
लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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केरल में विधानसभा चुनावों से काफी पहले यह संकेत साफ मिलने लगे थे कि इस बार वहां सत्ता परिवर्तन होगा। मार्क्सवादी नीत वाम लोकतान्त्रिक मोर्चा सत्ता से बहार होगा तथा कांग्रेस नीत संयुक्त लोकतान्त्रिक मोर्चा दस साल बाद फिर सत्ता में लौटेगा। अन्य राज्यों की तरह दक्षिण के इस राज्य में कांग्रेस कई गुटों में बंटी हुई है। मोटे तौर पर कांग्रेस में यहाँ तीन गुट है। इन तीनों गुटों के नेता चाहते थे कि चुनावों के लिए उनके समर्थकों अधिक से अधिक उनके समर्थकों को पार्टी का टिकट मिले ताकि विधायक दल में उनके अधिक से अधिक विधायक आ सकें। इस संख्या बल के आधार पर वे विधायक दल का नेता, यानि प्रदेश का अगले मुख्यमंत्री चुने जा सके। कांग्रेस वाले मोर्चे को इस बार कुल 140 सीटों में से 102 मिली थीं इसमें कांग्रेस के 63 विधायक है। मोर्चे का दूसरा बड़ा दल इंडियन यूनाइटेड मुस्लिम लीग थी। इसे कुल 22 सीटें मिली थी।
कांग्रेस के तीनों गुटों में एक गुट कांग्रेस के महामंत्री (संगठन ) वेणुगोपाल का है. दूसरा गुट पिछली विधानसभा में विपक्ष के नेता वी. डी सतीशन का है .तीसरे गुट के नेता चेन्नीथला है, जो पार्टी के बड़े और पुराने नेता है। हालाँकि विधानसभा चुनावों के नतीजे 4 मई को आ चुके थे तथा कांग्रेस नीत मोर्चे को स्पष्ट बहुमत मिला था। लेकिन राज्य का अगला मुख्यमंत्री कौन हो इसको लेकर लगभग दो हफ्ते रस्सा कसी चलती रही। दिल्ली से आये पर्यवेक्षकों ने मोर्चे के एक एक विधायक से उसकी पसंद पूछी। इनमें से 46 ने वेणुगोपाल को अपनी पसंद बताया, जबकि सतीशन को 36 मत मिले। ये आंकडे अधिकारिक नहीं थे। सुनी सुनाई बातों पर आधारित थे। जैसी कि कांग्रेस की परंपरा है, आखिर में विधायक दल के नए नेता का नाम तय करने के लिए पार्टी आला कमान को अधिकृत कर दिया गया। वहां मामला दस दिन तक अटका रहा। वेनुगोपाल पार्टी के पूर्व अध्यक्ष तथा वर्तमान में लोकसभा में पार्टी के नेता राहुल गाँधी सहित पार्टी के बड़े नेताओं के बहुत नज़दीक हैं . ऐसा माना जाने लगा कि आखिर में वे ही राज्य के अगले मुख्यमंत्री होंगे।
उधर सतीशन राज्य में पार्टी के सबसे अधिक लोकप्रिय नेता है। वे 6 बार विधायक रहा चुके है। वे नायर समुदाय से आते है। इस समुदाय की संख्या राज्य में लगभग 15 प्रतिशत हैं, लेकिन इसका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव राज्य में संख्या बल से कहीं अधिक है, वैसे भी पिछले 35 साल में इस समुदाय को कोई नेता राज्य का मुख्यमंत्री नहीं बना था। उधर मुस्लिम लीग ने भी साफ कर दिया कि उसकी अगले मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पहली पसंद सतीशन ही है। पार्टी के इस नेता की राज्य के ईसाई समुदाय, जो लगभग 19 प्रतिशत हैं , के नेताओं से भी बड़े नज़दीकी संबंध है. कांग्रेस पार्टी इन कारणों दे राज्य में जीत हासिल हुई थी।
जहाँ तक चेन्नीथला का सवाल है वह पहले से पार्टी में तीसरे नंबर के नेता थे। हालाँकि लोकसभा के चुनाव अभी काफी दूर है, लेकिन पार्टी आला कमान ऐसे नेता को आगे लाना चाहती थी जो आम जन में सबसे अधिक लोकप्रिय हो। सतीशन की छवि भीड़ को आकर्षित करने वाली है। जहाँ तक वेणुगोपाल का सवाल है, वे पार्टी के संगठन में बड़े पद पर जरूर हैं लेकिन उनकी राज्य की राजनीति में उनकी पैठ सतीशन की तुलना में बहुत कम है। शपथ ग्रहण समारोह में सतीशन के साथ सभी मंत्रियों ने शपथ ली। ऐसा माना है कि मंत्रियों के नाम और उनके विभाग दिल्ली में पार्टी अआला कमान ने तय कर दिए थे। चेन्नीथला को उनकी पार्टी में वरिष्ठता देखते हुए उन्हें गृह विभाग दिया गया। मुस्लिम समुदाय के 22 विधायकों में से 5 को मंत्री पद दिया गया। संख्या बल के अनुपात इस पार्टी को अधिक मंत्री पद दिए गए।
इसका एक कारण यह है कि पार्टी किसी भी कीमत अपना मुस्लिम वोट बैंक बनाये रखना चाहती है। राहुल गाँधी ने वायनाड जैसे मुस्लिम बहुल इलाके से मुस्लिम लीग के समर्थन से ही दो बार लोकसभा का चुनाव जीता था। जब उन्होंने बाद में वायानड सीट खाली कर दी तो पार्टी ने प्रियंका गाँधी उपचुनाव में अपना उम्मीदवार बनाया था। राज्य में मुस्लिम आबादी राज्य की आबादी का 27 प्रतिशत है। (लेखक का अपनाअध्ययन एवं अपने विचार हैं)