
तालिबे दुआ : अब्दुल सलाम जौहर
www.daylifenews.in
इस्लाम में बख़्ल (कंजूसी) को एक नापसंदीदा सिफ़त क़रार दिया गया है। बख़ील इंसान वह है जो अल्लाह की दी हुई नेमतों को सिर्फ़ अपने लिए महफ़ूज़ रखना चाहता है और ज़रूरतमंदों, रिश्तेदारों, पड़ोसियों या ख़ैर के कामों में ख़र्च करने से कतराता है।
बख़ील इंसान की पहचान:
हर वक़्त माल कम होने का ख़ौफ़।
ज़रूरी जगह पर भी ख़र्च करने में तंगदिली।
ग़रीबों और मोहताजों की मदद से गुरेज़।
दूसरों की भलाई देखकर दिल में तंगी महसूस करना।
ज़कात, सदक़ा और ख़ैरात में सुस्ती दिखाना*।
इस्लाम में उसकी जगह:
क़ुरआन और हदीस में सख़ावत, हमदर्दी और अल्लाह की राह में ख़र्च करने की बहुत फ़ज़ीलत बयान हुई है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि सख़ी इंसान अल्लाह और लोगों के क़रीब होता है, जबकि बख़ील इंसान लोगों से दूर हो जाता है।
अल्लाह हम सब को अल्लाह की राह में और नेक कामों में ख़र्च करने और दूसरों की मदद ख़िदमत करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाये !
आमीन!