जैव विविधता के भयावह संकट से जूझता देश — ज्ञानेन्द्र रावत

लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
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आज देश में जैव विविधता का संकट गहराने लगा है। देश में जैव विविधता की बदहाल स्थिति का अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि तेजी से बढ़ता प्रदूषण, भयावह स्तर तक बढ़ता शहरीकरण और अनियोजित अनियंत्रित विकास के चलते देश के गोवा, केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों में 90 फीसदी तक जैव विविधता समाप्ति की ओर है, इसे यदि यूं कहें कि वह नष्ट हो चुकी ही तो कुछ गलत नहीं होगा। उत्तर पूर्व ही नहीं देश के अधिकांश राज्यों में जंगलों की अंधाधुंध कटाई से तापमान में बेतहाशा बढ़ोतरी का संकट भयावह रूप ले चुका है और हिम तेंदुए जैसे अनेकानेक हिमालयी जीव संकट के कगार पर हैं। सुंदर वन में मैंग्रोव वन खतरे में हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि बढ़ता तापमान जैव विविधता के लिए बहुत बड़ा खतरा है। यदि तापमान वृद्धि की दर इसी तरह बरकरार रही तो इसके चलते प्रवाल भित्तियां जो जैव विविधता के आकर्षण का प्रमुख केंद्र हैं, इस सदी के आखिर तक खो जायेंगीं। जैव विविधता की हानि के चलते विभिन्न प्रजातियों के विलोपन का खतरा तो सर्वव्यापी है ही, पर्यावरणीय गिरावट में जिस तेजी से बढ़ोतरी हो रही है, उसकी भरपाई मुश्किल है। इसके लिए मानवीय गतिविधियों के हस्तक्षेप को नकारा नहीं जा सकता जिसकी वैश्विक स्तर पर विलोपन में अहम भूमिका है। असलियत यह है कि जैव विविधता की मानव अस्तित्व, उसके स्वास्थ्य और आर्थिक विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। यह हमें भोजन, साफ पानी, जीवनदायी साफ हवा जिसे हम आक्सीजन कहते हैं और जीवन बचाने में कारगर दवायें प्रदान करती है। वहीं पारिस्थितिकीय तंत्र को संतुलित कर विनाशकारी बाढ़, कीटों और जलवायु परिवर्तन से भी सुरक्षा प्रदान करती है। इसे यदि यूं कहा जाये कि यह हमारे जीवन का आधार है और यह धरती की जीवन रक्षक प्रणाली है, तो कुछ गलत नहीं होगा।
देखा जाये तो भारत की दुनिया के 17 सबसे अधिक जैव विविधता वाले देशों में गिनती होती है। यहां दुनिया के कुल 2.4 फीसदी भूभाग होने के बावजूद वनस्पतियों और जीवों की लगभग 8 फीसदी प्रजातियां पायी जाती हैं। देश के 10 प्रमुख जैव भौगौलिक क्षेत्र यथा वर्षावन, रेगिस्तान, मैंग्रोव और प्रवाल भित्तियों वाले इलाकों में विशेषकर पश्चिमी घाट और उत्तर-पूर्वी भारत में कुछ खास किस्म की विशिष्ट प्रजातियां पायी जाती हैं जो दुनिया में कहीं और नहीं मिलतीं। इनमें जो सबसे बड़ी विशेषता है वह यह कि इनमें 96,000 से अधिक प्रजातियों के जीव- जंतु और 47,000 से अधिक पौधों की प्रजातियां शामिल हैं। यहां हिमालय, पश्चिमी घाट, भारत-बर्मा और सुंडालैंड को मिलाकर चार प्रमुख जैव विविधता के हाटस्पाट हैं। जहांतक जैव विविधता के स्थायित्व में पेड़ों और जंगलों की भूमिका का सवाल है, ये जैव विविधता को बनाये रखने में आधारभूत भूमिका निबाहते हैं जो धरती की 90 से भी ज्यादातर स्थलीय प्रजातियों को भोजन और आश्रय प्रदान करते हैं। यही नहीं ये प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से कार्बन डाई आक्साइड को अवशोषित कर जलवायु को नियंत्रित करते हैं। इससे तापमान कम रहता है और ग्रीनहाउस गैसें नियंत्रित होती हैं। ये विभिन्न प्रजातियों के लिए जरूरी पारिस्थितिकीय तंत्र के रूप में कार्य करते हैं। वे पारिस्थितिकीय तंत्र को स्वस्थ बनाये रखते हैं जो जीवन की जटिल श्रृंखला को जीवित रखने के लिए बेहद जरूरी है। ये अपनी जड़ों से मिट्टी को थामे