
(A contrbution and relevance in these miserable situations)
सर सैयद डे पर विशेष
लेखक : शरफुद्दीन बैग (अलीगढ़)
www.daylifenews.in
सर सैयद अलैहिरहमा की याद में17 अक्टूबर को पूरी दुनिया में ,,sir syad day,, मनाया जाता है। यह रस्म अदायगी सालों से होती रही हे। आज भी होगी, यकीनन होनी ही चाहिए । मगर जब कोई कोम अपने दौर के किसी बड़े संकट या क्राइसिस से दो-चार होती है तो वह अपने अहद की बड़ी शख्सियत ओर उनके कारनामों और उनके बताए हुए रास्ते की तरफ देखती हैं। सर सैयद इस लिहाज से आज सबसे ज्यादा अहम ओर relevant हैं। सर सैयद एक माहिर ए तालीम, समाज सुधारक, जायद आलिम ए दीन, विचारक, अदीब, सहाफी, मुफस्सिर , दाई ए इस्लाम ओर एक मुख्लिस ओर दर्दमंद रहनुमा थे। उनके कारनामों की लिस्ट लंबी हे। मगर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक जिंदा जावेद कारनामा हे। सर सैयद दर असल अपने आप में एक इदारा थे,एक तहरीक और आंदोलन थे। अलीगढ़ तहरीक से सब वाकिफ हैं।
इस पोस्ट में उनके विजन , हिक्मत ए अमली ओर उन उसूलों का जिक्र मकसूद हे , जो आज हमारे लिए इन हालात में इंतहाई मुफीद हैं।
मुसलमानों की 1000 साल की हुकूमत के खात्मे के बाद अंग्रेजों ने 1857 के गदर में मुसलमानों पर जो जुल्म के पहाड़ तोड़े, उनको उनके मजहबी ,सामाजिक ,तालीमी , इकोनॉमिक, और तहज़ीबी, हुकूक से मेहरूम किया ।वह मुल्क में एक बेबस, मजबूर और मायूसी का शिकार हुए तो सर सैयद ने कोम को इन हालात से निकालने और आगे का रास्ता दिखाने के लिए मुख्तलिफ मैदानों में जो उसूल और हिक्मत ए अमली अपनाई, उन्हें आज हम इन हालत में अपने लिए मशाल ए राह बना सकते हैं।
इनको पांच तरह से categarize किया जा सकता। उनकी तमाम कोशिशों का मरकज यही उसूल और हिक्मत ए अमली थी।
(1) Educatin and charachtar
इल्म और अखलाक यानी नॉलेज और करैक्टर में हम अपने आप को बेहतर और
बर तर साबित करें। मुस्लिम आज इल्म व अखलाक यानी नॉलेज और करैक्टर के क्राइसिस में मुब्तिला है ।हमारा आज का सबसे बड़ा मसला हमारी तालीमी पसमांदगी और अखलाक की बदहाली है। सर सैयद ने सबसे पहले इसी मैदान में काम शुरू किया।
तालीम के साथ तरबियत को भी अहमियत दी।तालीम की holistic approch अपनाई। दीन ओर दुनिया की तालीम में तफ़रीक नहीं की। दीन से बेजार देहरिए पैदा नहीं किए ओर न ही हालात से गाफिल मुल्लाओं की जमात तैयार की, बल्कि ऐसे मुस्लिम हिंदुस्तानी शहरी तैयार किए जिनके एक हाथ में कुरान ,दूसरे हाथ में scince , फलसफा एंड technology का इल्म और उनकी पेशानी पर,, ला इलाहा इल्लल्लाह,, होता था। जिन्होंने दुनिया के हर कोने में नुमायां कारनामे अंजाम दिए।
( 2) Mitual understanding and respect, peace and harmony।
जिस मुल्क में हम रहते हैं वह मुल्क मुख्तलिफ कोमो , तहज़ीबो और परंपराओं का मुल्क है जहां किसी भी कोम को आगे बढ़ने के लिए दूसरी कोमो के साथ फ़िरकवारना सद्भाव, आपसी मोहब्बत, भाईचारा और रवादारी का रवैया इख्तियार कर हर हाल में हालात को शांति और सद्भाव के माहौल को बनाए रखना जरूरी हे ।सर सैयद ने हिंदू और मुसलमान को मुल्क की दो खूबसूरत आंखों से तस्बीह दी हे। हालात कैसे भी रहे हो सब्र, तहजीब व शाइस्तगी ,आपसी संवाद ,ओर एक दूसरे के एहतराम ओर हुस्न ए अखलाक के हथियार से न सिर्फ हर मोर्चे बल्कि आखिरी जंग को जीता। आज भी इसी की जरूरत हे।
(3) Avoide confruntation and compromising adjusting attitude।
मुल्क में किसी भी सूरत में टकराव की सूरत हाल ना बने ,बल्कि आपसी समझदारी, मफाहिमत ओर मसा लिहत आपसी खैर खुआही का रवैया इख्तियार किया । अकलियत के तौर पर नहीं ,बल्कि अपनी दीनी तालीमात के तकाजे से। अंग्रेज के साथ coordinte कर अपने मिशन के लिए उनका coopration हासिल किए रखा। आज इसकी अहमियत बहुत ज्यादा हे।
(4) Adopting realistic approch and to explore opportunities in challanges।
सबसे बड़ा काम जो मुसलमानों को करना है वह हकीकत पसंदी realistic approch , और दानिश मंदी rationality का रवैया अपनाना चाहिए। ग्राउंड लेवल पर जो हकीकत है उस हकीकत को तस्लीम करते हुए अपने लिए तरक्की के और आगे बढ़ाने के हर मुमकिन रास्ते तलाश करने हैं । जो challanges है उनको apportunity में बदलने की collective wisdom पैदा करनी हे। सर सैयद ने यह करके दिखाया ओर बहुत कुछ पाया इस कोम के लिए।
(5) Reconstruction of relegious thoughts।
अल्लाह का दीन मजहब ए इस्लाम हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी नेमत और guidence है ,जिसको सही तौर पर समझ के अमल करके और इसकी बुनियाद पर अपने आप को खड़ा करने की शदीद जरूरत है ।आज का सबसे बड़ा मसला यह भी है की जो रिवायती मजहबी फिकर( traditional relegious thoughts) के नतीजे में बहुत से मसाइल पैदा हुवे हैं,जिनका ताल्लुक हमारी तालीम, तहजीब, समाजी जिंदगी और सियासत से है । सर सैयद ने दीन को कुरान और सुन्नत की रोशनी में समझ कर हालात के तकाजों के पैसे नजर रिलिजियस थॉट को रिकंस्ट्रक्ट करने की भी कोशिश की। उसमें तहकीक और इज़्तिहाद का अमल शुरू किया। ताकि कोम मजहब की सही बुनियादों पर खड़े होकर इन हालात में दुनिया की दीगर कोमो के साथ तरक्की करते हुए उनकी रहनुमाई कर सके । यह सलाहियत उनके अंदर पैदा की।
ये पांच मैदान है जिनको बुनियाद बनाकर सर सैयद ने उन हालात में इस कोम को उन हालात से निकाल के तरक्की की राह पर आगे ले जाने के लिए योगदान दिया।
आज जरूरत इस बात की है की इन हालात में हम 1=तालीम ओर अखलाक में अपने आप को बेहतर करने, 2=हर तरह के टकराव से बचने, आपसी समझदारी और मफाहिमत की राह इख्तियार करने 3= हकीकत पसंदी realistic approch से काम लेने 4=अपनी मजहबी फिक्र की खालिस कुरान w सुन्नत ki बुनियाद पर तजदीद व तशकील ए नौ करने । 5 = जो जहां जिस मैदान में हे वहां अपनी सलाहियत , अवसर , ओर संसाधनों के अनुसार अपने हिस्से का काम करने से ही हम अपने लिए रास्ते बना पाएंगे। वरना तो,,,,,,,,,,,,,, खुदा ने आज तक उस कोम की हालत नहीं बदली ,,,,, न हो जिसको श उर खुद अपनी हालत के बदलने का।
सर सैयद के इन आजमाए हुवे नुस्खों को बेहसियत individual और कोम के अपनाते हुवे अपने लिए आगे बढ़ने की राहें तलाश करें तो यकीनन सूरत ए हाल बदल सकती हे।
सर सैयद day के मौके पर उनकी इसी सोच को आम ओर योगदान को आगे बढ़ाने के लिए अपने अपने स्तर पर शुरूआत करदेना ही उनको सच्ची खिराज ए तहसीन श्रद्धांजलि होगी।
ए मेरे , मोहसिन मुल्क व मिल्लत के रहनुमा ।।
तेरी अजमत, तेरी शोहरत ,तेरी हशमत को सलाम।।
हासिल हो तुझको जन्नत में वो आली मुकाम।।
जिसकी हसरत करे , कोम का हर नौजवान।।
(लेखक के अपने विचार हैं)