



चित्तौड़गढ़ दुर्ग स्थित गौमुख कुंड को गाय के मुख से बारह महीने बहने वाले प्राकृतिक झरने के कारण गौमुख कुंड कहा जाता है। यह कुंड कभी नहीं सूखता है। गौमुख से जहां पर पानी गिरता है उसके नीचे प्राचीन शिवलिंग स्थित है उस पर प्राकृतिक रूप से अभिषेक होता रहता है। गौमुख कुंड में पानी चट्टानों की दरारों के बीच से बहता रहता है कहां से आता है इसका आज तक पता नहीं चला। इसका आकार आयताकार है। इस छोटी सी प्राकृतिक गुफा से बिल्कुल स्वच्छ जल की भूमिगत धारा में 12 महीने पानी बहता है।
यह चित्तौड़गढ़ के तीर्थराज के नाम से भी जाना जाता है। जब श्रद्धालु सभी धार्मिक तीर्थ स्थल की यात्रा करके आते हैं तो अंत में अपनी पवित्र यात्रा पूर्ण करने के लिए वह इस कुंड पर आकर स्नान करते हैं। यात्री यहां पर मछलियों को दाना भी डालते हैं। इस कुंड के ऊपर एक तरफ एक मकान बना हुआ है उसके अंदर एक सुरंग बनी हुई है जो कुंभा महल व राज महल से जुड़ी हुई है। जहां से रानियां स्नान करने इसी गुफा से आती थी। अब गुफा का द्वार बंद कर दिया गया है। उसके निकट ही रानी पद्मिनी की एक खूबसूरत तस्वीर लगी हुई है। विजय स्तंभ भी इसके पास बना हुआ है। गौमुख कुंड का प्राकृतिक नजारा बहुत खूबसूरत है। जहां गौमुख कुंड बना हुआ है उसके अंदर ही एक छोटा सा चौकोर कुंड बना हुआ है। वह भी कभी नहीं सूखता है। जहां भगवान की मूर्तियां लगी हुई है। वहां पर प्राचीन छोटा सा खाली स्थान भी है जहां यात्री स्नान भी कर सकते हैं।
संकलन : लता अग्रवाल, चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)।