रखते हैं जिससे मृदा अपरदन रुकता है और पानी का प्राकृतिक फिल्टर बना रहता है। लेकिन आज जैव विविधता के आधार कहे जाने वाले पेड़ों और जंगलों के अस्तित्व पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। इसमें शहरीकरण, कृषि विस्तार, बुनियादी ढांचागत विकास, भौतिक सुख-संसाधनों की अंधी दौड़ , वन्यजीवों का अवैध शिकार, जलवायु परिवर्तन, नदियों व तटीय इलाकों में बढ़ते प्रदूषण और तापमान की बढ़ोतरी के चलते प्रजातियों के पलायन की अहम भूमिका है जिसने हमारी समृद्ध जैव विविधता को विनाश के मुहाने पर लाकर खड़ा कर दिया है।
हम दावा भले करें लेकिन हकीकत यह है कि हमने विकास के नामपर पेड़ों और जंगलों का इस तरह बेतहाशा सफाया किया है जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। दुनिया के वैज्ञानिक बार-बार कह रहे हैं कि इंसान जैव विविधता के खात्मे पर आमादा है। अब तो वह समृद्ध जैव विविधता वाली भूमि कब्जाने में लगा है। 87 फीसदी जैव विविधता से समृद्ध भूमि पर कब्जे की होड इसका सबूत है। गौरतलब है कि जैव विविधता का संरक्षण ही हमें बीमारियों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निबाहता है। यदि जैव विविधता के ह्रास में बढोतरी हुयी तो जानलेवा बीमारियां भी बढेंगीं।इसीलिए जैव विविधता का संरक्षण बेहद जरूरी है। यहां इस कटु सत्य को नकारा नहीं जा सकता कि यदि पेडो़ं और जंगलों की कटाई पर अंकुश नहीं लगा तो प्रकृति की लय बिगड़ जायेगी और उस स्थिति में वैश्विक स्तर पर तापमान में दो डिग्री की बढो़तरी को रोक पाना बहुत मुश्किल हो जायेगा। ऐसी स्थिति में सूखा और स्वास्थ्य सम्बंधी जोखिम से आर्थिक हालात और भी प्रभावित होंगे जिसकी भरपायी आसान नहीं होगी।
देश में पेड़ों की कटाई के बारे में यदि सिलसिलेवार जायजा लें तो हालात की भयावहता का सहज अंदाजा लग जाता है । देवभूमि के नाम से विख्यात उत्तराखंड में राज्य निर्माण के बाद से विकास के नामपर देवदार, बांज, बुरांश, खरसू, मौरूं, फर, कैल, मुरैंडा प्रजाति के छोटे – बड़े लगभग 10 लाख हरे पेड़ काट दिये गये। बीते 8-9 बरसों के दौरान ढाई लाख से ज्यादा पेड़ काट दिये गये हैं। इनमें एक लाख से ज्यादा पेड़ आल वैदर रोड के नाम पर और शेष पर्यटन, देहरादून से लेकर दिल्ली तक सड़क चौडी़करण, ऋषिकेश – कर्णप्रयाग रेल परियोजना व सुरंग आधारित परियोजना आदि के नाम पर देवदार, बांज, राई, कैल और चीड जैसी दुर्लभ प्रजातियों का तो अस्तित्व ही मिटा दिया गया। हर साल वाणिज्यिक प्रयोग के नाम पर सरकार 3 से 4 लाख पेड़ कटवाती है जिनमें सबसे ज्यादा राई, कैल, देवदार और चीड के पेड शामिल हैं।यह कहना है हिमालयी शिक्षण संस्थान, मातली, उत्तरकाशी के प्रमुख, सामाजिक कार्यकर्ता व पर्यावरणविद सुरेश भाई का। इससे भूस्खलन, बाढ का खतरा मंडरा रहा है। उनके अनुसार आने वाले बरसों में विकास योजना के नाम पर 5 हजार ऊंचाई फीट से 8.5 हजार फीट ऊंचाई के जंगल के लगभग 3 लाख शंकुधारी प्रजाति के पेड़ों के काटे जाने का खतरा है। मध्य प्रदेश में नयी रेल लाइन के लिए 1.24 लाख से अधिक पेड़ काटे जाने हैं। सिंगरौली में कोयले की भूख के चलते घिराली कोल ब्लाक में जंगलों का सफाया कर दिया गया है। यहां हजारों हरे-भरे पेड़ काट डाले गये हैं। महाराष्ट्र के गढचिरौली में खनन व सड़क परिवहन योजनाओं के नामपर जंगल सिमटते जा रहे हैं। वन्य जीव भटक रहे हैं। जलस्रोत सूख गये हैं।क्षेत्र वासियों की आजीविका का संकट पैदा हो गया है। गुस्साये ग्रामीण परियोजना बंद करने की मांग कर रहे हैं। कर्नाटक में हाल के वर्षों में लगभग 3 लाख से ज्यादा हरे- भरे पेड़ों को विभिन्न योजनाओं के नाम पर काट दिया गया है। तेलंगाना में हाई वे चौडी़करण के नाम पर हजारों हरे – भरे पेड़ों को काटा जा रहा है। इससे शहरों में गर्मी बढ़ेगी, प्रदूषण बढ़ेगा, बारिश कम होगी और हवा जहरीली होगी। अंडमान निकोबार द्वीप समूह में ग्रेट निकोबार विकास परियोजना के नाम पर 130 किलोमीटर के दायरे में 1 मिलियन से लेकर 10 मिलियन तक पेड़ों को काटे जाने की योजना है। झारखंड में कारो ओपन कास्ट परियोजना के लिए लगभग 35 हजार पेड़ों की कटाई की मंजूरी मिलने से पर्यावरण संतुलन, वन्यजीव आवास और स्थानीय जीवन पर गहरा संकट खड़ा हो गया है।
