कहानी

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बूट पॉलिश, बूट पॉलिश करा लो बाबूजी आवाज सुनकर पीछे मुड़कर देखा तो एक मासूम सा गोरा चेहरा पुकार रहा था उम्र होगी यही कोई पांच छ वर्ष की वैसे तो अनुराग अपने घर से ही जूता पोलिश करके निकलता था पर उसकी मीठी व करुणा भरी आवाज सुनकर वह उस बालक के पास खिंचा चला आया।
बच्चा बोला बाबूजी बूट पॉलिश करा लो आज सुबह से ही भूखा हूं एक भी ग्राहक नहीं आया यह सुनकर अनुराग ने 10 का नोट उसकी तरफ बढ़ाया । लो बेटा यह कुछ पैसे रख लो परंतु बच्चे ने इनकार करते हुए कहा नहीं बाबूजी भीख नहीं लूंगा। उसकी इमानदारी देखकर उसने अपने पॉलिश किए हुए जूते आगे किए बालक पॉलिश करने लगा। पैसे देकर अनुराग आगे बढ़ गया।
दूसरे दिन भी अनुराग उधर से गुजरा पल भर के लिए रुक गया। बड़ी तन्मयता से बालक अपने काम में लगा था पर न जाने किस चुंबकीय आकर्षण से वह उस बालक के पास चला गया व अपना पैर आगे कर दिया बालक ने नजर ऊपर की और उठाई और मुस्कुराया और पॉलिश करने लगा
अब अनुराग ने घर पर जूते पॉलिश करना बंद कर दिया ।वह प्रतिदिन उस बालक से पॉलिश करवाने लगा था ।अनुराग उसके बारे में जानना चाहता था एक दिन बालक अकेला था वह बालक से पूछ बैठा -बेटा तुम्हारा नाम क्या है तुम कहां रहते हो ।बालक कुछ उदास हुआ और रोने लगा बोला -मेरा नाम गोलू है, बाबूजी में अनाथ हूं। मेरे माता-पिता का एक दुर्घटना में देहांत हो गया है। शुरू शुरू में तीन-चार दिन भीख मांग कर पेट भरा फिर पैसे इकट्ठे करके बूट पॉलिश का सामान खरीद लाया और बुट पॉलिश करने लगा।
ढाबे पर रोटी खा लेता हूं अफसर बनना चाहता था पर सब कुछ खत्म हो गया । अनुराग उसे सांत्वना देकर ऑफिस चला गया।
ऑफिस जाकर भी उसका मन नहीं लगा सोचने लगा विधि का यह कैसा विधान है एक तरफ तो यह बच्चा अनाथ है।वह निसंतान है। उसकी शादी को 3 वर्ष हो गए थे पत्नी सुंदर व शिक्षित है सरिता नाम है। साल भर तो हंसी खुशी से कहीं गुजर गया पर ज्यों ज्यों समय गुजरता गया चारों तरफ कानाफूसी शुरू हो गई सबके चेहरे पर एक ही सवाल था मिठाई कब खिला रहे हो ।परिवार में मां थी। वह इकलौता पुत्र था अब मां भी घुमा फिरा कर सरिता से यही सवाल करती ,सरिता ने शुरू शुरू में तो टाल दिया, पर मां के दबाव में एक दिन अनुराग से इस विषय पर बात की ।अनुराग ने मामले की गंभीरता को समझते हुए उसी वक्त फोन पर शहर के जाने-माने चिकित्सक से मिलने का समय तय किया ।
दूसरे दिन तय समय पर वह दोनों चिकित्सक के पास गए सब कुछ सुन कर कुछ परीक्षण करवाने को कहा। अगले दिन सारी रिपोर्ट देखने के बाद चिकित्सक ने कहा की सरिता कभी मां नहीं बन सकती। यह सुनकर संगीता के पैरों तले जमीन खिसक गई अनुराग ने उसे बड़ी मुश्किल से संभाला और घर लेकर आया। मां को भी बता दिया गया।
सरिता उदास रहने लगी थी। सास समझदार थी उसने कभी सरिता को इस बात के लिए उलाहना नही दिया।
सब्र करके रह गई थी ।अनुराग को पल भर के लिए ख्याल आया क्यों ना बुट पॉलिश वाले गोलू को ले जाकर सरिता की सूनी गोद भर दूं पर तत्काल उसने मां के डर से यह विचार अपने मन से निकाल लिया। जैसे तैसे कर शाम हुई तो वह कार लेकर घर आ गया।
सरिता चाय लेकर आई दोनों पीने बैठे सरिता भाप गई थी कि अनुराग का मन आज उदास है उसने पूछा – क्या बात है आज उदास लग रहे हो तो उसने गोलू की सारी बात बता दी। सरिता कुछ क्षण के लिए सोच में पड़ गई फिर शाम के खाने की तैयारी में लग गई थी। 2 दिन बाद दीपावली थी। कुछ व्यंजन भी बनाने थे।
दीपावली के दिन गोलू को कुछ मिठाई और पैसे देकर घर पहुंचा तो सरिता तैयार होकर बड़ी बेसब्री से अनुराग का इंतजार कर रही थी देखते ही बोली- चलो फटाफट हाथ मुंह धो लो चाय पी लो मुझे गोलू के पास ले चलो। अनुराग बोला -क्यों? अभी तो चलो गोलू के पास कह कर सरिता गाड़ी में बैठ गई तो अनुराग उसको लेकर गोलू के पास पहुंचा गाड़ी से उतर कर सरिता ने गोलू को देखा और उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बोली- चलो बेटा हमारे साथ हमारे घर, पहले तो गोलू आनाकानी करने लगा पर सरिता का स्नेह और प्यार देखकर गाड़ी में बैठ गया अनुराग आश्चर्यचकित सा देखे जा रहा था पर बोला कुछ भी नहीं।
घर पहुंचे तो मां आरती की थाली लेकर गोलू का इंतजार कर रही थी। अनुराग से रहा न गया बोला – सास बहू कुछ बताओगी भी सही या रहस्य बना रहेगा मां प्यार से गोलू को पुचकारते हुए बोली – यह अब हमारे घर की रौनक बनेगा हमने इस बच्चे को गोद लेने का फैसला लिया है कानून कारवाई भी पूरी कर दी गई है।
गोलू के आने से दीपावली की खुशियां चौगुनी हो गई थी। सरिता खुशी से फूली नहीं समा रही थी। उसका घर आंगन दियो की रोशनी से चमक रहा था। उसकी सुनी गोद को गोलू ने भर दिया था। गोलू को भी जीवनदान मिल गया था एक घर संसार पूर्ण हो गया था अब गोलू अनाथ नहीं था। सरिता भी निसंतान नहीं थी। दीपावली पर ऐसा तोहफा मिलने पर उन्होंने भगवान को लाख-लाख धन्यवाद दिया। (लेखिका का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)
लेखिका : लता अग्रवाल, चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)