अलनीनो के भयावह खतरे – ज्ञानेन्द्र रावत

लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
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तेजी से बढ़ रहा अलनीनो भयावह खतरे का सबब बनता जा रहा है। इसको देखते हुए संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटारेस पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि अलनीनो घर के अंदर दाखिल हो चुका है और गर्मी बढ़ा रहा है। इससे भुखमरी बढ़ेगी। दुनिया के मौसम विज्ञानियों ने अलनीनो के खतरनाक स्तर को सुपर-डुपर अलनीनो नाम दिया है। इस बाबत शिकागो यूनिवर्सिटी की एनर्जी पालिसी इंस्टीट्यूट की हालिया रिपोर्ट ने अलनीनो की भयावहता का खुलासा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक सामान्य वर्षों की तुलना में सुपर-डुपर अलनीनो के कारण अगले छह महीनों में समूची दुनिया में करीब 4.51 लाख अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। इनमें भारत में गर्मी से जुड़ी बीमारियों से करीब 15,800 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। इस बाबत क्लाइमेट ट्रेंड्स की निदेशक आरती खोसला का मानना है कि अत्याधिक गर्मी का सिर्फ एक दिन अनुमानित तौर पर लगभग 3400 अतिरिक्त मौतों का कारण बनता है। अलनीनो पहले से गर्म होती जलवायु के ऊपर अपना असर दिखा रहा है जिससे आने वाले महीनों में तापमान के रिकॉर्ड टूटने की संभावना बढ़ रही है। इस बार फरवरी में ही गर्मी दस्तक दे सकती है। सुपर अलनीनो के प्रभाव से आने वाले महीनों में वैश्विक स्तर पर सतह का तापमान 1.2 डिग्री सेल्सियस तक अधिक रह सकता है। अनुमान है कि अगले 20 वर्षों तक तापमान ऐसा ही देखने को मिलेगा। विश्व मौसम संगठन की हालिया चेतावनी ने कि -‘अलनीनो फरवरी 2027 तक बना रह सकता है। उस स्थिति में इसका असर भारत में अगले मानसून की शुरुआत तक रहने की संभावना है। सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि यह सर्दियों की बारिश और तापमान को भी प्रभावित कर सकता है। यही नहीं दुनिया के कई हिस्सों में तापमान और बारिश के पैटर्न भी इससे प्रभावित हो सकते हैं। नतीजतन कहीं सूखे की स्थिति बन सकती है तो कहीं सामान्य से अधिक बारिश और बाढ़ का खतरा बढ सकता है। डब्ल्यूएमओ की मानें तो इस अलनीनो का असर और भी व्यापक हो सकता है। यह खतरनाक संकेत है।

दरअसल डब्ल्यूएमओ के पूर्व अनुमान के मुताबिक नवम्बर महीने में तापमान के पीक पर पहुंचने की संभावना जताई गई थी। लेकिन अब प्रशांत महासागर में विषुवत रेखा के पास समुद्र का तापमान मौजूदा समय में सामान्य से तीन गुणा अधिक है और इसमें तेजी से बढ़ोतरी की ज्यादा संभावना है। समुद्र की गहराई में भी कई हिस्सों में पानी सामान्य से आठ डिग्री तक ज्यादा गर्म पाया गया है जिसने अलनीनो को और ताकत दी है। वैज्ञानिकों की एकमुश्त राय है कि दुनिया के सभी भूभागों में इस साल के नवम्बर महीने तक सामान्य से अधिक तापमान रहेगा। फिर पहले से गर्म हो रही धरती पर अलनीनो के असर से गर्मी और बढ़ेगी। यही नहीं बारिश और तापमान के साथ सूखे और बाढ़ का खतरा भी बना रहेगा। इस सच्चाई को दरगुजर नहीं किया जा सकता कि प्रशांत महासागर का पानी गर्म होने पर भारत की ओर आने वाली हवा के दबाव और उसकी दिशा में बदलाव आता है। इससे बादलों की आवाजाही और बारिश का रास्ता भी बदल सकता है। यही वह अहम कारण है कि प्रशांत महासागर में होने वाला बदलाव भारत जैसे हजारों किलोमीटर दूर देशों के मौसम को भी प्रभावित करता है। यही वजह रही जिसके चलते इस साल इसका असर मानसूनी बारिश पर साफ-साफ दिखाई दिया।

