
14 अप्रैल डॉ. अंबेडकर जयंती पर विशेष
लेखक : वेदव्यास
लेखक साहित्य मनीषी व वरिष्ठ पत्रकार हैं
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भारत इस दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है इसीलिए यहां लोक की अपनी अलग कहानी है और तंत्र की अपनी कहानी है। यहां लोक ने परलोक के, ईमानदार ने भ्रष्टाचार के, पाप ने पुण्य के, भिखारी ने दाता बनने के, राजा ने भाग्यविधाता होने के, नर ने नारायण तक जाने के और नरक से स्वर्ग तक जाने के सारे रास्ते बना रखे हैं। यहां कोई किसी के भरोसे नहीं है। सभी अपने-अपने कर्म कर रहे हैं और अपने-अपने भाग्य की कमाई खा रहे हैं। सभी स्वतंत्र हैं और सभी गुलाम हैं। समय से पहले और भाग्य से अधिक यहां किसी को कुछ नहीं मिलता है। पूरा लोक ही भय, भाग्य और भगवान से संचालित है। हजारों साल से हम ही इस लोक के निर्भाता हैं और हम ही इसके मुक्तिदाता हैं।
इस तरह यह भारतीय समाज भी हमारे भले-बुरे का प्रतिफल ही है। यह लोकतंत्र का ही सबसे बड़ा तिलिस्म है कि यहां हजारों साल की गुलामी, सैकड़ों साल के स्वतंत्रता संग्राम और लाखों समस्याएं देख-समझ कर भी लोक और तंत्र का शीतयुद्ध किसी एक लक्ष्य और संकल्प को तय नहीं कर पाया है।
1947 तक हमारा एक ही ध्येय वाक्य था कि आजादी हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे लेकिन आजादी के बाद जिस भारत के संविधान को लेकर हम राष्ट्र निर्माण की राह पर चल रहे हैं उसका कुल नतीजा यह मिला है कि विकास और परिवर्तन के नाम पर तो हमने बहुत कुछ पाया है किंतु राष्ट्र चरित्र के नाम पर हमने सब कुछ खो दिया हैं। इसे इतिहास-भूगोल, ज्ञान-विज्ञान, भक्ति -आध्यात्मिक और भूत भविष्य तो मिला है लेकिन इसके पास कोई वर्तमान नहीं है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने पहली बार 1948 में संविधान सभा के नेतृत्व में इस भारतीय लोकतंत्र की दशा, दिशा और संभावनाओं का परिसीमन स्थापित किया था और इस लोकतंत्र को गणतंत्र का नाम दिया था और सामाजिक-आर्थिक न्याय की सभी परिभाषाएं दी थीं। इस भारत को एक लोकतांत्रिक, समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष पहचान दी थी और बंकिमचंद्र चटर्जी के ‘वंदेमातरम’ राष्ट्रगीत से और रविंद्रनाथ टैगोर के ‘जन-गण-मन अधिनायक जय हे’ के राष्ट्रगान से सुशोभित किया था। तब हमारा पहला लक्ष्य यह था कि भारत एक आजाद मुल्क बने और फिर दूसरा संकल्प संविधान से यह मिला कि भारत का समाज धर्म, जाति, भाषा तथा क्षेत्रीयता की भावनाओं से मुक्त होकर एक हृदय हो भारत जननी का उद्घोष करे। वह एक राष्ट्र, एक संविधान, एक तिरंगा, एक विधायिका, एक कार्यपालिका और एक न्यायपालिका से संचालित एवं निर्देशित हो। इसका एक ध्येय वाक्य भी रहा कि- सत्यमेव जयते।

