जीवनदायी जल ही बना रहा करोड़ों को बीमार – ज्ञानेन्द्र रावत

लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
जल ही जीवन है और यह सच भी है कि जल ही जीवन का मूल तत्व है। यह शाश्वत सत्य भी है। सनातन धर्म कहें या परंपरा में जल को पवित्र माना गया है। कोई भी धार्मिक अनुष्ठान बिना जल के अपूर्ण माना जाता है। हमारे यहां गंगा को पुण्यसलिला और मोक्षदायिनी कहा गया है और गंगा जल को पवित्र माना गया है। जहां तक गंगा जल का प्रश्न है, सरकार दावे भले कितने ही करे, वह अब पुण्य का सबब नहीं रह गया है। वह इतना प्रदूषित है कि सही मायने में तो वह आचमन लायक भी नहीं रह गया है। कैग की रिपोर्ट इसका सबूत है कि गंगा अपने मायके यानी उत्तराखंड में ही शुद्ध नहीं है। फिर यह कैसे संभव है कि प्रदूषित गंगा जल से की गयी पूजा या धार्मिक अनुष्ठान पूरी तरह शुद्ध या पूर्णता को प्राप्त होगा। ऐसी स्थिति में विचारणीय यह है कि जब गंगा जल की यह दशा है, उस स्थिति में सामान्य जल यानी पानी की क्या स्थिति होगी ? हकीकत तो यह है और इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि वही जल करोड़ों – करोड़ लोगों को बीमार भी बना रहा है। जबकि भारतीय संस्कृति में जल को जीवन का आधार और आस्था का प्रतीक माना गया है। लेकिन उसी जल की शुद्धता का सवाल आज समूची दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में मुंह बाये खड़ा है। इस सम्बंध में विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानें तो दुनियाभर में 220 करोड़ लोग दूषित पेयजल का उपयोग करने को विवश हैं। यह आंकड़ा वैश्विक आबादी का लगभग एक चौथाई हिस्सा है। उसकी मानें तो दूषित पेयजल का यह हिस्सा मल-मूत्र या खतरनाक पदार्थों से संक्रमित है। देखा जाये तो दुनियाभर में 170 करोड़ से अधिक लोग ऐसे स्रोतों से लेकर पानी पी रहे हैं जो मानव मल या पशु मल से दूषित है। दुनिया में 10.6 करोड़ लोग सतही जलस्रोतों पर निर्भर हैं। प्रदूषित पानी पीने से हर साल दुनियाभर में 35 लाख से ज्यादा लोग हैजा, पेचिश, डायरिया, टायफायड, यकृत विकार, गुर्दे, हारमोनल असंतुलन आदि जानलेवा बीमारियों की चपेट में आकर मौत के मुंह में चले जाते हैं।