मौसम विज्ञानियों की मानें तो अलनीनो का असर केवल मानसून तक सीमित नहीं रहेगा। इसके मजबूत रहने पर सर्दियों में भी तापमान सामान्य से ज्यादा रहने की उम्मीद है। जबकि उत्तर भारत में सर्दियों के छोटे होने और फरवरी-मार्च में गर्मी बढ़ने का रुझान पहले ही से देखा जा रहा है। यही नहीं पश्चिमी विक्षोभ, हिमालयी बर्फबारी और हिंद महासागर की स्थिति की भूमिका भी इसमें काफी महत्वपूर्ण होगी। जबकि 2023-24 के मजबूत अलनीनो ने 2024 को दुनिया का सबसे गर्म साल बनाने में प्रमुख भूमिका निबाही थी। ठीक उसी तरह इस साल भी तापमान का नया रिकार्ड बनने क खतरा बना हुआ है। इस बात की प्रबल संभावना है कि दिसम्बर महीने में तापमान उच्च स्तर तक पहुंचेगा। इससे पहले अलनीनो की स्थिति और तीव्र होगी जो चार डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। गौरतलब है कि यह अबतक का सर्वाधिक तापमान होगा। इससे यह स्पष्ट है कि अलनीनो का दायरा लगातार बढ़ रहा है यानी वह विस्तृत हो रहा है। इससे पहले 2015 में अधिकतम 2.6 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी का रिकार्ड है।

प्रख्यात मौसम विज्ञानी रयान माउ का कहना है कि अलनीनो सर्दियों में अपनी अधिकतम शक्ति पर बना रहेगा और अमेरिका को छोड़कर हर जगह वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी होगी। यही नहीं एक अन्य प्रसिद्ध जलवायु विज्ञानी जेक हासफादर की राय है कि इस बार अलनीनो लगातार नये रिकार्ड बना रहा है। प्रभावित क्षेत्रों में तापमान सामान्य से 3.4 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है जो इतिहास में दर्ज किसी भी पिछले अलनीनो से अधिक है। यह 1950 के बाद से दर्ज की गयी सबसे शक्तिशाली मौसमी घटनओं में से एक हो सकती है। प्रशांत महासागर से अत्याधिक मात्रा में रुकी गर्मी बाहर निकलने के कारण धरती का एक बड़ा हिस्सा असामान्य रूप से गर्म स्थितियों का सामना करने को विवश होगा। इसको दृष्टिगत रखते हुए इसकी प्रबल संभावना है कि तापमान के सामान्य स्तर तक आने में फरवरी की जगह और आगे का समय यानी मार्च-अप्रैल तक और तो और मानसून तक अलनीनो की स्थिति बनी रह सकती है।

दरअसल अलनीनो की स्थिति में मानसून कमजोर और अनियमित रहता है। साथ ही ज्यादा गर्मी पड़ने से मिट्टी में नमी कम हो जाती है जिससे खरीफ की फसलों की पैदावार घटने का अंदेशा बना रहता है। खरीफ का सीजन सीधे-सीधे देश की खाद्य सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। धान, मक्का, दालें और तिलहन जैसी प्रमुख फसलें इसी मौसम में बोई जाती हैं। ऐसे में अलनीनो का खतरा केवल मौसम का मुद्दा नहीं है, बल्कि उत्पादन, खाद्य कीमतों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में बड़ी चिंता उन क्षेत्रों को लेकर है जहां खेती अब भी बारिश पर ही निर्भर है। देश के आधे से ज्यादा कृषि क्षेत्र में सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। वहां के किसानों की उम्मीदें सीधे-सीधे मानसून पर ही टिकी रहती हैं। फिर अलनीनो के चलते देश में मानसूनी बारिश सामान्य से 12.6 फीसदी कम हुयी है। सरकार भी इस बात को स्वीकारती है कि खरीफ सीजन में सूखे जैसे हालातों के कारण कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश के कुछ हिस्सों, तेलंगाना, राजस्थान के कुछ हिस्से प्रभावित हुए हैं। इन राज्यों को तो सरकार सूखाग्रस्त घोषित कर ही चुकी है।नतीजतन मौसम की अनिश्चितता के परिणाम स्वरूप जहां कृषि उत्पादन प्रभावित हुआ है, वहीं खाद्य मंहगाई का जोखिम भी बढ़ गया है। सरकारी आंकड़ों की मानें तो बीते महीने खुदरा मंहगाई दर बढ़कर 5.54 फीसदी हो गई जबकि खाद्य मंहगाई दर 7.4 फीसदी रही। जबकि जमीनी स्तर पर मंहगाई का असर उससे भी कहीं अधिक रहा है। अलनीनो के दुष्परिणाम स्वरूप धान की बुआई 17 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में घटी है। अनुमान है कि इससे तकरीब 70 लाख टन धान का उत्पादन घट जायेगा। देश में अकेले पंजाब में ही कुल मिलाकर 13,500 हैक्टेयर से अधिक फसल का नुकसान हुआ है। इसी तरह हरियाणा, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर फसल का नुकसान हुआ है। बुआई में देरी से अगली फसल के आने में समय लगेगा जिससे कीमतों में गिरावट की उम्मीद बेहद कम है।

