
लेखक : सुरेश भाई
लेखक ख्यात सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद हैं।
www.daylifenews.in
सन् 2004 से भागीरथी के उद्गम में लोहारीनाग-पाला परियोजना (600 मेवा) पर एनटीपीसी के द्वारा निर्माण कार्य प्रारंभ हो गया था। इसकी श्रृंखला में पाला- मनेरी (408 मेवा) और भैरों घाटी परियोजनाओं पर भी स्वीकृति मिलने वाली थी। जिसका उद्घाटन जून 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री भुवनचंद खंडूरी जी और इनसे पूर्व मुख्यमंत्री स्व० नारायण दत्त तिवारी जी ने भी किया था। लेकिन सुरंग आधारित परियोजना निर्माण के चलते गंगा की अविरलता को बचाने के लिए रक्षासूत्र आंदोलन और उत्तराखंड नदी बचाओ अभियान की टीम बहुत सक्रिय थी।
इस परियोजना का स्थानीय लोगों ने भारी विरोध किया। विरोध करने वाले नौजवानों को एनटीपीसी ने रोजगार देकर शांत करने का प्रयास भी किया। इसके बावजूद भी यहां परियोजना प्रभावित पाला, कुंजन, तिहार, सैंज आदि गांव की महिलाओं ने निर्माणाधीन बांध से पैदा हुई विनाशकारी गतिविधियों को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया। इसी सिलसिले में जल कवि डॉ० अतुल शर्मा जी द्वारा रचित “क्या नदी बिकी” नुक्कड़ नाटक, “अब नदियों पर संकट है”,” नदी तू बहती रहना” जैसे जलगीत जल संस्कृति मंच के माध्यम से उत्तराखंड में प्रस्तावित 558 जल विद्युत परियोजनाओं के खिलाफ जल यात्राएं की गई।जिसके बाद देशभर के सामाजिक कार्यकर्ता, संत- महात्मा, गंगा प्रेमियों की चिंता थी कि भागीरथी को लगभग 60 किमी श्रृंखलाबद्ध लंबी सुरंग में डालने से यहां हिमालय की कमजोर भूसंरचना वाले क्षेत्र में भागीरथी का प्राकृतिक अविरल प्रवाह बाधित होगा। निचले क्षेत्र में भी परिस्थितिकीय नुकसान होगा। बरसात में गंगोत्री जाने वाले लोगों की असुरक्षा बढ़ेगी। सुरंग में डाइवर्ट करने से श्रद्धालुओं को गंगा के दर्शन उद्गम में ही नहीं हो पायेंगे। जिससे लाखों लोगों की आस्था पर बड़ी चोट मानी जा रही थी। गंगा के अविरल प्रवाह के कारण उसमें पलने वाले जीव- जंतु, जैव विविधता और चारों ओर आकर्षित करने वाली सुंदर प्राकृतिक छटा और देवभूमि का जीवंत एहसास कराने वाली मां गंगा के साथ यह एक अन्याय के रूप में देखा जा रहा था।
काबिले गौर है कि 15 -16 जनवरी 2008 को रामनगर में नदी बचाओ अभियान की पदयात्राओं के समापन के समय प्रो० जीडी अग्रवाल जी और जल पुरुष राजेंद्र सिंह जी ने भाग लिया। वहां पर एक रणनीतिक फैसला हुआ कि भागीरथी की अविरलता को बचाने के लिए उत्तरकाशी की टीम के साथ मिलकर जीडी अग्रवाल जी ने उपवास करने का निर्णय लिया। भागीरथी के तट पर निवास करने वाले साधु- संत भी खुलकर बांधों के विरोध में सामने आये। परिणाम स्वरूप 13 जून 2008 को जीडी अग्रवाल जी उत्तरकाशी में उपवास पर बैठे। उनके साथ प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा, विमला बहुगुणा, समाजसेविका का राधा बहन, जल पुरुष राजेंद्र सिंह, स्वयं लेखक, डॉ रवि चोपड़ा, मातृ सदन के स्वामी शिवानंद, गोविंदाचार्य जी, स्थानीय महिलाएं आदि लोग मनकर्णिका घाट पर बैठ गये थे।