लोक, परलोक और स्वप्नलोक

लेखक : रमेश जोशी
प्रधान सम्पादक, ‘विश्वा’, अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति, यू.एस.ए.
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अगर ब्रह्म है तो वह और उससे जुड़ा सब कुछ सर्वत्र व्याप्त है । ऐसे ही हर मुहूर्त ब्रह्म का ही मुहूर्त होता है फिर भी ब्राह्मणों ने उस संशयात्मक और दुविधापूर्ण समय को ब्रह्म मुहूर्त कहा है जब यही पता नहीं चलता की दिन है कि रात ? सूरज छुपा या उगने वाला है । पक्षी भी सुबह और शाम चहचहाते ही हैं । फिर भी ब्राह्मणों के अनुसार ब्रह्ममुहूर्त अर्थात सुबह कोई चार-साढ़े चार बजे हमारी नींद खुल गई । और नींद का भी क्या है ? खुले, न खुले । अब तो उस मधुमती भूमिका में हैं जब जन्म और मृत्यु का, सुषुप्ति और जागृति का भेद ही समाप्त हो जाता है । जैसे कि इस कलयुग में बैक डेट में जाकर फिर से राम का युग अर्थात त्रेता युग लाने वाले आडवाणी जी को अब यह भी पता नहीं होगा कि वे ‘रामरथ’ पर सवार हैं, या बिहार बेऊर जेल में हिरासत में, प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे हैं या हमारी तरह बरामदे में बैठे ऊंघ रहे हैं ।
वैसे तोताराम के अनुसार हमारी नींद अभी तक नहीं खुली है । हम अब भी गाँधी-नेहरू युग के स्वप्न में जी रहे हैं जब अपने सिद्धांतों के विपरीत चौरी-चौरा कांड होने पर गाँधी अपने प्रचंड आंदोलन को समाप्त कर देते हैं, नेहरू चीन से भौतिक पराजय को संसद में स्वीकार करते हैं और अपनी भूल मानते हैं या शास्त्री जी रेल दुर्घटना के बाद त्यागपत्र दे देते हैं ।
जैसे ही तोताराम आया, हमने कहा- तोताराम, आज ब्रह्ममुहूर्त में एक बड़ा विचित्र स्वप्न आया ।
बोला- बताने की जरूरत ही नहीं है । आया होगा स्वप्न कि मोदी जी ने कोरोना के बहाने हजम किया हुआ 18 महिने के डी ए का एरियर 2029 के आम चुनाव में उलट दिया । जैसी औकात वैसे स्वप्न । तुझे कहाँ से 2047 तक विकसित भारत का स्वप्न आने वाला है । वह तो परम राष्ट्रभक्त, प्रतिबद्ध और अहर्निश सेवामहे के जज्बे वाले मोदी जी को ही आ सकता है ।
हमने कहा- नहीं, ऐसा कोई छोटा-मोटा या चुनावी स्वप्न नहीं था । वास्तव में बड़ा अधिनायकवादी और अलोकतांत्रिक स्वप्न था ।
बोला- अब ऐसा कुछ नहीं हो सकता । मोदी जी के होते हिन्दू असुरक्षित हो सकता है लेकिन लोकतंत्र को कोई खतरा नहीं । देखा नहीं, कैसे गंगोत्री से गंगासागर तक, कश्मीर से कच्छ और कोंकण तक लोकतंत्र की पताका फहरा रही है । किस तरह बंगाल में स्वच्छ और पारदर्शी चुनाव हुए और मदर ऑफ डेमोक्रेसी गौरवान्वित हो गई । फिर भी तेरा स्वप्न क्या था ? वैसे इस उम्र में मरने, यमदूत आदि के स्वप्न स्वाभाविक होते हैं । और जिन्होंने घपले किए हुए हैं उनको ईडी की क्लीन चिट के बावजूद यमराज की असली एप्सटीन फ़ाइल खुलने का डर सताता रहता है जो इसी तरह स्वप्न में प्रकट होता है ।
हमने कहा- नहीं ऐसा कुछ नहीं । हाँ, स्वप्न में हमें ऐसा आभास हुआ कि हम वोट डालने गए तो वहाँ मतदान अधिकारी ने बताया कि आपका नाम वोटर लिस्ट में है ही नहीं ।
बोला- तो क्या हो गया ? सर्वोच्च न्यायालय ने भी तो पिछले दिनों बंगाल में सूची से छूट गए या जानबूझकर छोड़ दिए गए मतदाताओं की अपील पर कहा नहीं था कि अगर एक बार वोट नहीं डालोगे तो क्या हो जाएगा ?
हमने कहा- तो फिर मोदी जी भी तो 75 के हो रहे हैं ।जा बैठें अपने गुरु आडवाणी के साथ बरामदे में या चल दें झोला उठाकर हिमालय की किसी गुफा में और सुधारें परलोक । लेकिन नहीं, खुद को तो एक बार क्या, तीन तीन बार प्रधानमंत्री बनने के बाद भी तसल्ली नहीँ है । पिले पड़े हैं चुनावी रैली, रोड़ शो, केदारनाथ की गुफा में फोटोग्राफरों की उपस्थिति में ध्यान लगाने या रामेश्वरम में मौनव्रत साधने, या काशी विश्वनाथ मंदिर के सामने त्रिशूल लहराकर और डमरू बजाकर फ़ोटो खिंचवाने में । अभी से 2047 के एजेंडा चला रहे हैं । लगता है काल पर विजय प्राप्त कर ली है।
बोला- अगर तूने वोट डाल भी दिया तो तेरे एक वोट से क्या फ़र्क़ पड़ जाएगा ।
हमने कहा- तोताराम, बात चुनाव में जीत हार के फ़र्क़ की नहीं है । यह लाखों शहीदों के बलिदान और प्रयत्नों से प्राप्त स्वतंत्रता और लोकतंत्र के अधिकार और सम्मान की बात है । हमारे भारतीय होने के प्रमाण का प्रश्न है । यह हमारा अपमान है । बात हमारे 84 वर्षों से इस धरती के साथ खून पसीने के रिश्ते की है । हम अमित शाह के जन्म के पहले 1961 में राजस्थान में पंचायत के चुनाव करवा चुके हैं । असली डिग्री है । 40 साल देश भर में जगह जगह हजारों बच्चों को पढ़ाया है जो देश विदेश में जाने कहाँ कहाँ फैले हुए हैं और ये हमारा मताधिकार छीन लेंगे । यह वैसे ही है जैसे कोई आदेश निकालकर किसी गुलाम का नाम, धर्म, भाषा बदल दे । हमें नहीं चाहिए किसी पार्टी की मुफ़्त की मछली या झालमुड़ी या हजार दो हजार रुपए ।
अगर किसी देश में कोई भी वैध मतदाता कहता है कि मैंने पिछले चुनाव में वोट दिया था और अब मेरा नाम काट दिया गया तो ऐसे में जब तक उसका फैसला नहीं हो चुनाव ही नहीं होने चाहियें । बात चुनाव होने मात्र की और जीत-हार की नहीं, चुनाव की विश्वसनीयता की है ।
ऐसे चुनाव को समय अवैध मानेगा । काल सबका मूल्यांकन करेगा । वह कोई यशगान करने वाला भाट मीडिया या संसद में ‘ हो ही, हो ही चिल्लाने वाले व्यक्तित्वहीन सांसद नहीं हैं । (लेखक के अपने विचार हैं)

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