दरअसल जल प्रदूषण वर्तमान समय की सबसे गंभीर वैश्विक समस्या तो है ही, वह पर्यावरणीय और स्वास्थ्य सम्बंधी प्रमुख समस्याओं में एक है। सच्चाई यह है कि सीवेज का पानी, औद्योगिक कचरा और रसायनों के मिलने से पानी में वैक्टीरिया, वायरस और आर्सैनिक, लैड जैसी भारी धातुएं घुल जाती हैं। इससे पाचनतंत्र, त्वचा और यहां तक कि शरीर के अंग तक प्रभावित हो जाते हैं। यही नहीं डायरिया, टायफायड, सिरदर्द, हैजा, लिवर को सीधे-सीधे प्रभावित करने वाली बीमारी पीलिया, हैपेटाइटिस-ए, पानी में मौजूद परजीवियों की वजह से पेचिश, त्वचा से सम्बंधित शरीर पर चकत्ते, एलर्जी और एक्जिमा आदि कई बीमारियों का यह कारण है। पानी में फ्लोराइड, आर्सैनिक और नाइट्रेट की अधिकता होने से शारीरिक विकास अवरुद्ध हो जाता है, हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और गंभीर स्थिति होने पर कैंसर का खतरा तक बढ़ जाता है। जहां तक भारत का सवाल है, देश में साठ करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी मयस्सर नहीं है। नीति आयोग भी इसे स्वीकारता है। हरसाल 4 करोड़ लोगों की मौत डायरिया से होती है। एक करोड़ दिव्यांगता या दूसरी संक्रमित बीमारियों की चपेट में आकर मौत के मुंह में चले जाते हैं। इनमें बच्चों की तादाद सबसे ज्यादा होती है। चूंकि पेयजल और दैनंदिन अन्य जरूरतों की पूर्ति भूजल पर ही निर्भर है और भूजल औद्योगिक रासायनिक अपशिष्ट, मानवीय कचरा, कचरे के पहाड़ों और चिकित्सा क्षेत्र के कचरे आदि से इतना जहरीला हो गया है जो लाइलाज जानलेवा बीमारियों का कारण बन रहा है। ऐसे में दूषित पानी केवल एक पर्यावरणीय समस्या नहीं है, बल्कि इसने सार्वजनिक संकट का रूप ले लिया है। पानी जीवन की एक बुनियादी जरूरत है। लेकिन हालात सबूत हैं कि साफ पानी दुनिया के करोड़ों लोगों के लिए आज भी सपना बना हुआ है। भारत दुनिया में सर्वाधिक भूजल निकालने वाले देशों में अग्रणी है।अत्याधिक दोहन के चलते यहां न केवल भूजल स्तर लगातार गिर रहा है, बल्कि देश में अधिकांश जगहों पर भूजल में फ्लोराइड, आर्सैनिक आदि अन्य हानिकारक रसायनों की मात्रा भी लगातार बढ़ती जा रही है। दूषित जल का प्रभाव न केवल मानव स्वास्थ्य तक ही सीमित नहीं रहता, इसका असर पारिस्थितिक तंत्र पर भी पड़ता है। नदियों और झीलों में बढ़ते प्रदूषण से जलीय जीवों का अस्तित्व संकट में पड़ जाता है, बहुतेरी प्रजातियां धीरे-धीरे समाप्ति के कगार पर पहुंच जाती हैं। फिर दूषित जल जब खेतों में प्रयोग किया जाता है, तब वह मिट्टी की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है। और अंतत: खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव शरीर को प्रभावित करता है। भारत में वह चाहे राज्य हों या फिर केन्द्र शासित प्रदेश, दूषित पेयजल की समस्या से सभी पीड़ित हैं। पेयजल के नमूने इस सच्चाई को उजागर करते हैं। वहां प्रदूषण नमूनों में से केवल एक चौथाई के ही शुद्ध किये जाने की व्यवस्था है। जाहिर है लोग विवशता में दूषित जल पी रहे हैं। यह हमारे विकास के दावों पर ही सवालिया निशान लगाता है। हाल के वर्षों में देश के कई शहरों में दूषित जल से हुयी मौतें इस बात की साक्षी हैं कि कहीं न कहीं कुछ न कुछ तो गडबड जरूर है और इससे देश के गांव -देहात ही नहीं शहर – महानगर भी अछूते नहीं हैं। वहां तो यह समस्या बडे़ पैमाने पर है। वहां समस्या की विकरालता में जलापूर्ति हेतु डाली गयी पुरानी पाइप लाइनों की समय-समय पर मरम्मत न हो पाना और सीवेज निस्तारण की समुचित व्यवस्था के अभाव का बहुत बड़ा योगदान है। दरअसल वहां कहीं-कहीं पेयजल और सीवेज की पाइप लाइनों का पास-पास बिछा होना और उनमें लीकेज इस समस्या को और बढ़ा रहा है। अक्सर इनके बदले जाने और दूर-दूर बिछाये जाने की मांग वहां लम्बे अर्से से की जा रही है। लेकिन इसमें अक्सर धन की कमी का रोना रोया जाता रहा है। नतीजतन पुरानी पाइप लाइनों के जरिये ही जलापूर्ति जारी रहती है। इस बाबत जन प्रतिनिधियों का मौन समझ से परे है। हां देश की राजधानी दिल्ली सरकार ने अब जरूर दशकों पुरानी पाइप लाइन बदलने का बीड़ा उठाया है।

इसमें दो राय नहीं कि हमारे जल संसाधनों पर बढ़ती आबादी, बढ़ते शहरों और बढ़ते उद्योगों का भारी दबाव है। लेकिन उसके अनुपात में उचित जल प्रबंधन और सीवेज उपचार संयंत्रों की व्यवस्था कहें या उपलब्धता का अभाव हमारे जल संसाधनों , नदियों और भूजल के प्रदूषित होने का अहम कारण है।हांगकांग यूनिवर्सिटी आफ साइंसेज एण्ड टेक्नोलाजी के अध्ययन से खुलासा हुआ है कि भारत समेत दुनिया के बहुतेरे देशों के भूजल में सल्फेट का स्तर बहुत बढ़ गया है। इससे वैज्ञानिकों की चिंता और बढ़ गयी है। उनका कहना है कि सल्फेट युक्त पानी पीने से भारत समेत दुनियाभर के बहुतेरे देशों के तकरीब 1.70 करोड़ लोग पेट और आंत्रशोध की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। असलियत में सल्फेट युक्त पानी स्वास्थ्य के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी गंभीर खतरा है। दरअसल होता यह है कि सल्फेट से पायप भी गलने लगते हैं और फास्फोरस जैसे पोषक तत्वों को अलग करके पारिस्थितिक तंत्र के नुकसान का कारण बनता है। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन और शहरीकरण से सल्फेट की अधिकता बढ़ने से जल की गुणवत्ता पर भी व्यापक स्तर पर असर पड़ रहा है।