उत्तराखंड की भाजपा सरकार भी उपवास के समर्थन में आगे आयी और तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ रमेश पोखरियाल निशंक जी ने केंद्र की कांग्रेस सरकार को परियोजना निरस्त करने के संबंध में पत्र लिखा। पर्यावरणविदों के दबाव में केंद्र सरकार ने मंत्रियों का एक समूह भी बनाया था और तत्कालीन पर्यावरण मंत्री जय राम रमेश जी ने परियोजना में अनेकों पर्यावरणीय शर्तों की अनदेखी के कारण बंद करने की सिफारिश की थी। जिसके बाद 23 अगस्त 2010 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह जी की सरकार में वित्त मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी ने एक पत्र भेजकर लोहारीनाग- पाला, पाला मनेरी, और भैरों घाटी जल विद्युत परियोजनाओं को निरस्त कर दिया था। तब तक इस पर 60 प्रतिशत काम भी हो गया था और लगभग 650 करोड रुपये खर्च भी हो चुके थे।
इसके बाद 2012 में गंगोत्री से उत्तरकाशी तक लगभग 120 किमी में भागीरथी इको सेंसेटिव जोन भी घोषित किया गया। जिसके द्वारा परियोजना निर्माण से हुई पर्यावरणीय क्षति की भरपाई के लिए कार्य योजना बनाई जानी थी। जिसे लागू करने पर बहुत टालमटोल की गई। जिन राजनीतिक दलों की सरकारों ने परियोजना को निरस्त किया था उन्हीं के नेता बाद में परियोजनाओं के निर्माण की मांग भी करते रहे। जिससे लगता था कि परियोजना पर फिर से निर्माण हो सकता है। लेकिन जब पिछले 17 वर्षों में भागीरथी घाटी में लगातार बाढ़, भूस्खलन से अपार जनधन की हानि हुई, जिसके चलते सुरंग आधारित परियोजनाओं के निर्माण पर सरकार बैकफुट पर आई है। परिणामस्वरूप मार्च 2026 से लोहारीनाग-पाला परियोजना के अधूरे निर्माण से बनी 14 किमी लंबी 6 सुरंगों को स्थाई रूप से बंद करने का निर्णय लिया गया है। परियोजना की सुरंगों के दोनों तरफ भूस्खलन की समस्या बढ रही थी। जिस पर भारतीय भू वैज्ञानिक सर्वेक्षण और वन विभाग की देखरेख में पांच-पांच मीटर तक प्लग करके बंद करने से पहले उसके अंदर जमा पानी और मलवा हटाने का काम किया जा रहा है। जिस पर लगभग 30 करोड रुपये खर्च होने का अनुमान है। लोहारी नाग में जहां भागीरथी को सुरंग में डालने के लिए झील बनाई गई थी वहां से मुक्त करके भागीरथी अपने वास्तविक स्थान की तरफ बहने लगी है। जिससे गंगोत्री हाईवे का खतरा भी टला है। इसका उद्देश्य स्पष्ट रूप से बताया जा रहा है कि भविष्य में इसका इस्तेमाल कभी भी भागीरथी के बहाव को बाधित करने के लिए नहीं किया जाएगा। उत्तरकाशी के जिलाधिकारी प्रशांत आर्य लगातार भागीरथी इको सेंसेटिव जोन की शर्तों को लागू करने के लिए प्रयत्नशील है। केंद्र सरकार का यह निर्णय भले ही देर सवेर ही सही गंगा की अविरलता पर अपनी मुहर लगा रही है। ऐसे उदाहरण जब प्रस्तुत किये जाएंगे तो राज और समाज की कोशिशें नदियों को बचा पायेगी। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)