ग्लोबल वार्मिंग से तीन गुणा ज्यादा तपेगी दुनिया – ज्ञानेन्द्र रावत

लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
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ग्लोबल वार्मिंग ने दुनियाभर में कहर ढाना शुरू कर दिया है। इसमें जलवायु परिवर्तन ने अहम भूमिका निबाही है। यहां तापमान वैश्विक औसत की तुलना में दोगुणी गति से बढ़ रहा है। इसके चलते लम्बे समय तक चलने वाली और हीटवेव की घटनायें ज्यादा तेजी से बढ़ रही हैं।हालात इस बात के सबूत हैं कि आने वाले दिनों में तापमान दो डिग्री तक पहुंच सकता है। दुनियाभर के शोध-अध्ययन इस बात के संकेत पहले ही दे चुके हैं। अध्ययनों की मानें तो ग्लोबल वार्मिंग के चलते असीमित गर्मी की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। योरोप की भयंकर गर्मी इस बात की चेतावनी है। वह बात दीगर है कि योरोप की इस भयंकर गर्मी को ‘हीटडोम’ कहें, ‘हीटवेव ‘ कहें या फिर उसे ‘ओमेगा हीटवेव ‘ की संज्ञा दी जाये, हकीकत यह है कि योरोप भीषण गर्मी के साये में झुलस रहा है। हालात की भयावहता का सबूत यह है कि योरोप के कई देश 1970 के दशक की तुलना में दो महीने अधिक ‘हीट स्ट्रेस’ का भीषण असर झेल रहे हैं। इसके लिए ग्लोबल वार्मिंग और जीवाश्म ईंधन जिम्मेदार है। मौसम विभाग के अनुसार योरोप महाद्वीप के कई हिस्सों में हीटडोम बना हुआ है जिससे भीषण गर्मी पड़ रही है।सूरज की गर्मी हर दिन इसमें इजाफा करती है। नतीजतन बारिश और ठंडी हवायें भी राहत नहीं दे पातीं। हीटडोम चिंताजनक इसलिए भी है कि ये बहुत ही धीमी गति से आगे बढ़ते हैं। इससे लोग लम्बे समय तक गर्मी झेलने को मजबूर होते हैं।
देखा जाये तो फ्रांस, इटली, ब्रिटेन, स्पेन, स्विट्ज़रलैंड, जर्मनी, मैक्सिको, बेल्जियम और नीदरलैंड में स्थिति ज्यादा भयावह है। फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और इटली की सरकारों ने रेड अलर्ट जारी किया हुआ है। पूरे स्पेन में गर्मी का अलर्ट है। बेल्जियम और नीदरलैंड में भीषण गर्मी के चलते अभी तक 3700 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। स्थानीय अधिकारियों की मानें तो यह आंकड़े शुरूआती हैं। आने वाले दिनों में इसमें और बढ़ोतरी हो सकती है। फ्रांस में अधिकांश हिस्सों में हाई अलर्ट है। वहां के 54 विभागों में रेड अलर्ट है। यहां 1947 के बाद यहां सबसे अधिक गर्म दिन और गर्मी इस बार देखी गयी है। यह वहां पर अभूतपूर्व स्थिति का द्योतक है। वहां हालात इतने खराब हैं कि वहां पर गर्मी से राहत पाने की कोशिश जानलेवा साबित हो रही है। इसी कोशिश में वहां जलाशयों व नदियों में गये तकरीबन 40 से ज्यादा लोगों की डूबने से मौत हो चुकी है। एफिल टावर के पास ट्रोकडेरो फाउंटेन में गर्मी की वजह से राहत की खातिर लोग कूदते देखे गये हैं। वहां शवों को रखने की जगह कम पड़ रही है। यही नहीं वहां घरों में रहने वालों और 45 से अधिक उम्र के लोगों के मरने की तादाद सबसे ज्यादा यानी 91 फीसदी है। बेल्जियम और नीदरलैंड में भी सबसे ज्यादा 85 साल से ज्यादा उम्र के लोगों की मौतें हुयी हैं। यह हालात की भयावहता का जीता-जागता सबूत है। इन हालातों ने स्वास्थ्य चुनौतियों को बढ़ा दिया है। परिवहन सुविधाओं पर भी काफी दबाव पड़ा है। लोग मानने लगे हैं कि अब ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को गंभीरता से लेने का समय आ गया है। इसमें देरी तबाही के खतरों को और बढ़ा देगी।

