भारत की प्राचीन परम्परा को नया रूप : रेणु जैन

लेखिका : रेणु जैन
इंदौर, (मध्य प्रदेश)
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भारतीय संस्कृति की एक प्राचीन परम्परा है जिसे अन्नदान कहा गया है।यह परम्परा न केवल दूसरों की भूख मिटाने के लिए है बल्कि यह सामाजिक जिम्मेदारी तथा मानवता के प्रति प्रेम को दर्शाती है।जहां भोजन को केवल आवश्यकता नहीं बल्कि एक परम्परा माना जाता है।हमारे कई ग्रंथों में भूखे को भोजन कराना एक गृहस्थ के पांच प्रमुख कर्तव्यों में से एक माना गया है।कम होती इस परम्परा के चलते न्यूजीलैंड की सड़कों ,फुटपाथों,पार्कों जैसे सार्वजनिक स्थानों पर अमरूद,नीबू,सेब,बेर के अलावा कुछ और मौसमी फलदार पेड़ लगाए जा रहे हैं।जिन्हें फूड फॉरेस्ट पहल के तहत भूखे लोग निःशुल्क तोड़ कर खा सकते हैं।यह पहल भूखे को ताजे फल उपलब्ध कराने तथा जन समुदाय को प्रकृति से जोड़ने के लिए है।स्थानीय परिषद और एडिबल कैंटरबरी जैसे समूह इन पेड़ों की देखरेख करते हैं। ऐसी ही खूबसूरत पहल नार्वे की भी है जहां किसी के बाग में लगे फलों के पेड़ जब फलों से लद जाते हैं तब उन फलों को बेचने या खुद के खाने के लिए रखने की बजाय रिबन या बोर्ड लगाकर मुफ्त में फलों को खाने के लिए आमन्त्रित करते हैं।इसी तरह इटली के सिसिली जैसे दक्षिण क्षेत्रों में सड़कों के किनारे संतरे, नींबू,अंजीर,चेरी,नाशपाती,अनार
अंगूर जैसे फलदार पेड़ देखने को मिलते हैं।वहाँ के स्वयं सेवक इन पेड़ों की देखभाल करते हैं।यह परम्परा पूरे इटली में है।सड़कों की खूबसूरती बढ़ाते ये पेड़ इटली की संस्कृति और पर्यावरण प्रेम को भी दर्शाते हैं।राहगीरों को मुफ्त में ताज़े फल भी उपलब्ध कराते हैं,जो एक सुखद अनुभव है।नार्वे,न्यूजीलैंड तथा इटली की दिल जीतने वाली इस यह पहल आज पूरी दुनिया के लिए एक बड़ी मिसाल है।यूरोप के कई अन्य देशों में भी जब कोई होटल में डिनर या लंच के लिए या चाय , कॉफी के लिए जाते तो खुद के भुगतान के बाद कुछ लोग एक या दो लोगों के लिए अग्रिम भुगतान करके आते है,जिसे वहां पेंडिंग मील का नाम दिया गया है।किसी जरूरतमंद को होटल वाले खुद भी देते है या कोई भूखा व्यक्ति जाकर पूछ भी सकता है कि आज कोई पेंडिंग मील है?यह सुखद पहल निर्धन लोगों को स्वाभिमान से भोजन कराने के उद्देश्य से की गई है।
प्राचीन भारत में भी सड़कों के किनारे फलदार पेड़ लगाने की समृद्ध परम्परा रही है।आम,जामुन,बेर,इमली जैसे कई पेड़ विशेष रूप से लगाए जाते थे जो न केवल छांव तथा ठंडी हवा देते थे बल्कि थके मुसाफिरों तथा बच्चों के लिए भोजन,फल,तथा गरीबों के लिए लकड़ी का स्त्रोत भी होते थे।पर्यावरण को स्वस्थ तथा नर्म बनाने के अलावा ये परियोजनाएं सौर विकिरणों को कम करती थी।समय के साथ विकास के नाम पर इन फलदार पेड़ों की जगह सजावटी पेड़ों ने ले ली।आज भी यदा कदा कई पुरानी सड़कों पर बेल फल, कबीट,इमली,जामुन जैसे पेड़ देखे जा सकते हैं जो राहगीरों के लिए एक निःशुल्क तथा प्राकृतिक उपहार का काम करते हैं।
भारत में भूख सबसे गम्भीर समस्याओं में से एक है।ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में लाखों लोग कुपोषण से पीड़ित है और उन्हें ताज़ा, पौष्टिक खाना बहुत कम मात्रा में मिलता है।सड़कों के किनारे फलदार वृक्ष लगाकर हम पोषण का एक सस्ता टिकाऊ और निरंतर श्रोत प्रदान कर सकते हैं।सड़कों के किनारे फलदार पेड़ लगाने का पारिस्थितिक प्रभाव हवा को शुद्ध करने के अलावा जैव विविधता को करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।स्थानीय समुदाय इन वृक्षों को लगाने तथा उनकी देखभाल करने में शामिल हो सकते हैं जिससे रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। (लेखिका के अपने विचार हैं)

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