प्रकृति परिवर्तन की मकर सक्रांति 14 जनवरी पर विशेष

भागो मत! सत्य की खोज में चलते रहो

लेखक : वेदव्यास
लेखक साहित्य मनीषी व वरिष्ठ पत्रकार हैं
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20वीं शताब्दी के अनुभव संसार को लेकर इक्कीसवीं शताब्दी में प्रवेश करने को विवश मनुष्य हमसे आज कई सवाल पूछ रहा है। यह जानना चाहता है कि विज्ञान और प्रकृति के बीच मेरे साथ कौन रहेगा? अध्यात्म और अर्थशास्त्र के रास्ते पर मेरे साथ कौन चलेगा? मनुष्य और राज्य सत्ता के आपसी रिश्ते कौन तय करेगा। वह यह भी समझना चाहता है कि क्या अब मनुष्य के लिए भूख, अशिक्षा और असमानताओं के शोषण से मुक्ति सम्भव है। क्या अब हजारों वर्ष पूर्व उद्घोषित वेदों के मानवतावाद और समवेत का दर्शन मनुष्य को लगातार की पराजय से बचा पाएगा और क्या अब साहित्य का मनुष्य के दैनिक जीवन में कोई हस्तक्षेप रह जाएगा।
ऐसे ही बहुत सारे प्रश्न हैं जो हमें इस शताब्दी ने विरासत में दिए हैं। लेकिन बीते हुए समय की कहानी के अनेक महानायक ही आज हमें यह बताते हैं कि मनुष्य के पास सत्य और असत्य के बीच, अंधकार और प्रकाश के बीच, मंडी और मुद्रा के बीच, दाम, दण्ड, भेद को समझने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
अब जब धरती छोटी होती जा रही है और मनुष्य अपनी इच्छाओं के नित नए ग्रह-उपग्रह खोज रहा है तब भला साहित्य और संस्कृति की भूमिका का कौनसा स्वरूप वह अपने लिए तय करेगा इस बात पर हमें भी अभी से सोचना चाहिए। क्योंकि मनुष्य की विकास यात्रा का हमारा सम्पूर्ण अनुभव अनेक त्रासदियों से भरा हुआ है तथा अब स्थिति यह है कि मनुष्य अपनी समस्त नकारात्मक चेतना और प्रवृत्तियों के साथ परिवर्तन की ऊखली में सिर डाले हुए छटपटा रहा है। अब मनुष्य को साहित्य, सम्पदा, विज्ञान और विकास में से कौन बचाएगा और कौन मनुष्य को धर्म के नाम पर जोड़ पाएगा यह यक्ष प्रश्न भी आज मेरे सामने है। अपनी चर्चा की चौखट पर आज मेरा सरोकार केवल मात्र एक साहित्य ही है जो मनुष्य को नवीन विज्ञान देता है, इतिहास और भूगोल का सामान्य अनुसंधान देता है, जीव और जगत का वितान देता है और सम्पूर्ण लोकमंगल की तलाश में उसे सम्भोग से समाधि, युद्ध से शांति, आत्मा से परमात्मा, द्वैत से अद्वैत, व्याष्टि से समष्टि, विनाश से विकास और कलुषित से सुभाषित की ओर ले जाता है।

