अभी न जाओ छोड़कर…

आशा भोसले को सादर श्रद्धांजलि
लेखक : दिनेश ठाकुर
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं फिल्म समीक्षक
www.daylifenews.in
बात कहाँ से शुरू की जाए। निहायत सुरीली, लयदार, राग-रस में डूबी किसी आवाज़ के खो जाने पर बात कहाँ से शुरू की जाए। यह सिर्फ़ आशा भोसले की ज़िंदगी का सफ़र थमना नहीं है, उस आवाज़ का खो जाना है, जिसके साथ गाते-गुनगुनाते हुए कई पीढ़ियाँ जवान हुईं। आशा जी ने किसी फ़िल्म के लिए गाया था – ‘जब छाए मेरा जादू कोई बच न पाए।’ वाक़ई उनकी आवाज़ के जादू से कोई बच नहीं पाया। जैसे ताजमहल की तुलना किसी दूसरे महल से, एफिल टावर की दूसरे टावर से या नियाग्रा की दूसरे जल-प्रपात से नहीं हो सकती, उसी तरह आशा भोसले की तुलना किसी दूसरी गायिका से नहीं की जा सकती। वह अपनी मिसाल आप थीं। उनकी आवाज़ में भरपूर रंग था और अंदाज़ में वह करिश्मा, जिसे ‘न भूतो न भविष्यति’ कहा जा सकता है।
कहा जाता है कि बरगद के तले कोई पेड़-पौधा नहीं पनपता। आशा भोसले ने इसे झुठला दिया। बड़ी बहन लता मंगेशकर अगर बरगद थीं, तो आशा जी उनसे कमतर नहीं। सुरों की दुनिया में उन्होंने अलग पहचान बनाई। भजन हो (हे रोम-रोम में बसने वाले राम) या दार्शनिक गीत (तोरा मन दर्पण कहलाए), बेफ़िक्री हो (दम मारो दम) या शोख़ी (आओ हुज़ूर तुमको सितारों में ले चलूं), उदासी हो (चैन से हमको कभी आपने जीने न दिया) या उल्लास (आज कोई प्यार से दिल की बातें कह गया), उन्होंने हर मनोदशा को मोहने वाली सुरीली अभिव्यक्ति दी। वह कुदरत का ऐसा करिश्मा थीं, जिसे कुदरत भी नहीं दोहरा सकी।
चाँदी के सिक्के-सी खनखनाती आवाज़ के लिए मशहूर आशा भोसले ने उस ज़मीन पर अपने लिए अलग रास्ता बनाया, जिस पर गीता दत्त और शमशाद बेगम सरीखी दिग्गज गायिकाएं जमी हुई थीं। आगे चलकर इस ज़मीन पर सिर्फ़ और सिर्फ़ आशा भोसले की हुकूमत रही। वह अपनी आवाज़ को गीतों के हिसाब से बदलने में माहिर थीं। यह आवाज़ फूल की पंखुड़ी की तरह नरम (अभी न जाओ छोड़कर) भी हो सकती है, तो बादलों में कड़कती बिजली की तरह तेज़ भी (ओ मेरे सोना रे सोना)। वह इस मामले में खुशनसीब रहीं कि उनके हिस्से में ‘जब चली ठंडी हवा’, ‘आगे भी जाने न तू’, ‘जिंदगी इत्तफ़ाक़ है’, ‘जाइए आप कहाँ जाएँगे’, ‘परदे में रहने दो’, ‘अबके बरस भेजो भैया को बाबुल’, ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’, ‘दो लफ़्ज़ों की है दिल की कहानी’ और ‘इन आँखों की मस्ती के’ जैसे गाने ज़्यादा से ज़्यादा आए। इन गानों ने उन्हें लता मंगेशकर की कॉपी बनने से महफ़ूज़ रखा।
जब लता जी की आवाज़ ने ‘बरसात’ और ‘महल’ के गानों से आकाश छूना शुरू किया था, आशा भोसले को कोई जानता भी नहीं था। अपने पहले फ़िल्मी गीत ‘सावन आया रे, जागे मोरे भाग सखी’ (यह गीता दत्त और ज़ोहरा के साथ कोरस था) से उनका भाग्य नहीं जागा। यह 1948 की फ़िल्म ‘चुनरिया’ का गीत है। आशा जी का सूर्योदय हुआ ‘रात की रानी’ के दो सोलो गानों से – ‘हैं मौज में अपने बेगाने’ और ‘हमारे दिल पर तेरा इख़्तियार होना था’। आशा जी जब उस दौर को याद करती थीं, तो उनकी आवाज़ में चमक आ जाती थी। वह कहती थीं – ‘मेरी किसी ने मदद नहीं की। मैंने ख़ुद मेहनत की और कामयाबी को अपनी तरफ़ मोड़ा।’
आशा भोसले के ख़ामोश हो जाने से हिंदी सिनेमा के सुनहरे, सुरीले दौर की एक और मीनार ढह गई है। अब फ़िल्म संगीत का तम्बू इतना उखड़ चुका है कि आशा जी जैसी आवाज़ मिलने की आशा दूर-दूर तक नज़र नहीं आती। अब न आवाज़ों का अपना व्यक्तित्व है, न गीतकारों-संगीतकारों की रचनाओं में गहराई। कई आवाज़ों को सुर में लाने के लिए कम्प्यूटर का सहारा लेना पड़ता है। कम्प्यूटर से आवाज़ तो सेट की जा सकती है, वह प्रभाव पैदा नहीं किया जा सकता, जो किसी सिद्ध गायक या गायिका के गले से झरने की तरह फूटता है। नए गाने सुनकर लगता है जैसे सुरों की नदी के किनारे बच्चों को उछलकूद करते हुए गिनती सिखाई जा रही हो। आशा जी की गायी ग़ज़ल का सहारा लेकर यही कहा जा सकता है – ‘ये क्या जगह है दोस्तो, ये कौन-सा दयार है/ हद्दे-निगाह तक जहाँ ग़ुबार ही ग़ुबार है।’ (साभार : दिनेश ठाकुर की वॉल से)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *