
लेखक : मोहित चौहान
(सामाजिक कार्यकर्त्ता)
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सहारनपुर से लेकर बागपत, मेरठ, मुजफ्फरनगर, शामली, गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा तक फैली पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उपजाऊ और समृद्ध माटी आज एक भयानक और खौफनाक स्वास्थ्य संकट के दौर से गुजर रही है। जिस धरती ने कभी देश का पेट भरने के लिए लहलहाती फसलें दीं, आज उसी माटी के बाशिंदे पीने के पानी की हर एक बूंद में जहर घोलने को मजबूर हैं। पश्चिमी यूपी की जीवनदायिनी मानी जाने वाली हिंडन और कृष्णा नदियां अब केवल मृत जलस्रोत नहीं रहीं, बल्कि एक पूरी सभ्यता के लिए ‘साइलेंट किलर’ (धीमा जहर) का रूप ले चुकी हैं।
अखबारों की सुर्खियों और विभिन्न जांच रिपोर्टों में दर्ज आंकड़े किसी भी संवेदनशील समाज की रूह कंपा देने के लिए काफी हैं। बागपत जिले के गंगनौली, असारा, बरनावा और पट्टी बंजारन जैसे गांवों में स्थिति विकराल है। गंगनौली गांव में बीते कुछ वर्षों में दर्जनों लोगों की मौत अकेले कैंसर से हो चुकी है, जबकि दर्जनों लोग आज भी जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। अकेले चौगामा क्षेत्र के दर्जनों गांवों में 400 से अधिक कैंसर मरीज और सैकड़ों लोग विकलांगता, रीढ़ की हड्डी की विकृति, गुर्दे की खराबी और त्वचा रोगों से ग्रसित हैं। बरनावा में एक ही परिवार के तीन बच्चे मूक-बधिर हैं, जबकि दर्जनों परिवार ऐसे हैं जिन्होंने अपने कमाने वाले चिरागों को कैंसर और हृदयघात में खो दिया है। विभिन्न प्रशासनिक आंकड़ों के इतर जमीनी हकीकत यह है कि सहारनपुर से बागपत बेल्ट के दर्जनों गांव और लाखों की आबादी सीधे तौर पर इस दूषित पेयजल के जानलेवा दंश को झेल रही है।
सरकारी कागजों के इतर जब नदियों और भूजल के नमूनों की जांच कराई गई, तो यह सामने आया कि पानी में टीटीएस, सल्फाइड और जहरीले हेवी मेटल्स (जैसे आर्सेनिक, सीसा, कैडमियम, क्रोमियम और निकेल) की मात्रा तय सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक पाई गई है। यह जहरीला रसायन सीधे इंसानी शरीर के डीएनए, बोन मैरो और अंगों को नुकसान पहुंचा रहा है।
यह त्रासदी किसी प्राकृतिक आपदा का नतीजा नहीं है, बल्कि यह विशुद्ध रूप से एक प्रशासनिक-राजनीतिक विफलता और आपराधिक लापरवाही है। सहारनपुर से लेकर गाजियाबाद तक फैले शुगर मिल, पेपर मिल, डिस्टिलरी और केमिकल यूनिट्स रात के अंधेरे में अपना गाढ़ा, काला और तेजाबी कचरा बिना ट्रीट किए नदियों में उड़ेल देते हैं। एनजीटी और कड़े दिशा-निर्देशों के बावजूद जमीनी स्तर पर दोषी उद्योगपतियों पर कोई सख्त आपराधिक कार्रवाई नहीं होती। दूसरी तरफ, जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी अक्सर पानी और कैंसर के सीधे संबंधों को खारिज कर पल्ला झाड़ लेते हैं। दूषित हैंडपंपों को चिन्हित तो किया गया, लेकिन करोड़ों रुपये की लागत से बनी जल निगम की पानी की टंकियां लीकेज और रखरखाव के अभाव में ठप पड़ी हैं, जिससे ग्रामीण दूषित पानी पीने को मजबूर हैं।
विडंबना देखिए कि जिस पश्चिमी उत्तर प्रदेश को एक्सप्रेस-वे और चमचमाते शहरों का ढांचा दिया जा रहा है, वहां के नागरिक प्राथमिक इलाज के लिए भी तरस रहे हैं। जब किसी गरीब ग्रामीण को कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का पता चलता है, तो उसके पास स्थानीय स्तर पर कोई सुपर-स्पेशलिटी अस्पताल नहीं होता। मरीज को या तो दिल्ली के AIIMS की अनगिनत किलोमीटर लंबी कतारों में अपनी बारी का इंतजार करते-करते दम तोड़ना पड़ता है या फिर अपनी जमीन-जायदाद बेचकर निजी अस्पतालों के कर्ज में डूबना पड़ता है।
यह मामला केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि संविधान के तहत मिलने वाले जीने के मौलिक अधिकार के सीधे उल्लंघन का है। सरकार और शासन को तत्काल प्रभाव से इस क्षेत्र (मेरठ/बागपत बेल्ट) में एक समर्पित AIIMS अथवा राष्ट्रीय स्तर के कैंसर शोध व उपचार संस्थान की स्थापना को युद्धस्तर पर मंजूरी देनी चाहिए। साथ ही हिंडन-कृष्णा बेल्ट में जहरीला रसायन बहाने वाली इकाइयों के खिलाफ एक विशेष टास्क फोर्स गठित कर सख्त आपराधिक कार्रवाई की जाए, और प्रभावित गांवों में तुरंत विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीमें भेजकर मुफ्त स्क्रीनिंग व शुद्ध पेयजल की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
चुनावों के समय नदियों की सफाई और स्वास्थ्य सुविधाओं के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव बीतते ही जनता को घुट-घुट कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। नीति-नियंताओं को यह याद रखना होगा कि बीमार और लाचार नागरिकों के कंधों पर कभी सशक्त राष्ट्र का निर्माण नहीं हो सकता। यदि समय रहते इस जहरीले दंश को नहीं रोका गया और चिकित्सा के मोर्चे पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां इस चुप्पी को इतिहास का सबसे बड़ा अपराध मानेंगी। (लेखक के अपने विचार हैं)