डॉ. अंबेडकर ने और हमारे संविधान सभा ने भारत के लोकतंत्र को मनुष्य, समाज और समय का वह सब कुछ लिखकर सौंप दिया लेकिन आज हम अपने लोक में तंत्र (व्यवस्था) का अनहदनाद ही सुनते हैं तो हमें लगता है कि महात्मा गांधी ही अब यहां सबसे अधिक उपेक्षित हैं और अंबेडकर सबसे अधिक प्रताड़ित हैं। भगतसिंह ही सबसे अधिक विस्मृत हैं, सुभाष चंद्र बोस ही सबसे अधिक अल्पज्ञात हैं और पूरा सूफी समाज तथा भक्ति काल भी समाज सुधारक संत परंपरा ही शिक्षा और सामाजिक संस्कृति के पाठ्यक्रम से बाहर है। महात्मा गांधी के बताए ‘सात सामाजिक पाप’ के अनुसार आजाद भारत की सबसे बड़ा आश्चर्यलोक तो अब यह है कि-(1) सिद्धांतविहीन राजनीति ने (2) श्रमविहीन संपत्ति ने (3) विवेक विहीन भोग विलास ने (4) चरित्रविहीन शिक्षा ने (5) नैतिकता विहीन व्यापार ने (6) मानवीयता विहीन विज्ञान ने (7) और त्यागविहीन पूजा ने ही भारतीय संविधान के सभी लक्ष्य और उद्देश्यों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है।
हमारे लोक सेवक की आज सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक भ्रष्टाचार की ऐसी मशाल और मिसाल बन गए हैं कि हर और साहूकार ने अपने-अपने राष्ट्रनायक, धर्मगुरु, जाति गौरव, भाषा पुरुष तथा क्षेत्रीय खलनायक ढूंढ लिए हैं। साधु- सन्यासी, मुल्ला-मौलवी, ग्रंथि-पादरी सभी लोकतंत्र की वैतरणी को पार करने के लिए अब चुनावी दल बनकर काले धन का खजाना ढूंढ रहे हैं। अब किसी को महात्मा गांधी और अन्ना हजारे में और बाबा साहब अंबेडकर और बाबा रामदेव में कोई अंतर समझ में नहीं आ रहा है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर, ज्योतिबा फुले, शिवाजी, महाराणा प्रताप, करणीमाता, देवनारायण, मीनमाता, तेजाजी जैसे हजारों कीर्ति-नायकों को हमने अपनी-अपनी जातियों के मौत के कुंए में धकेल दिया है और एक संविधान को भुलाकर जाति-संप्रदाय के अनगिनत संविधान चला दिए हैं। यही कारण है कि समता, न्याय और शांति के संविधान की जगह भारत के लोकतंत्र में आतंकवाद , पृथकतावाद और उग्रवाद के नारे हिंसा और असत्य के चुनावी दंगल कर रहे हैं। तंत्र (राज्य की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था) की सूखे और उजाड़ कुएं में केवल मेंढक और कबूतर ही बोल रहे हैं तथा संत-बाबा और महात्माओं का भी यह सरकारीकरण हो गया है। भारत के संविधान को सूचना के तंत्र ने पूंजी और प्रचार के ऐसे यंत्र में बदल दिया है कि सच को जानने में ही पीढ़ियां तबाह हो जाती हैं।
आज डॉ. अंबेडकर को जब हम उनके संविधान के तय संकल्पों के साथ पढ़ते हैं तो हमें पता चलता है कि अब भारत का कोई अपना एक राष्ट्रीय लक्ष्य और राष्ट्रीय गौरव तथा राष्ट्रीय चरित्र ही शेष नहीं बचा है और यही कारण है कि 140 करोड़ देवी- देवताओं का यह लोकतंत्र आज 20 रुपए में ही अपनी गुजर-बसर कर रहा है।
अतः समय की चक्की में यह लोकतंत्र कुछ इस तरह पिस रहा है कि सत्य के प्रयोग करना हम भूल गए हैं और विचार और उद्देश्यों का भी आमूल-चूल राजनीतिकरण और बाजारीकरण हो गया है।अशांति से अशांति और अन्याय से अन्याय के नित नए संविधान जन्म ले रहे हैं। ऐसे में भीमराव अंबेडकर, भगतसिंह और महात्मा गांधी का जनसंघर्ष आज भी जारी है और शहीदों की चिताओं पर दुकानदारों के मेले और महोत्सवों की तैयारी है। ऐसे सामाजिक-आर्थिक असमानता से पीड़ित भारत में आज यदि अंबेडकर जीवित होते तो वह क्या करते ? यही सवाल मैं भी उनके संविधान में ही खोज रहा हूं। (लेखक के अपने विचार हैं)