विशेषज्ञों के अनुसार योरोप में जानलेवा गर्मी के कहर से वहां गर्मी के रिकॉर्ड टूट सकते हैं। वैज्ञानिक इसे ‘ओमेगा ब्लाक’ नामक दुर्लभ मौसमी पैटर्न की संज्ञा दे रहे हैं। उनके अनुसार ओमेगा ब्लाक के चलते योरोप के कई देशों में तापमान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया है। इससे जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। स्कूल बंद करने पड़े हैं। बिजली आपूर्ति प्रभावित हुयी है और पौल्ट्री फार्मों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। विशेषज्ञों के अनुसार इस असामान्य गर्मी के पीछे ओमेगा ब्लाक नामक मौसमी पैटर्न जिसमें उच्च दबाव का क्षेत्र ग्रीक अक्षर ‘ओमेगा’ के आकार का बन जाता है। यह गर्म हवा को लम्बे समय तक एक ही इलाके में रोककर रखता है जिससे अमूमन तापमान सामान्य से 18 डिग्री सेल्सियस तक अधिक हो सकता है। फ्रांस के दक्षिण-पश्चिमी शहर पिसोस में तापमान 44.3 डिग्री को पार कर गया। उत्तर – पश्चिमी शहर ब्रिटनी में बिजली आपूर्ति ठप्प होने से हजारों लोग प्रभावित हुए, वहीं परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को भी उत्पादन में सात फीसदी की कटौती करने को बाध्य होना पड़ा। कारण शीतलन के लिए वहां पर्याप्त पानी का अभाव था। इससे बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान हुआ है और स्वास्थ्य
सेवाओं पर भारी दबाव पड़ा है सो अलग। वहीं इटली में फ्लोरेंस, मिलान,रोम, ट्यूरिन, वेरोना सहित सोलह शहरों में उच्च स्तर का हाई अलर्ट जारी करना पड़ा।

ब्रिटेन में बढ़ते तापमान के कारण समय से पहले स्कूलों को बंद करना पड़ा। फ्रांस में कारों में अत्याधिक तापमान के कारण छोटे बच्चे मौत के मुंह में चले गये। यहां के ब्रिटनी और पेज दे ला लोआर इलाके में बहुतेरे पौल्ट्री फार्म में अत्याधिक गर्मी से लाखों पक्षियों की मौत हो गयी। स्पेन में हीट स्ट्रोक से कई बुजुर्गों की मौत हो गयी। मौसम विज्ञानियों ने आशंका जतायी है कि यह गर्मी 2003 की योरोप में आयी विनाशकारी हीटवेव जैसी हो सकती है जिसमें तकरीबन 80,000 से ज्यादा लोग मौत के मुंह में चले गये थे। हालात की भयावहता का पता इससे चल जाता है कि फ्रांस में पेरिस के समीप ओरली के शवगृह के संचालक जौहेर हेतेंली की मानें तो उनके यहां शवों को रखने के सभी स्थान भर चुके हैं। अंतिम संस्कार में देरी के कारण शवों को सामान्य से अधिक समय तक सुरक्षित रखना पड़ रहा है। वहां अतिरिक्त शवों के लिए रेफ्रिजरेटेड ट्रेलर इस्तेमाल करने और अतिरिक्त जगह की जरूरत बतायी है। मरने वालों की बढ़ती तादाद को देखते हुए कई जगहों पर अंतिम संस्कार हेतु 10 जुलाई तक इंतजार करने को कहा गया है।
दरअसल अध्ययनों ने एक साल पहले ही चेता दिया था कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण तीन गुणा असीमित गर्मी पड़ने की संभावना है जिसके कारण लोग सहने की क्षमता से काफी मात्रा में प्रभावित होंगे जिनमें युवकों की तादाद ज्यादा होगी। नेचर रिव्यू अर्ध एण्ड इनवायरमेंट में प्रकाशित किंग्स कालेज के अध्ययन के निष्कर्ष के अनुसार स्वस्थ और युवा वयस्कों को बढ़ती गर्मी के चलते होने वाली कठिनाई की सीमा तीन गुणा होने की संभावना व्यक्त की गयी थी। अध्ययन कर्ताओं ने चेतावनी दी थी कि जिस क्षेत्र में अत्याधिक गर्मी जैसे हालात होंगे, वहां वृद्ध लोगों को गर्मी से 35 फीसदी खतरा ज्यादा होगा। असलियत में होता यह है कि 60 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों के शरीर उम्र से सम्बंधित परिवर्तन के कारण अत्याधिक गर्मी के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। इनमें कम पसीना आना और धीमा रक्त सर्कुलेशन होता है। अध्ययन कर्ता प्रोफेसर टाम मैथ्यूज के अनुसार यदि वैश्विक तापमान दो डिग्री तक पहुंच जाता है तो इसके घातक परिणाम होंगे। इससे वृद्ध लोगों के लिए अबतक जीवित न रह पाने वाली गर्मी की सीमायें बढ़ी हैं। वहीं इससे युवा आने वाले समय में अधिक जूझते नजर आयेंगे। ऐसे में लंबे समय तक बाहर रहने वाले के अलावा छाया में रहने वाले लोग भी घातक हीटस्ट्रोक की चपेट में आ जायेंगे। शोधकर्ताओं का दावा है कि असहनीय गर्मी में शरीर का मुख्य तापमान छह घंटे के भीतर 47 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है। यह स्थिति खतरनाक हो सकती है। इसलिए सरकारों को अब ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को गंभीरता से लेना होगा अन्यथा मानव जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा। (लेखक के अपने विचार हैं)

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