इस बाबत क्रिसिल इंटेलीजेंस की रिपोर्ट की मानें तो इससे घरेलू खाने की थाली भी अछूती नहीं रही है। नतीजतन बीते साल के मुकाबले शाकाहारी थाली की लागत कीमत में 10 फीसदी और मांसाहारी थाली की लागत कीमत में छह फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। चीनी और अंडे के दाम भी तेजी से बढ़े हैं। चीनी के दामों में तो 40 फीसदी का इजाफा हुआ है। इसकी एक वजल ऐथेनाल का उत्पाद भी है। जिस तरह गन्ने का उत्पादन गिरा है, यदि उसी तरह मक्के का उत्पादन गिरा जैसी कि आशंका व्यक्त की जा रही है, तो चीजों के दामों में और इजाफा होगा। मक्के के दाम में तो पहले ही से 30 फीसदी की बढोतरी हो गयी है। चावल और सोयाबीन जैसी फसलें भी संकट में हैं। दाल से तेल के दाम भी बढ़ेंगे। पिछले एक साल से खाद्य पदार्थ के दामों में भारी इजाफा हुआ है। इससे आम आदमी का रसोई का बजट भी बिगड़ रहा है और भविष्य में उस पर और ज्यादा दबाव की आशंका है।

दर-असल भारत अलनीनो के चलते सर्वाधिक जोखिम वाले देशों में शामिल है। क्लाईमेट ट्रेंड्स की मानें तो उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में अलनीनो और जलवायु परिवर्तन का सीधा असर खेती के जोखिम बढ़ा रहा है। वर्ष 2050 तक दोनों के मिले-जुले प्रभाव से वैश्विक फसल पैदावार आधार स्थिति के मुकाबिले 10 से 25 फीसदी तक घट सकती है। सच्चाई यह है कि तापमान में बढ़ोतरी से फसलों की पैदावार आठ फीसदी और कारखानों के राजस्व में दो फीसदी की गिरावट आती है। इसके चलते भारत को 3.4 करोड़ नौकरियों के बराबर रोजगार का नुकसान उठाना पड़ सकता है और जी डी पी में पांच फीसदी से ज्यादा की गिरावट आ सकती है। फिर आपदाओं के कारण भारत को पहले ही से हर साल 87 अरब अमेरिकी डालर का नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसके अप्रत्यक्ष आर्थिक नुकसान प्रत्यक्ष नुकसान से डेढ से ढाई गुणा ज्यादा हैं। इसका सबसे ज्यादा बोझ उन परिवारों पर पड़ता है, जिनके पास ऐसे संकटों से उबरने के लिए सबसे कम संसाधन हैं। सच तो यह है कि एक डिग्री तापमान बढ़ोतरी से वर्ष 2100 तकभारत की जी डी पी को तकरीब तीन फीसदी का नुकसान उठाना पड़ सकता है। इससे 2047 तक भारत को 30 खरब डालर की अर्थ व्यवस्था का लक्ष्य भी खतरे में पड़ सकता है। इस बाबत एम्स के फैकल्टी सदस्य और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ हर्षल रमेश साल्वे का कहना है कि सभी स्थिति में और सभी स्तरों पर हीट एक्शन प्लान लागू करने की जैसी रणनीतियों पर तत्काल काम करने की जरूरत है। उनके अनुसार बुजुर्गों, पहले से बीमार लोगों, बच्चों और गर्भवती महिलाओं तथा खुले में शौच करने वाले कामगारों जैसे कमजोर वर्गों को प्राथमिकता देना जरूरी है। जाहिर है चुनौती का दायरा भी काफी बड़ा है। चूंकि जलवायु परिवर्तन का असर बराबर बढ़ता जा रहा है, इसलिए ऐसे हालात से निपटने के लिए सबसे पहले मौसमी शुरुआती अनुमान के आधार पर बुआई से पहले फसलों में बदलाव किये जायें, राज्यों द्वारा सूखा घोषित किये जाने की प्रक्रिया सरल बनाई जाये, कृषि योजना में बहुवर्षीय जलवायु जोखिम माडल को शामिल किया जाये और दीर्घकालिक विकास की क्षमता को बनाए रखने हेतु अर्थ व्यवस्था के ढांचे में मजबूती लाने के प्रयास किये जायें। सबसे अहम बात यह कि गर्मी को एक असाधारण घटना की तरह देखने की जगह लगातार बढ़ते जोखिम के तौर पर देखते हुए इससे मुकाबले के लिए तैयारी करनी होगी। (लेखक के अपने विचार हैं)

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