यदि यू के स्थित साइट यूटिलिटी बिडर की नयी रिपोर्ट की मानें तो भारत ने बीते 30 वर्षों में जंगलों की कटाई में भारी बढो़तरी हुयी है। इसमें 2015 से 2020 के इन पांच वर्षों के दौरान तो जंगल कटाई ने कीर्तिमान बनाया है। इस दौरान देश में 6,68,400 हैक्टेयर वनों का खात्मा हुआ। यह आंकडा़ दुनिया में ब्राजील के बाद दूसरा सबसे अधिक है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 1990-2020 के बीच के तीस वर्षों में 42 करोड़ हैक्टेयर जंगलों का खात्मा हुआ है। भले इसके वह प्राकृतिक कारण हों या मानवीय। देश में खनन, सड़क, उद्योग के नाम पर साल 2014 से लेकर 2019 तक एक करोड नौ लाख पचहत्तर हजार आठ सौ चवालीस पेड़ काटे गये । आंकड़ों की मानें तो इस दौरान 20 गुणा से ज्यादा जंगल विकास यज्ञ की समिधा बने हैं।तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल इस मामले में सर्वाधिक प्रभावित राज्य हैं। हकीकत यह है कि हर साल तकरीबन 22 लाख से ज्यादा पेड़ों की बलि विकास यज्ञ में दी जा रही है। देश के 15 राज्यों में पहाड़ियों का खनन विकराल रूप से जारी है। चारागाहों पर बढ़ते मानवीय दखल, दुरुपयोग, शहरों के विस्तार, जनसंख्या वृध्दि, बढ़ती खाद्य और ईंधन की मांग और जलवायु परिवर्तन ने संकट खड़ा कर दिया है। चारागाहों की 12.1 करोड़ हैक्टेयर जमीन बेकार होने से पालतू और वन्यजीव के सामने अपना पेट भरने की समस्या पैदा हो गयी है। जहांतक पक्षियों की प्रजातियों का सवाल है, उनका समय पर उचित संरक्षण न होने का परिणाम यह है कि पक्षियों की दुर्लभ 25 प्रजातियां खत्म होने के कगार पर हैं। बीते पांच-छह सालों में देश से नीम, महुआ, जामुन, शीशम सहित लगभग 53 लाख छायादार पेडो़ं का खात्मा हो गया है। इसके पीछे धान की पैदावार बढ़ाने की किसानों की लालसा है जो इन्हें बाधा मानकर तेजी से साफ कर रहे हैं। सच्चाई तो यह है कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु में मुख्यत: खनन, वनोन्मूलन और कृषि विस्तार से, असम, अरुणाचल और मेघालय में अवैध शिकार के चलते आर्किड, बांस और दुर्लभ प्रजातियों की तादाद कम हो रही है। तटीय राज्यों में खासकर ओडीसा और गुजरात में तटीय विनाश और औद्योगिक विकास के चलते समुद्री जीवन जैसे कछुए और मैंग्रोव वनों पर खतरा मंडरा रहा है। कीट-पतंगोंके जोड़े बढ़ती गर्मी के चलते न केवल बिछड रहे हैं बल्कि मौसम उनके मिलन में बाधा पैदा कर रहा है। अब तो बाहरी जीवों की आक्रामक प्रजातियों के एक जगह से दूसरी जगह पर घुसपैठ से भी जैव विविधता को नुकसान पहुंच रहा है। आईपीएबी की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। इस तरह की प्रजातियां पर्यावरण, अर्थ व्यवस्था और मानव स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचा सकती है।
देखा जाये तो जल, जंगल और जमीन के मुद्दे आपस में गहरे तक जुड़े हुए हैं। प्राकृतिक संसाधनों का उचित प्रबंधन आज की सबसे बड़ी जरूरत है। तभी सामुदायिक प्रयासों को प्रोत्साहित कर धरती और जैव विविधता को बचाया जा सकता है। (लेखक के अपने विचार हैं)

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