एम्स की मांग और जमीनी हकीकत – मोहित चौहान

पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासी उपेक्षा:
लेखक : मोहित चौहान
लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं
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​पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जिसे देश का ‘हरित प्रदेश’ और आर्थिक रूप से सबसे समृद्ध क्षेत्रों में से एक माना जाता है, आज स्वास्थ्य के मोर्चे पर एक गंभीर संकट और सियासी सौतेलेपन का सामना कर रहा है। लगभग आठ करोड़ से अधिक की आबादी वाले इस विशाल भूभाग में एक अदद अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) की मांग दशकों पुरानी है। हर चुनाव में यह मांग हवा में तैरती है, वादों के पुल बांधे जाते हैं, लेकिन मतदान संपन्न होते ही यह ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है। यह केवल एक अस्पताल की मांग नहीं है, बल्कि पश्चिमी यूपी के करोड़ों नागरिकों के सम्मान और जीवन के अधिकार की लड़ाई है, जिसे राजनीति ने लगातार हाशिए पर धकेला है।
​अगर जमीनी हकीकतों को देखें, तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मरीजों के पास गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए केवल दो ही विकल्प बचते हैं—या तो वे मेरठ के लाला लाजपत राय (LLRM) मेडिकल कॉलेज की बदहाल व्यवस्था के भरोसे रहें, या फिर दिल्ली के एम्स (AIIMS) और सफदरजंग की तरफ दौड़ें। मेरठ का मेडिकल कॉलेज न केवल संसाधनों की कमी से जूझ रहा है, बल्कि इस पूरे क्षेत्र के मरीजों का भारी बोझ उठाने में अक्षम साबित हो रहा है। इसका नतीजा यह होता है कि गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर (नोएडा), हापुड़, बुलंदशहर, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, बागपत और बिजनौर जैसे जिलों से हर रोज हजारों एम्बुलेंस दिल्ली की सीमाओं की तरफ भागती हैं। दिल्ली के एम्स में पैर रखने की जगह नहीं है, वहां महीनों की तारीखें मिलती हैं, और कई बार मरीज दिल्ली के रास्तों के ट्रैफिक जाम में ही दम तोड़ देते हैं। जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं, वे निजी कॉर्पोरेट अस्पतालों में अपनी जिंदगी भर की कमाई लुटाने को मजबूर हैं। क्या एक समृद्ध क्षेत्र के नागरिकों की नियति यही है?
​राजनीतिक उपेक्षा की कहानी भी बेहद दिलचस्प और दर्दनाक है। उत्तर प्रदेश में गोरखपुर और रायबरेली जैसे शहरों को एम्स की सौगात मिली, जो बेहद जरूरी भी थी। लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जो राज्य के राजस्व (Revenue) में सबसे बड़ा योगदान देता है, उसे हमेशा नजरअंदाज किया गया। नेताओं का तर्क होता है कि पश्चिमी यूपी के पास दिल्ली का एम्स नजदीक है। लेकिन यह तर्क जमीनी हकीकत से आंखें मूंदने जैसा है। दिल्ली एम्स पर पूरे देश का बोझ है, ऐसे में पश्चिमी यूपी की आठ करोड़ आबादी को दिल्ली के भरोसे छोड़ देना नीतिगत विफलता नहीं तो और क्या है? जब भी चुनाव आते हैं, कभी मुरादाबाद, कभी मेरठ तो कभी बुलंदशहर में एम्स या एम्स जैसी सुविधाएं देने के खोखले वादे किए जाते हैं, पर धरातल पर ढाक के तीन पात ही नजर आते हैं।
​समय की मांग है कि अब इस क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था को ‘रेफ़रल सिस्टम’ (मरीज को आगे टालने की बीमारी) से मुक्त किया जाए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एम्स की स्थापना केवल एक चिकित्सा संस्थान का निर्माण नहीं होगा, बल्कि यह इस क्षेत्र के गरीब और मध्यम वर्ग को कर्ज के जाल में फंसने से बचाएगा। यहां कनेक्टिविटी (एक्सप्रेस-वे और नेशनल हाईवे) का बेहतरीन जाल है, जिससे अगर किसी केंद्रीय स्थान पर एम्स बनता है, तो मरीज चंद घंटों में विश्वस्तरीय इलाज पा सकेंगे। सरकार को यह समझना होगा कि एक्सप्रेस-वे और चमचमाती सड़कें तब तक अधूरी हैं, जब तक उन पर दौड़ती एम्बुलेंस को समय पर इलाज न मिल सके। अब वक्त आ गया है कि सियासी दल चुनावी घोषणापत्रों से आगे बढ़कर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस जायज हक को जमीन पर उतारें, क्योंकि सेहत पर सियासत और कितनी लाशों के बाद थमेगी, इसका जवाब अब जनता मांग रही है। (लेखक के पने विचार हैं)

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