अध्ययन में पाया गया कि दुनियाभर के 156 देशों के भूजल में सल्फेट की मात्रा सीमा से अधिक पायी गयी है। अध्ययन के अनुसार दुनियाभर के 194 मिलियन लोग 250 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक सल्फेट युक्त पानी के संपर्क में हैं। इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपनी सीमा माना है। लेकिन 1.70 करोड़ लोग 500 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक सल्फेट युक्त पानी पी रहे हैं। यह चिंतनीय है। इनमें से 82 फीसदी के आसपास लोग भारत, अमेरिका, मैक्सिको, स्पेन समेत 10 खास देशों में रहते हैं। आंकड़ों के हिसाब से आनुपातिक दृष्टि से 57 फीसदी आस्ट्रेलिया, 53 फीसदी अफ्रीका, 38 फीसदी एशिया, 17 फीसदी उत्तरी अमरीका, 13 फीसदी दक्षिणी अमरीका और 10 फीसदी योरोप महाद्वीप क्षेत्र का भूजल सल्फेट युक्त है। जबकि अफगानिस्तान में 183.32 मिलीग्राम/लीटर, मैक्सिको 175.05, पाकिस्तान 135.01, अमरीका 97.85 और भारत 81.71 मिलीग्राम/लीटर औसतन सल्फेट युक्त पानी है। अध्ययन कर्ताओं ने चेताया है कि भारत के अलावा अल्जीरिया, पाकिस्तान, सऊदी अरब, इटली, मैक्सिको, ट्यूनीशिया, ईरान, स्पेन और अमरीका सल्फेट युक्त पानी वाले देशों में शीर्ष पर हैं।

भारत में भूजल में यूरेनियम की मौजूदगी का खुलासा भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र यानी बार्क ने किया है। एनजीटी को पेश रिपोर्ट में बार्क ने कहा है कि देश के 98 फीसदी सतही व भूजल में यूरेनियम की मौजूदगी पायी गयी है। वह बात दीगर है कि बार्क के मुताबिक यह लोगों के स्वास्थ्य के लिए खतरनाक नहीं है। बार्क ने खुलासा किया है कि देश के 83 फीसदी से ज्यादा नमूनों में सल्फेट, क्लोराइड, नाइट्रेट, फ्लोराइड, टोटल डिसाल्वड सालिड्स, एल्कलिनिटी और हार्डनेस तय सीमा से काफी अधिक पाया गया है। दरअसल यह रिपोर्ट उन खबरों के बारे में है जिसमें यह आशंका जतायी गयी थी कि बिहार में कई जिलों में शिशुओं को स्तनपान कराने वाली महिलाओं के दूध में यूरेनियम की मौजूदगी से बच्चों की सेहत पर खतरा है। केन्द्र ने अपनी रिपोर्ट में पंजाब के भूजल में भी यूरेनियम होने की पुष्टि की है। केंद्र ने यह भी स्पष्ट किया है कि अंतरराष्ट्रीय या राष्ट्रीय स्तर पर ब्रेस्ट मिल्क में यूरेनियम की मात्रा के लिए कोई सुरक्षित सीमा तय नहीं है।

अंतत : निष्कर्ष यह कि जरूरी है जल स्रोतों की सुरक्षा और जल की गुणवत्ता सुनिश्चित की जाये। मुख्यत: दूषित जल विकास के असंतुलित माडल, नीतिगत कमजोरियों और प्रशासनिक लापरवाही का जीता-जागता सबूत तो है ही, जनमानस का जल के प्रति दायित्व विहीन होने का भी प्रतीक है। जल जीवन मिशन एक सराहनीय प्रयास है लेकिन वह घपले-घोटालों, प्रशासनिक उदासीनता और भ्रष्टाचार के चलते सवालों के घेरे में है। योजनायें तभी सफलीभूत होंगी, जबकि क्रियान्वयन प्रभावी और ईमानदारी से हो। यह जान लेना जरूरी है कि साफ जल केवल सुविधा का विषय नहीं है, यह हरेक नागरिक का मौलिक अधिकार भी है। स्वच्छ पेयजल को जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं यथा – भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य की तरह प्रमुखता देनी होगी और जल प्रबंधन में जन-भागीदारी को आवश्यक बनाया जाये, तभी समाज, सरकार और प्रशासन इस दिशा में सार्थक परिणाम लाने में सफल होंगे।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।)

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