रीढ़ की हड्डी के नीचले स्थान पर ऊर्जा का अनन्त स्रोत विद्यमान

लेखक : प्रोफेसर (डॉ.) सोहन राज तातेड़
पूर्व कुलपति सिंघानिया विश्वविद्यालय, राजस्थान
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प्राच्य संस्कृति में जीवन मूल्यों को सुरक्षित रखने के लिए और दीर्घ जीवन जीने के लिए अनेक उपाय बताये गये है। उनमें से कुण्डलिनी जागरण भी एक है। प्रश्न उठता है कुण्डलिनी जागरण क्या है? आत्मा के भीतर अनन्तज्ञान, अनन्तदर्शन, अनन्तसुख का स्रोत विद्यमान है। उसे कैसे प्राप्त किया जाये, इसके लिए भारतीय शास्त्रों में अनेक विधियां बतायी गयी है। आत्मा में जो अनन्त सुख अवस्थित है उसकी उच्चतम स्थिति तक पहुंचना आत्मा का उपयोग कहा जाता है। आत्मा सच्चिदानंद स्वरूप है। आत्मा में अनन्त शक्ति विद्यमान है। आत्मा में ज्ञान का अनन्त स्रोत है। उसे खोजना कुण्डलिनी जागरण है। जो मोक्षगामी होना चाहता है वह इसे जाग्रत करता है। चैरासी लाख यौनियों में केवल मानव ही यह कार्य कर सकता है। अन्य जीव योनियां भोग योनियां है क्योंकि अन्य जीव योनियों में मानव की तरह कार्यप्रणाली नहीं है। अपने-अपने कर्मों का भोग करने के लिए इनका आविर्भाव हुआ है। मानव में विवेक शक्ति ही अन्य प्राणियों से मानव को अलग करती है। रीढ़ की हड्डी के नीचे शक्ति केन्द्र विद्यमान है, उसके भीतर सुषुम्ना तंत्र है।
रीढ़ की हड्डी के नीचले स्थान पर ऊर्जा का अनन्त स्रोत विद्यमान रहता है। साधना के द्वारा यदि उसको ऊपर उठाकर सहस्रार में चोटी के स्थान पर स्थापित कर दिया जाये तो ऊर्जा नष्ट नहीं होती। सम्पूर्ण कार्य प्राण ऊर्जा से होता है। प्राण ऊर्जा अनन्त शक्ति संपन्न है। यह भोजन, पानी, हवा और सूर्य के प्रकाश से बनती है। धूप के सेवन से प्राण शक्ति बढ़ती है। नीचे जो शक्ति केन्द्र है उसे ऊपर उठाकर लाना पड़ता है। जैसे बल्डप्रेशर नापने के यंत्र को जब दबाया जाता है तो उसका पारा ऊपर की और चढ़ता है, वैसे ही कुण्डलिनी जागरण के लिए गुदा को दबाकर ऊर्जा ऊपर उठानी होती है। बार-बार यह प्रक्रिया करनी चाहिए। कुंभक, पूरक और रेचक की विधि से प्राण ऊर्जा को संतुलित बनाया जाता है। धीरे-धीरे चित्त की एकाग्रता बढ़ती है। प्राण के सारे केन्द्र मस्तिष्क में है। प्राणधारा के दो मार्ग है, उसका एक बाह्य मार्ग है और एक भीतरी। बाह्य मार्ग से प्राण-शक्ति जाती है तो प्रत्येक कोशिका को सक्रिय करती है, हमारे शरीर-तंत्रों को सक्रिय बनाती है। ये हमारे दस प्राण केन्दों को सक्रिय करती है जो जीवन यात्रा को सही ढं़ग से चलाते हंै। जब हम प्राण-शक्ति के प्रवाहित होने वाले मार्ग को बदल देते है, तब वहां विशिष्ट शक्तियां जागृत हो जाती हैं। सुषुम्ना या मेरुरज्जु के मार्ग से प्राण-शक्ति को ज्ञान केन्द्र में ले जाने का प्रयोग है- अन्तर्यात्रा। यह हमारे भीतर विशिष्ट शक्तियों को जागृत करता है।
साधना में अन्तर्यात्रा का मुख्य प्रयोजन या उद्देश्य है- शक्ति का उध्र्वारोहण व विशिष्ट क्षमताओं को जागृत कर कुण्डलिनी जागरण करना। ऊर्जा का भंडार हमारे नीचे के केन्द्र शक्ति-केन्द्र के पास है। शक्ति केन्द्र में पड़ी हुई शक्ति काम नहीं आती है। शक्ति वही काम आती है जो ज्ञान केन्द्र के पास उपलब्ध होती है। जैसे कुएं में पानी बहुत है पर दैनिक जीवन के कार्यकलापों के लिए बार-बार कुएं पर नहीं जाया जा सकता है। कुएं से पानी का भंडारण घर पर कर लिया जाता है। प्राण शक्ति की धाराएं हमारी रीढ़ के भीतर प्रवाहित होती हैं। योग-शास्त्र की भाषा में प्राण की मुख्य तीन धाराएं है- ईड़ा, पिंगला, सुषुम्ना। इसमें ईड़ा की धारा जब अति सक्रिय होती है तो व्यक्ति निष्क्रिय, दब्बू एवं उदासीन हो जाता है। दूसरी और जब पिंगला की धारा अति सक्रिय होती है तो व्यक्ति आक्रामक, उत्तेजित एवं उद्दण्ड