ज़ाकिर खान की जन्मभूमि टोंक से जुड़ी हुई

ज़ाकिर खान की जन्मभूमि टोंक रियासत से जुड़ी हुई
जिसका सबूत है शिजरा

ऐतिहासिक क्लासिक ड्रामा
“नवाबी नगरी टोंक के रमज़ान”
(रमज़ान के साये में रियासत टोंक की दास्तान)
लेखक: प्रोफ़ेसर सैयद सादिक़ अली।
मुख्य किरदार:
नवाब अमीरुद्दौला:रियासत के संस्थापक।
नवाब वज़ीरुद्दौला:रियासत के दूसरे नवाब।
अहमद अली– इंचार्ज तोपख़ाना, रियासत टोंक
मुहम्मद अली – अहमद अली के बेटे,
रियासत के तोप खाना इंचार्ज
सैयद अली – मुहम्मद अली के बेटे।
क़ाज़ी साहब।
पंडित हरिदत्त।
फ़ौजी, सिपाही।
शहर के लोग।
पहला अंक
दृश्य 1 – टोंक क़िला, रमज़ान की पहली शाम
(मंच पर क़िले की प्राचीर। पीछे ढलता सूरज। तोप तैयार है।अहमद अली खड़े हैं, गंभीर, अनुशासित।)
अहमद अली (सिपाहियों से):
होशियार रहना… यह तोप रूहानियत से गरजती है बारूद से नहीं …
यह टोंक की रूह की आवाज़ है।
जब यह गूंजे, तो समझो पूरा शहर एक साथ इफ़्तार करता है।
(दूर से अज़ान की धीमी आवाज़।)
सिपाही:
हुज़ूर, नवाब अमीरुद्दौला तशरीफ़ ला रहे हैं।
(नवाब अमीरुद्दौला प्रवेश करते हैं। शाही गरिमा, मगर चेहरा नरम।)
नवाब अमीरुद्दौला:
अहमद अली… सब इंतज़ाम मुकम्मल हैं?
अहमद अली (सलाम करते हुए):
हुज़ूर, वक़्त की पाबंदी मेरी ज़िम्मेदारी है।
मैं हमेशा आपके हुक्म और वक़्त का पाबंद पहले भी रहा हूं
और आगे भी पाबंदी वैसे ही रहेगी।
तोप की आवाज़ शहर को जोड़ती है… बाँटती नहीं।
नवाब (मुस्कराकर):
यही तो टोंक की असल ताक़त है।
(तोप दाग़ी जाती है। गूंज। रोशनी फैलती है।)
दूसरा अंक
दृश्य 2 – बाज़ार और मोहल्ला
(दुकानों पर परदे। इफ़्तार की तैयारी। हिंदू-मुस्लिम एक साथ।)
पंडित हरिदत्त (फल की टोकरी और इफ़्तारी का ख़्वान रखते हुए):
लो भई, रोज़ेदारों के लिए केला और तरबूज़ रख दो।चने और इफ़्तारी के साथ साथ खजूर और शरबत भी रखिए।
रमज़ान में नेकी का मौक़ा हाथ से नहीं जाने देना चाहिए।
क़ाज़ी साहब:
पंडित जी, आपकी यह मोहब्बत ही टोंक की पहचान है।
पंडित (हँसकर):
क़ाज़ी साहब, यहाँ मंदिर की घंटी और मस्जिद की अज़ान
एक ही आसमान के नीचे गूंजा करती हैं।
(दूर से फिर तोप की हल्की गूंज। बच्चे ख़ुश।)
तीसरा अंक
दृश्य 3 – दरबार-ए-आम
(नवाब वज़ीरुद्दौला का दौर – दरबार सजा है।)
नवाब वज़ीरुद्दौला:
हुकूमत तलवार से चल सकती है,
मगर टिकती इंसाफ़ से है।
हमारी रियासत में मज़हब किसी पर ज़ुल्म का बहाना नहीं बनेगा।
दरबारी:
हुज़ूर, अंग्रेज़ हुक्मरान रियासतों को अपने कब्ज़े में ले रहे हैं।
नवाब वज़ीरुद्दौला (दृढ़ स्वर में):
टोंक की सरज़मीन अमानत है।
जब तक यहाँ इंसाफ़ और अमन रहेगा,
कोई ताक़त इसे झुका नहीं सकती।
(रोशनी बदलती है। नवाब मुहम्मद अली ख़ां का दौर।)
चौथा अंक
दृश्य 4 – तोपख़ाना, शब-ए-क़द्र
(रात का सन्नाटा। मुहम्मद अली अकेले तोप के पास बैठे हैं।)
मुहम्मद अली (आकाश की ओर):
या अल्लाह…
यह तोप कभी ज़ुल्म की आवाज़ न बने।
यह सिर्फ़ वक़्त की याद दिलाए,
इंसानियत की पुकार बने।
(नवाब साहब चुपचाप पीछे खड़े सुनते हैं।)
नवाब:
मुहम्मद अली, तुम मेरे हमनाम हो,
तुम्हारे जैसे लोग ही रियासत की असली मज़बूती हैं।
तोपख़ाना संभालना आसान है…
मगर वक़्त और उसूल निभाना मुश्किल।
मुहम्मद अली:
हुज़ूर, यह ख़ानदानी ज़िम्मेदारी है।
मेरे दादा परदादा सभी ने यह ज़िम्मेदारी बख़ूबी अंजाम दी है
मेरे वालिद अहमद अली ने भी इस रियासत को अपनी ख़िदमात पेश की थीं।
हमारी नसों में वफ़ादारी दौड़ती है।
अंतिम अंक
दृश्य 5 – ईद की सुबह
(ईदगाह का दृश्य। सब लोग गले मिल रहे हैं।)
क़ाज़ी साहब:
आज की ईद सिर्फ़ रोज़े की नहीं,
बल्कि उस तहज़ीब की है
जो टोंक को टोंक बनाती है।
पंडित हरिदत्त (गले मिलते हुए):
ईद मुबारक नवाब साहब!
नवाब मुहम्मद अली खां:
ईद मुबारक…
यह रियासत हमारी नहीं,
इन लोगों की है।
(दूर से आख़िरी बार तोप की सलामी।)
मुहम्मद अली अपने पुत्र सैयद अली के साथ (उच्च स्वर में):
यह सलामी है—
टोंक की तहज़ीब को,
उसकी इंसानियत को,
उसकी एकता को!
(सभी किरदार एक साथ आगे आते हैं।)
सभी:
“टोंक की पहचान—
इंसाफ़, इबादत और इंसानियत!”
(रोशनी धीमी… पर्दा गिरता है।)

बुंदू खान के लड़के अलाउद्दीन
अलाउद्दीन के लड़के ज़ाकिर खान,
शम्सुद्दीन, कमरुद्दीन, मोईनुद्दीन

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