
लेखिका : लता अग्रवाल
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)।
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भारतीय संस्कृति में सावन का महीना केवल ऋतु परिवर्तन का प्रतीक नहीं है बल्कि आस्था, आध्यात्मिक चेतना और जीवंत लोक संस्कृति का अनूठा संगम है। झुलसती गर्मी के बाद आसमान से बरसती मानसून की फुहार जब सूखी धरती को हरियाली से ढक देती है तो संपूर्ण प्रकृति एक नए उल्लास और शृंगार से सराबोर हो उठती है। धार्मिक दृष्टि से यह पूरा महीना देवों के देव महादेव भगवान शिव की आराधना के लिए सर्वोत्तम माना गया है। इसी मास में समुद्र मंथन से निकले हलाहल को पीकर शिवजी ने सृष्टि की रक्षा की थी जिससे उनके कंठ को मिली दाह और तपन को शांत करने के लिए आज भी भक्त शिवलिंग पर गंगाजल और दूध अर्पित करते हैं। कावड़ यात्रा की कठिन तपस्या और सावन के सोमवार के पावन व्रत श्रद्धालुओं की भक्ति को दर्शाते हैं। सांस्कृतिक रूप से यह महीना आपसी प्रेम, पारावारिक मिलन नारी शक्ति के उत्सव का काल है। जहां पेड़ की डालियों पर पड़े झूले, जैसे गुंजते कजरी और मल्हार राग के पारम्परिक गीत। हाथों में रची मेहंदी, हरियाली तीज, नाग पंचमी, रक्षाबंधन जैसे त्यौहार सामाजिक समरसता को और गहरा करते हैं। (लेखिका के अपने विचार हैं)