हो जाता है। इन दोनों ही नाडि़यों का संतुलन स्वास्थ्य व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक है। अन्तर्यात्रा का दूसरा उद्देश्य है- शक्ति का संतुलन स्थापित करना। चेतना की यात्रा कहां हो रही है ? यदि चेतना की यात्रा नीचे के केन्द्रों की तरफ अधिक होगी तो व्यक्ति सुख के लिए अपने से दूर बाहर की दुनियां में भटकता है। वह अपनी शक्तियों से अपरिचित रह जाता है। जब चित्त की यात्रा ऊपर के केन्द्रों की तरफ अधिक होती है तो व्यक्ति अपने आप से परिचित होता है एवं अन्तर्मुखता बढ़ती है।
इस शरीर में जो ऊर्जा के स्थान है, केन्द्र है, उन्हीें के पास वृत्ति और वासना के केन्द्र भी है। शक्ति केन्द्र के पास ही वासना का केन्द्र ‘स्वास्थ्य केन्द्र’ है और वृत्तियों का केन्द्र ‘तेजस केन्द्र’ है। जब तक शक्ति नीचे के केन्द्रों में रहेगी वह उनका पोषण करती रहेगी। यदि इस शक्ति का उध्र्वारोहण, रूपांतरण ज्ञान केन्द्र की ओर कर लेंगे तो ज्ञान का पौधा लहलहा उठेगा। प्राण, चित्त का अनुचर है। जहां-जहां चित्त की यात्रा होती है वहां-वहां प्राण भी उसका अनुगमन करता है। अन्तर्यात्रा में चित्त की यात्रा नीचे शक्ति-केन्द्र से ज्ञान-केन्द्र की ओर होती है। चित्त की यात्रा, सुषुम्ना के मार्ग के साथ आगे बढ़ती है। इसी के साथ प्राण की यात्रा भी ऊध्र्वमुखी होती है। योग शास्त्र की भाषा में इड़ा की अतिसक्रियता के जो परिणाम परिलक्षित हैं, विज्ञान की भाषा में वही परिणाम परानुकम्पी तंत्रिका तंत्र की अतिसक्रियता से आते हैं। इड़ा या परानुकंपी की अतिसक्रियता से व्यक्ति डरपोक, उदासीन और निराश हो जाता है। दूसरी और पिंगला या अनुकम्पी नाड़ी-तंत्र की अतिसक्रियता से व्यक्ति आक्रामक, उद्दण्ड व उच्छृंखल हो जाता है। मेरुरज्जु में चित्त की यात्रा दोनों तन्त्रों में संतुलन स्थापित करती है। व्यक्ति इससे संतुलित व स्वस्थ व्यवहार करता है। दीर्घ अभ्यास से व्यक्ति के जाग्रत मन या चित्त का नियंत्रण केन्द्रीय नाड़ी-तंत्र पर होता है। मानसिक शक्तियों का विकास जीवन की सफलता का एक प्रमुख घटक है।
इस शक्ति के सभी केन्द्र मस्तिष्क में स्थित है। हमारी स्मरण शक्ति, चिंतन शक्ति, तर्क शक्ति, निर्णय शक्ति, कल्पना शक्ति, समझ शक्ति, अभिव्यक्ति शक्ति आदि अनेक शक्तियों का केन्द्र मस्तिष्क है। सामान्यतः यहां ऊर्जा, ईंधन या शक्ति हमें आहार या श्वास से मिलती है। ये हमारी सामान्य शक्ति को ही जागृत करते हैं। शक्ति केन्द्र से ज्ञान केन्द्र की ओर शक्ति की यात्रा इन उच्च मानसिक शक्तियों को जागृत करती है। कुण्डलिनी जागरण के द्वारा ऊर्जा का उध्र्वारोहण होता है, जिससे मस्तिष्क में प्राणप्रवाह संतुलित एवं संवर्धित होता है। परिणामतः व्यक्ति का लिम्बिक सिस्टम सकारात्मक रूप से प्रभावित होता है तथा व्यक्ति में भावों के ऊपर नियंत्रण की क्षमता विकसित होती है। फलतः भावनात्मक रूप से स्थिर एवं संतुलित व्यक्ति का निर्माण होता है। कुण्डलिनी जागरण एक प्रायोगिक विषय है। चित्त को शक्ति केन्द्र पर ले जाएं। ऊपर उठाएं, सुषुम्ना के मार्ग से ज्ञान केन्द्र तक लाएं। फिर उसी मार्ग से शक्ति केन्द्र तक नीचे लाएं। नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे, सुषुम्ना में चित्त की यात्रा करें। वहां पर होने वाले प्राण के प्रकम्पनों का अनुभव करें। पूरी चेतना को सुषुम्ना में समेट लें। एक दो मिनिट बाद-चित्त की गति को श्वास की गति के साथ जोड़े। श्वास छोड़ते समय चित्त को नीचें से ऊपर ले जाए और श्वास भरते समय चित्त को ऊपर से नीचे लाएं। कुण्डलिनी जागरण के द्वारा शक्ति का ऊध्र्वारोहण व क्षमता का जागरण किया जा सकता है, इड़ा-पिंगला का संतुलन रखा जा सकता है। (लेखक के अपने विचार हैं)

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