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जयपुर। प्रदेश सरकार ने गठन के दस माह पश्चात् जब ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों व कुछ निकायों का कार्यकाल समाप्त हो गया और चुनाव लम्बित थे तब देरी से ओबीसी आयोग का गठन किया जिसे तीन माह में इकाईवार ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों, जिला परिषद् तथा निकाय के वार्डों का सर्वे करवाकर ओबीसी आरक्षण हेतु रिपोर्ट पेश करने थी, सरकार ने जानबूझकर ओबीसी आयोग का गठन देरी से किया ताकि पंचायत राज तथा निकाय के लम्बित चुनाव नहीं करवाने पड़े। परिसीमन का कार्य जिसे चार महिने में सम्पन्न होना था, 13 माह तक यह कार्य चला। ओबीसी आयोग को तीन माह में रिपोर्ट पेश करनी थी, किन्तु आज 14-15 माह बीत चुके हैं, माननीय उच्च न्यायालय ने भी निर्देशित किया है कि चुनाव करवाये जायें, राजस्थान सरकार संविधान के 73वें व 74वें संशोधन की पालना में चुनाव क्यों नहीं करवा रही है, जबकि संविधान के आर्टिकल 243ई एवं 243यू में स्पष्ट प्रावधान है कि जिस पंचायत राज व नगर निकाय की इकाई के पॉंच वर्ष का कार्यकाल पूर्ण हो गया उसके चुनाव अवधि पूर्ण होते ही अनिवार्य रूप से करवाये जाये। मीडिया के माध्यम से बार-बार यह जानकारी सामने आती है कि चुनाव आयोग सरकार को नगर निकाय और पंचायत राज चुनाव हेतु पत्र लिख रहा है किन्तु सरकार द्वारा एससी, एसटी और ओबीसी का डेटा नहीं दिया जा रहा है और ना ही पत्रों का जवाब दिया जा रहा है। इसी प्रकार ओबीसी आयोग को भी अपना कार्य सम्पादन करने हेतु सरकार द्वारा संसाधन उपलब्ध नहीं करवाये गये। ओबीसी आयोग को कार्यालय, कम्प्यूटर व कर्मचारी नहीं देने के पीछे सरकार की केवल यही मंशा रही कि किसी भी तरह पंचायत राज और नगर निकाय के चुनाव टाले जाये। उक्त विचार राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा ने आज प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय, जयपर पर मीडिया को सम्बोधित करते हुये व्यक्त किये।
श्री डोटासरा ने कहा कि अब ओबीसी आयोग ने जो कवायद प्रारम्भ की है उसके तहत् 15 दिन में डेटा इकट्ठा करने हेतु राजधारा ऐप लॉन्च किया है जिसके माध्यम से कौन ओबीसी में है, कौन नहीं, इसका सर्वे किया जायेगा। इस ऐप में एक ऑपशन गर्वमेंट है और दूसरा सिटीजन है। सरकार द्वारा नियुक्त किये गये बीएलए और प्रगणक गवर्मेन्ट ऑपशन पर अपनी आईडी से यदि डेटा डालते हैं तो यह डेटा वास्तविक होता और डेटा के प्रति उक्त प्रगणक की जिम्मेदारी होती, किन्तु इस ऑपशन को सरकार ने लॉक कर दिया और केवल सिटीजन का ही ऑपशन बाकी रहा है। इस सिटीजन के ऑपशन के पश्चात् कोई भी सामान्य नागरिक अपने अनुसार मोबाईल से डेटा ओटीपी लेने के पश्चात् डाल सकेगा। इस प्रकार डाली गई जानकारी पूर्णतया संदेह से परे नहीं हो सकती, इस जानकारी का प्रगणक अथवा सरकारी कर्मचारी से कोई संबंध नहीं है, ना ही इस जानकारी के लिये सरकार जिम्मेदारी होगी। वर्तमान परिस्थिति में कोई भी व्यक्ति इस ऐप के माध्यम से जानकारी प्रस्तुत कर सकता है कि कौन ओबीसी है अथवा कौन नहीं और इसकी कोई प्रमाणिकता भी नहीं होगी, इस प्रकार से इकट्ठा किया गया यह डेटा प्रमाणित नहीं होगा, कानून वैध नहीं हो सकता, यह सरासर बेईमानी है और ओबीसी वर्ग के हितों पर कुठाराघात है।
उन्होंने कहा कि सरकार को ओबीसी वर्ग का सर्वे जिम्मेदारी से करवाकर प्रमाणिक डेटा प्राप्त करना चाहिये, ओबीसी वर्ग के हितों पर किसी भी प्रकार का कुठाराघात सहन नहीं किया जायेगा। सरकार अविलम्ब ओबीसी वर्ग के प्रमाणिक डेटा के आधार पर आरक्षण तय कर नगर निकाय और पंचायत राज के चुनाव घोषित करे।