
लेखक : प्रोफेसर (डॉ.) सोहन राज तातेड़
पूर्व कुलपति सिंघानिया विश्वविद्यालय, राजस्थान
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शरीर धर्म साधन का प्रमुख माध्यम है। शरीर के द्वारा ही सम्पूर्ण क्रियाएं की जाती है। इसलिए शरीर का स्वस्थ रहना बहुत आवश्यक है। यदि शरीर स्वस्थ न रहे तो संसार की सभी वस्तुएं निरर्थक है। शरीर को स्वस्थ बनाये रखने के लिए शरीरप्रेक्षा उत्तम विधि है। इसके द्वारा शरीर को आंतरिक और बाह्य दोनों रूपों से सुदृढ़ बनाया जाता है। मानव जीवन का अन्तिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है। सभी धर्मों और दर्शनों में मोक्ष प्राप्त की अनेक विधियां बतायी गयी है जिनका अनुपालन करके जीवन के इस लक्ष्य को प्राप्त किया जाता है। भारतवर्ष में प्रचलित प्राचीन व आधुनिक सभी साधना पद्धतियों का अन्तिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है। मोक्ष प्राप्ति का साधन शरीर है। चित्त को सूक्ष्म एवं पटु बनाना शरीर प्रेक्षा का मुख्य प्रयोजन है। शरीर के तंत्रों की व्यवस्थित प्रक्रिया में शरीर प्रेक्षा सहायक है। शरीर का सम्यक् प्रशिक्षण शरीर की स्वस्थता एवं सफलता की दिशा में ले जाता है।
आत्म-दर्शन का पहला प्रयोग है- शरीर को देखना। शरीर को तब देख सकते हैं, जब शरीर-प्रेक्षा का अभ्यास करें, बाहर और भीतर चित्त को टिकाएं, एकाग्र करें। शरीर के भीतर जो प्राण के प्रकम्पन्न हो रहें है, जो रसायन काम कर रहे हैं, विद्युत काम कर रही है उसे देखंे। हमारा अस्तित्व चेतन और अचेतन का जटिलतम संयोग है। चेतन है हमारी आत्मा और अचेतन है शरीर। आत्मा अरूप है, अरस है, अगन्ध है और अस्पर्श है, इसलिए वह अदृश्य है। वह शरीर से बंधी हुई है, इस दृष्टि से दृश्य भी है। संसारी आत्मा शरीर मुक्त नहीं रह सकती। वह स्थूल तथा सूक्ष्म किसी न किसी शरीर के आश्रित रहती है। चेतना की अभिव्यक्ति का माध्यम शरीर है। आत्मा और शरीर का सम्बन्ध चिर-पुरातन है। ‘‘सुख-दुःखानुभवसाधनम् शरीरम्’’।
जिस के द्वारा पौद्गलिक सुख-दुःख का अनुभव किया जाता है, वह शरीर है। शरीर प्रेक्षा का अर्थ है शरीर को देखना, प्रत्येक अवयव पर होने वाले प्राण के प्रकम्पन्न को अनुभव करना। इन प्रकम्पन्नों की सम्यक् अनुभूति के लिए शरीर को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जानना आवश्यक है। सर्वप्रथम हमें शरीर के विभिन्न तंत्रों की प्रक्रियाओं का ज्ञान प्राप्त करना होगा। तभी हम अपने हृदय, फेफड़ों और यकृत जैसे महत्वपूर्ण अंगों का सम्यक् परिचय कर सकेंगें उनका गलत ढं़ग से उपयोग करना छोड़ सकेंगे और उनकी भली-भांति देख-रेख कर सकेंगें। नाड़ी संस्थान मानव शरीर का एक जटिलतम तंत्र है। यह शरीर के अन्य सभी तंत्रों का नियंत्रण व संयोजन करता है तथा उनके माध्यम से समग्र शरीर के क्रिया कलापों को संचालित करता है। इसलिए इसे शरीर का सर्वाधिक महत्वपूर्ण तंत्र माना जाता है। यदि नाड़ी-तंत्र किसी भी कारण से विफल हो जाये तो सारे शरीर की प्रवृतियां ठप हो जायेगी। ऐसी स्थिति में न हाथ-पैर हिल सकेंगें, न बैठना-उठना होगा, न मांसपेशियों का संचालन हो सकेगा। शरीर-प्रेक्षा का महत्वपूर्ण परिणाम है-प्राण-प्रवाह का संतुलन।
