
27 जून को तिरुवनंतपुरम में होगा अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला, राष्ट्रीय सम्मान समारोह एवं पुस्तक लोकार्पण
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तिरुवनंतपुरम। सामाजिक परिवर्तन, मानवीय मूल्यों और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर वर्ष 1985 से सतत कार्यरत गोपाल किरण समाजसेवी संस्था (GKSSS) अपने राष्ट्रीय विस्तार अभियान के अंतर्गत देश के 22वें राज्य केरल में प्रवेश कर रही है। इस अवसर पर संस्था द्वारा 27 जून 2026 को केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में 22वीं राष्ट्रीय एकदिवसीय कार्यशाला एवं राष्ट्रीय सम्मान समारोह का आयोजन किया जा रहा है।
कार्यक्रम का केंद्रीय विषय “Diaspora Fragmentation and Legal Reform: Reimagining Family, Citizenship and Justice in a Globalized India” है। यह महत्वपूर्ण कार्यशाला भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) द्वारा प्रायोजित मेजर रिसर्च प्रोजेक्ट के अंतर्गत एसआरएम विश्वविद्यालय, दिल्ली-एनसीआर, सोनीपत के विधि संकाय के मार्गदर्शन में आयोजित की जा रही है।
कार्यक्रम का आयोजन गोपाल किरण समाजसेवी संस्था (GKSSS), इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ माइग्रेशन एंड डेवलपमेंट (IIMAD) तथा गुलाटी इंस्टीट्यूट ऑफ फाइनेंस एंड टैक्सेशन (GIFT), तिरुवनंतपुरम के संयुक्त तत्वावधान में होगा। देश-विदेश के शिक्षाविद, विधि विशेषज्ञ, शोधकर्ता, समाजसेवी, साहित्यकार और नीति-निर्माता इस मंच पर वैश्विक भारतीय परिवारों से जुड़ी जटिल चुनौतियों और उनके समाधान पर विचार-विमर्श करेंगे।
संस्था के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने बताया कि वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में भारतीय मूल के लाखों परिवार विश्वभर में फैले हुए हैं। नागरिकता, पारिवारिक संबंधों, अंतरराष्ट्रीय विवाह, बाल अधिकारों और न्यायिक प्रक्रियाओं से जुड़े अनेक प्रश्न आज नई चुनौतियों के रूप में सामने आ रहे हैं। कार्यशाला का उद्देश्य इन मुद्दों पर सार्थक संवाद स्थापित कर प्रभावी नीतिगत सुझावों और विधिक सुधारों की दिशा में चिंतन को आगे बढ़ाना है।
उन्होंने कहा कि यह आयोजन केवल अकादमिक विमर्श तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज को दिशा देने वाले व्यक्तित्वों के सम्मान और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को सुदृढ़ करने का भी प्रयास है। संस्था का मानना है कि—
“सम्मान उन व्यक्तित्वों का, जिन्होंने अपने जीवन को समाज के लिए समर्पित किया; संवाद उन विषयों पर, जो भविष्य की पीढ़ियों को दिशा देंगे।”
51 विभूतियों को मिलेगा राष्ट्रीय सम्मान
कार्यक्रम के विशेष आकर्षण के रूप में देश के विभिन्न राज्यों से चयनित 51 वरिष्ठजनों एवं विशिष्ट सामाजिक विभूतियों को राष्ट्रीय सम्मान प्रदान किया जाएगा। चयन आस्था चयन समिति द्वारा किया गया है।
सम्मानित होने वाले व्यक्तित्व शिक्षा, साहित्य, सामाजिक सेवा, महिला सशक्तिकरण, बाल अधिकार संरक्षण, वरिष्ठजन कल्याण, संस्कृति एवं कला, स्वास्थ्य जागरूकता, पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण विकास, पत्रकारिता, मानवाधिकार, शोध एवं नवाचार, लोकसेवा, युवा नेतृत्व तथा सामुदायिक विकास जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले हैं। यह सम्मान उनके दीर्घकालिक सामाजिक योगदान और मानवीय मूल्यों के प्रति समर्पण को राष्ट्रीय स्तर पर अभिनंदित करने का प्रयास है।
नाट्य प्रस्तुति “सत्ता” के माध्यम से सामाजिक चेतना का संदेश
कार्यक्रम के दौरान संस्था की सांस्कृतिक गतिविधियों के अंतर्गत प्रख्यात साहित्यकार, रंगकर्मी एवं नाट्य निर्देशक डॉ. सुधांशु कुमार चक्रवर्ती द्वारा लिखित, निर्देशित एवं अभिनीत चर्चित नाटक “सत्ता” का विशेष उल्लेख किया जाएगा, जिसकी प्रस्तुतियाँ देश के विभिन्न हिस्सों में निरंतर जारी हैं।
यह नाटक समकालीन सामाजिक, राजनीतिक एवं मानवीय परिस्थितियों पर विचारोत्तेजक दृष्टि प्रस्तुत करता है और जन-जागरूकता, उत्तरदायी नागरिकता तथा सकारात्मक परिवर्तन का संदेश देता है। नाटक का मूल भाव — “सत्ता का खेल नहीं, बदलते समय का सच है… एक सोच, एक आवाज, एक बदलाव की शुरुआत” — समाज में संवाद और चेतना के नए आयाम स्थापित करता है।
“भयमुक्त शिक्षा” पुस्तक का लोकार्पण
कार्यक्रम में ओडिशा की शिक्षाविद एवं लेखिका आकांक्षा रूपा चचरा द्वारा लिखित पुस्तक “भयमुक्त शिक्षा” का लोकार्पण भी किया जाएगा। यह पुस्तक शिक्षा व्यवस्था में संवेदनशील, रचनात्मक और भयमुक्त वातावरण के निर्माण की आवश्यकता को रेखांकित करती है तथा शिक्षकों, अभिभावकों और नीति-निर्माताओं के लिए उपयोगी दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है।
देश के विभिन्न राज्यों से आने वाले विद्वानों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, विधि विशेषज्ञों और समाजसेवियों की सहभागिता से यह आयोजन सामाजिक चेतना, विधिक जागरूकता, राष्ट्रीय एकता और मानवीय मूल्यों को नई ऊर्जा प्रदान करेगा।
अपने संदेश में श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने कहा कि जब समाज अपने वरिष्ठजनों के अनुभवों का सम्मान करता है, युवाओं को सकारात्मक दिशा देता है और न्यायपूर्ण व्यवस्था के निर्माण हेतु संवाद को बढ़ावा देता है, तभी एक संवेदनशील, समावेशी और सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव होता है। यह आयोजन उसी राष्ट्रीय संकल्प की अभिव्यक्ति है।