-सामाजिक ताकत के बाद भी राजस्थान के आत्मगौरव की बात कभी अपनी भाषा-संस्कृति के लिए क्यों नहीं करते? जब बंगाल के रवींद्रनाथ टैगोर भी राजस्थान की संस्कृति और संघर्ष से अभीभूत हो सकते है, और गुजराती समाज भी मीरांबाई का मुरीद बन सकता है, तो फिर हम अपने राजस्थान के हवा-पानी, रेत-खेत की रंगत-और अकाल और भूख-प्यास के लोकजीवन से अनुप्राणित संगत लेकर केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, असम, पंजाब जैसे राज्यों से भाषा और संस्कृति का आत्मगौरव क्यों नहीं सीख सकते? बस, इतिहास की यह विडंबना है कि राजस्थान में एक भी सामाजिक सुधार, राष्ट्रनिर्माण और ज्ञान-विज्ञान के विकास का आंदोलन और अभियान नहीं पैदा हुआ है तथा हमें जगाने विवेकानंद, दयानंद सरस्वती और दादूदयाल आदि सभी यहां बाहरी प्रदेशों से आए हैं।

हमें कभी तो सोचना चाहिए कि राजस्थान में ऐसी कौन-कौन सी कमी है, जो हम सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में लगातार पिछड़े हुए हैं तथा एक पिछलग्गू राज्य की श्रेणी में खड़े हैं? हमारा ऐसा मानना है कि हम आजादी के बाद भी जाति-धर्म की आस्थाओं में अधिक उलझे हुए हैं और जिस भाषा और संस्कृति को दिन-रात ओढ़ते-बिछाते है, उसके महत्व और मान-सम्मान को पूरी तरह भूल गए हैं। यही कारण है कि हमें आज विजयसिंह पाथिक, गोविंद गुरु और केसरीसिंह बारहठ की तीन बलिदानी पीढ़ियों की याद तक नहीं है। हम यह भी नहीं जानते कि-आंधे का तन्दूरा, बाबा रामदेव (रामसा पीर) क्यों बजा रहे है और पाबूजी, हड़बूजी और वीर तेजाजी की लोक प्रेरणाएं गांव और चौपाल पर आज भी कैसे जीवित है? सदियों से अकाल, दूकाल और त्रिकाल की प्यास लेकर भी जो समाज आज विकास की हर दौड़ में भाग ले रहा है, वह भला आत्मगौरव की भाषा और जीवनशैली कैसे भूल गया है? मुझे हर बार ‘राजस्थान दिवस‘ पर यह कुछ सवाल परेशान करते हैं। आपको याद करना चाहिए कि राजस्थान जैसा सांप्रदायिक सद्भाव, सहिष्णुता, मेहनतकश जीवन, भामाशाही चेतना और घर-घर हल्दीघाटी जैसा आदर्श, आज भारत के किसी दूसरे राज्य में नहीं है। राजस्थान का यही तो दुर्भाग्य है कि वह पड़ोसी की बारात में जाकर भी खुद के कुंवारे बेटे-बेटियों को भूल जाता है। पुरातन को भूल जाना और नूतन विकास में पिछड़ जाना ही इस आत्मगौरव की व्यथा-कथा है और हम जब तक इस हीनता से बाहर नहीं आएंगे, तब तक केवल राजनीति के भरोसे ही रहना हमारे लिए नुकसानदायक है। (लेखक के अपने विचार हैं)