शरीर-प्रेक्षा आध्यात्मिक प्रक्रिया है। साथ-साथ यह मानसिक और शारीरिक प्रक्रिया भी है। स्वास्थ्य के लिए भी बहुत बड़ी चिकित्सा है- प्राण-चिकित्सा। शरीर प्रेक्षा करने वाला आध्यात्मिक प्रयोग ही नहीं कर रहा है, साथ-साथ में प्राण-चिकित्सा का प्रयोग कर रहा है, बीमारियों की चिकित्सा भी कर रहा है। शरीर में रोग न होने का अन्य उपाय है- रोग-प्रतिरोधात्मक शक्ति का विकास। जब रोग प्रतिरोधक शक्ति प्रबल होती है, तब किसी भी प्रकार के रोग के कीटाणु आक्रमण नहीं कर सकते। वे आते है और पराजित होकर भाग जाते हैं। जिस व्यक्ति की प्रतिरोधात्मक शक्ति मजबूत है, उसे कीटाणु सताने का प्रयत्न तो करते हैं पर सता नहीं पाते है। हम शरीर प्रेक्षा के द्वारा रोग-प्रतिरोधक शक्ति को सक्षम बनाते हैं, उसकी एक मजबूत दीवार खड़ी करते हैं, जिससे कोई भी आक्रमण न कर सके। हमारे शरीर में अनेक तंत्र व अनेक अवयव हैं जिनकी जानकारी नहीं होने से हम उनकी भलीभांति देख-रेख नहीं कर सकते। हमारे शरीर की प्रथम इकाई कोशिका है कोशिकाओं में रसायनिक पदार्थों की क्रिया होती रहती है। एक ही प्रकार के कार्यों की श्रृंखला को निष्पादित करने वाले अनेक अवयवों के समूह को तन्त्र कहते हैं।
इनमें श्वसन तन्त्र, नाड़ी तंत्र, रक्त परिसंचरण तन्त्र, पाचन तंत्र, अन्तःस्रावी ग्रंथि तंत्र, विसर्जन तन्त्र प्रमुख हैं। योग विज्ञान के अनुसार हमारे शरीर की पांच परतें होतीं हैं। अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय और आनंदमय कोष। इन कोषों को संतुलित करके हम शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पा सकते हैं। शरीर-प्रेक्षा में हमें शरीर को देखना होता है। खुली आंखों से नहीं, चित्त से। आंखें बंद रहेगी। चित को शरीर के प्रत्येक अवयव पर ले जाकर वहां पर होने वाले परिणमन, स्पंदन, प्रकंपन या संवेदन आदि को द्रष्टाभाव से देखना है। कपड़े का स्पर्श, खुजली, दर्द आदि जो कुछ अनुभव हो, उसे देखना केवल देखना है, उसका अनुभव करना है। प्रयोग के द्वारा शरीर की प्रेक्षा की जा सकती है। चित्त को दाएं पैर के अंगूठे पर केंद्रित करें। पूरे भाग में चित्त की यात्रा करें। वहां पर होने वाले प्राण के प्रकंपनों का अनुभव करें। प्रियता और अप्रियता से मुक्त रहकर केवल द्रष्टाभाव से देखें और जानें। प्रत्येक अंगुली, पंजा, तलवा, एड़ी, टखना, पिंडली, घुटना, जंघा, और कटिभाग पर प्रत्येक अवयव पर आधा से एक मिनट प्रेक्षा करें। प्राण के प्रकंपनों को द्रष्टा भाव से देखें अब मध्यलोक की यात्रा प्रारंभ करें।
पेडू के पूरे भाग में चित्त को केन्द्रित करें-दाएं-बाएं, आगे-पीछें, बाहर और भीतर-प्रत्येक भाग में चित्त को केन्द्रित करें और वहां पर होने वाले प्राण के प्रकंपनों का अनुभव करें। केवल द्रष्टाभाव से देखे। इसी तरह पेट के पूरे भाग की यात्रा करें, प्रेक्षा करें। अब पेट के प्रत्येक भीतरी अवयव की प्रेक्षा करें-दोनों गुर्देें, बड़ी आंत, छोटी आंत, अग्नाशय ,पक्वाशय, आमाशय, तिल्ली, यकृत और तनुपट प्रत्येक अवयव पर 20 से 30 सैकंड रुकें। अब वक्षस्थल के पूरे भाग की यात्रा करें-दाएं-बाएं, आगे-पीछे, बाहर और भीतर, प्रत्येक भाग में चित्त को केन्द्रित करें और वहां पर होने वाले प्राण के प्रकंपनों का अनुभव करें। अब वक्षस्थल के प्रत्येक अवयव की प्रेक्षा करें-हृदय, दांईं पसलियां, बाईं पसलियां, दायां फेफड़ा, बायां फेफड़ा। पीठ का पूरा भाग-मेरुदंड, सुषुम्ना, सुष्मुना-शीेर्ष, गर्दन की प्रेक्षा करें। अब दोनों हाथों की प्रेक्षा करें। दायां हाथ, अंगूठा, अंगुलियां, हथेली, कलाई, कलाई से कोहनी तक, कोहनी से कंधे तक की प्रेक्षा करें। इसी प्रकार बाएं हाथ के अंगूठे से कंधे तक एक-एक भाग की प्रेक्षा करें। कंठ, स्वरयंत्र, प्रत्येक भाग क्रमशः चित्त की यात्रा करें और प्रेक्षा करें। मध्यलोक की यात्रा संपन्न। अब ऊर्ध्वलोक की यात्रा प्रारंभ करें। ठुड्डी, होठ, मुंह-मुंह के भीतर मसूड़े, जीभ, तालु, दायां कपोल, बायां कपोल, नाक, दाईं कनपटी, दायां कान, बाईं कनपटी, बायां कान, दाईं आंख, बाईं आंख, ललाट और सिर। प्रत्येक भाग की प्रेक्षा करें। उर्ध्वलोक की यात्रा संपन्न। अब एक साथ पूरे शरीर की प्रेक्षा करें। जो आसानी से खड़े-खड़े कर सकते है, वे खड़ें-खड़े करें।(लेखक केअपने विचार हैं)