संवेदनशील चिकित्सक

लेखिका : लता अग्रवाल
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)।
www.daylifenews.in
चिकित्सा क्षेत्र ऐसा विभाग है की आमजन का सीधा संपर्क चिकित्सक के साथ होता है। चिकित्सक का दर्जा भगवान के समान होता है और निश्चित रूप से वे ऐसे ही आदरणीय है। वे तन मन से लोगों की सेवा करते हैं। लेकिन लोगों के मन में पूर्वाग्रह है कि चिकित्सक लालची होते हैं। हर विभाग में कुछ गिने चुने व्यक्ति ऐसे हो सकते हैं। लेकिन इसका सकारात्मक पहलू यह है कि चिकित्सक भी एक आम इंसान की तरह ही संवेदनशील होते हैं। उनका पूरा प्रयास मरीज को अच्छा इलाज उपलब्ध करवाना और अंतिम सांस तक मरीज की जान बचाना होता है। तत्कालीन स्थिति के अनुसार मरीज की हालत को देखते हुए कुछ कठोर फैसले भी लेने पड़ते हैं इस प्रक्रिया में अगर मरीज की मौत हो जाती है तो परिजन तुरंत चिकित्सक पर लापरवाही का आरोप लगाकर हंगामा खड़ा कर देते हैं कई बार तो चिकित्सकों के साथ मारपीट पर उतारू हो जाते हैं। यह नितांत अशोभनीय आचरण है। चिकित्सक जैसे मर्यादा पूर्ण व उच्च पद पर आसीन व्यक्ति के साथ इस प्रकार का व्यवहार हमारे समाज के नैतिक मूल्यों पर सवाल उठाता है। चिकित्सक की गरिमा को कम करता है। कई बार चिकित्सक ईश्वर के आगे भी विवश हो जाता है इससे चिकित्सकों कि कर्तव्यनिष्ठा का हनन न करें।
अभी कुछ समय पूर्व चित्तौड़ में एक महिला की मौत हो गई थी सरकारी अस्पताल में जांच करने के बाद प्रसूति विभाग की चिकित्सक ने सिजेरियन की जरूरत बताई, महिला नार्मल डिलीवरी के लिए किसी और अस्पताल में चली गई वहां केस बिगड़ने पर वापस सरकारी अस्पताल में आने तक हालत गंभीर हो चुकी थी।अंत में उसकी मौत हो गई। समाज व परिजनों ने सच्चाई जाने बिना हंगामा खड़ा कर दिया। संबंधित चिकित्सक के विरुद्ध कलेक्टर को ज्ञापन भी दिया गया।
अस्पताल प्रशासन ने उसी प्रसंग में सुरक्षित प्रसव व स्वस्थ नारी विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया। एक ऐसा उदाहरण दिया गया कि एक मरीज की हालत खराब थी लेकिन उसका ऑपरेशन करने के लिए ना तो मरीज ने साइन किया ना परिजनों ने साइन किया। चिकित्सक की व्यथा उनके शब्दों में स्पष्ट झलक रही थी कि इस स्थिति में क्या किया जा सकता है ना तो मरीज की जान बचाई जा सकती है ना मरीज को मरने के लिए छोड़ा जा सकता है। एक ताजा उदाहरण हैं। 15 दिन पूर्व एक महिला अस्पताल दिखाने आई चिकित्सक ने तुरंत सिजेरियन की सलाह दी। महिला वापस चली गई। 15 दिन बाद हालत बिगड़ने पर वापस आई तब तक बच्चे की धड़कन कम हो चुकी थी तुरंत आपरेशन किया गया बच्चे को वेंटीलेटर पर रखना पडा।
ग्रामीण महिलाओं का गांवो में ही पारंपरिक तरीके से प्रसव हो जाए परिजन ऐसा प्रयास करते हैं। लेकिन जब हालात बिगड़ जाते हैं तो इमरजेंसी में अस्पताल पहुंचते हैं। फिर भी चिकित्सकों का पूरा प्रयास रहता है कि ऐसी विषम परिस्थिति में भी सुरक्षित प्रसव करवाया जाए गर्भवती महिला की शारीरिक स्थिति को देखते हुए सिजेरियन का भी निर्णय लेना पड़ता है ताकि मां और बच्चे की जान बचाई जा सके। चिकित्सक समय, असमय, रात हो या दिन भूखे प्यासे होते हुए भी इमरजेंसी कॉल पर तत्काल अस्पताल पहुंच जाते हैं। ऐसे संवेदनशील मामलों में बिल्कुल भी लापरवाही नहीं करते हैं। लेकिन कभी-कभी चिकित्सक भी ईश्वर के आगे हार जाते हैं और मरीज की मौत हो जाती है। जीवन मरण तो ईश्वर के हाथ में होता है। लेकिन समाज व मीडिया वास्तविकता से परे ऐसे विषयों पर नकारात्मक माहौल बनाते हैं जिससे चिकित्सक वर्ग काफी आहत होते है और अपमानित महसूस करते है। चिकित्सक को भगवान का दर्जा दिया गया है और यह सच भी है। अतः उनका सम्मान करें यही हम सब का नैतिक कर्तव्य है। उन पर भरोसा रखें तभी वह अपना काम बेहिचक होकर कुशलतापूर्वक संपन्न कर सकेंगे। यह आमजन का नैतिक दायित्व है। सबसे पहले संबंधित चिकित्सक से संपर्क कर वास्तविक हालात का पता करे फिर कोई कदम उठाए। ताकि चिकित्सक को पीड़ा न हो। (लेखिका के अपने विचार है)

2 thoughts on “संवेदनशील चिकित्सक

  1. I am highly impressed with your blog I think if people come forward like you and fill the gaps between doctors and out society things will change and we altogether can help to needful iwoman

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *