
कविता
लेखक : राम भरोस मीणा, पर्यावरणविद्
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एक मुसाफिर तैरें लिए घूम रहा, एक जीवन में खुशीयों कों ढूंढ रहा।
एक तलाश में डुब रहा, एक आस में सूख रहा, आखिर बनें किसके हों जरा यह तो बता, जरा यह तो बता।।
एक तुझे ख़ुश करने में जीवन गंवा रहा, एक ख़ुश नसीब समझ जीवन खपा रहा।
एक को ना गुलाब बन आनन्द दिया, एक कों ना फूलों जैसा आभास होने दिया, ज़रा यह तो बता….।।
एक उठ सुबह सलाम करें, एक सलामती की बात करें।
एक तलाश तुझसे अरमानों की करें, एक तेरे ख्वाबों की तलाश करें, ज़रा यह तो बता…..।।
मिट्टी से बना यह पूतला, मिट्टी से बना वह पूतला।
मिट्टी में खपा होने तक साथ देना, इसने भी कहां उसने भी कहा, ज़रा यह तो बता….।।
जिंदगी में यह भी तरस रहा, वो भी तरस रहा।
ना तूने इसे खूश किया,ना उसे खूश किया, बस हर क़दम अफसोस में डूबा दिया, आखिर हों किसके ज़रा यह तो बता, जरा यह तो बता।।