यह साहित्य मूलतः मनुष्य की चेतना के मनोविज्ञान का दर्पण है तथा मनुष्य के जीवन का ऐसा अमरफल है जो काल से मरता नहीं है, प्रकृति से डरता नहीं है और शब्द तथा भाषा के सभी बंधनों से आगे शब्दब्रह्म की तरह रहता है। साहित्य एक विचार-विज्ञान भी है तथा घटित-अघटित की भीतरी डायरी का भी काम करता है। साहित्य उनके लिए नहीं है जो मनुष्य के भीतर एक मंडी की तलाश करते हैं, साहित्य उनके लिए भी नहीं है जो समय के तत्काल को जीते हैं, साहित्य से उनका भी कोई लेना-देना नहीं है जो इसे सुख की सिंहासन बत्तीसी समझते हैं। साहित्य से ही जमीन का तल और मनुष्य का जल नापा जाता है और साहित्य से ही ज्ञान का बल और मनुष्य का छल परिभाषित होता है।
पिछली अनेक शताब्दियों में साहित्य के सभी आवरण बदल गए हैं लेकिन उसकी मूल खोज का शाश्वत रास्ता और अध्याय कहीं देखें तो पता चलेगा कि मनुष्य के मन, वचन और कर्म की परतों में केवल रचनाकार ही अनवरत झांक रहा है। जिसे सबने त्याग दिया है वही आज सृजनधर्मी का सरोकार है तथा साहित्य ही अब एक ऐसी शब्दों और भावों की सुरंग है जिसमें मनुष्य की कविता का अनहदनाद अनवरत जारी है। जो मनुष्य में विश्वास करता है वही साहित्य का अभिप्रेत है जो स्वयं में आस्था रखता है वही मनुष्य का चरम संकेत है। साहित्य का जन्म किसी पहाड़ से नहीं होता अपितु बादलों की गड़गड़ाहट से होता है जो बिजली की तरह कौंधता भी है और सुरसरि की तरह घर-आंगन को सींचता भी है।
साहित्य का अर्थ ही बदलाव और परिवर्तन में निहित है। दुनिया का अब तक का साहित्य यथास्थिति के विरोध का प्रमाण है। साहित्य केवल मंगल है और इसमें शब्दों का दंगल केवल वही करते हैं जो मनुष्य को मनुष्य भी नहीं रहने देना चाहते। यह साहित्य एक ऐसी ‘माया‘ है जिसके नाना रूपों में सुखनारायण बसते हैं तथा जहां पत्थर की मूर्तियां रूढ़ियों की संस्कृति, असमानता का समाजशास्त्र और छल-बल का अर्थजगत् पूरी तरह प्रतिबंधित है। साहित्य जहां मनुष्यता का अमरकोश है, विकास का कल्पतरू है, मंगल की भूमिपूजा है वहां यह असूर पर सूर-मुनियों की विजय का दस्तावेज भी है।
हम एक पूरी उलझन और समय की भूलभुलैया के बीच आपको इस साहित्य के बदलते धर्मशास्त्र की यात्रा पर ले जाना चाहते हैं और आपसे एक ऐसा संवाद स्थापित करना चाहते हैं जो मन से पढ़ा जाय और विचार से सुना जाय। जो भी मनुष्य बनना चाहते हैं उनके लिए साहित्य एक अनिवार्य विषय है। इस पाठ्यक्रम में उत्थान की सभी अट्टालिकाएं मनुष्य के मन-विचार की नींव पर ही खड़ी है। यह साहित्य आसमान में यहां वहां कोई बगीचा तो नहीं लगाता, लेकिन आजादी, समानता और लोककल्याण की प्रसंगवाटिका में चिंतनधारा की अविस्मरणीय पदचाप अवश्य ही अंकित करता है।
यह साहित्य-कर्म जंगल के जोगियों की बिरासत है, काल चक्र की पवित्रतम इबादत है, प्रकृति की तरह आंख खोलने की एक आदत है, अभिव्यक्ति की शहादत है और एक ऐसी आत्मलीन साधना है जो नदी के किनारे खड़े अकेले पेड़ की तरह मनुष्य की मंगलमय भविष्य की कामनाएं करती रहती है। साहित्य कोई मनोरंजन भी नहीं है तो कोई अंतिम दुखभंजन भी नहीं है किंतु एक अनवरत बहने वाली पवन धारणा है जिसमें मनुष्य का आदि और अंत सभी कुछ बोलता है तथा चरम सत्य को समय के चेहरे पर अंकित करता है और समाज का ऋण है जिसे मनुष्य के लिए, मनुष्य के द्वारा मनुष्य को सौंपा जाता है। जिस तरह स्त्री, सौंदर्य, पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि और व्योम की कोई सीमा और परिभाषा नहीं बांधी जा सकती, उसी प्रकार साहित्य को शब्दों के कीर्तन, किताबों के अलख निरंजन, कलम के तुमुलनाद और आत्ममुग्ध मनोदशा के संवाद से भी रूपायित नहीं किया जा सकता। सबकी एक सी आंख होते हुए भी सबके अपने-अपने दृश्य होते हैं और कान की ध्वनियां और मुख के स्वाद होते हैं उसी तरह साहित्य के भी अपने प्रवाद और अनुवाद होते हैं। लेकिन कुछ भी रहता हो, पर साहित्य और सृजन की लोक यात्रा में मनुष्य का साथ वही दे सकता है जो उसके सम्मान में सिर देने को तैयार हो।
समय और सत्य की मुख्य धारा में मनुष्य को परिशिष्ठ की तरह प्रायोजित करने के खिलाफ यह एक बहस और दखल करने का उपक्रम, आगे फिर उन सब अवधारणाओं, आस्थाओं, मतवादों और सृजन सरोकारों पर केंद्रित होगा लेकिन इसके साथ हम जिधर भी देखेंगे और सुनेंगे वह एक समय की महाभारत होगी जिसके कुरुक्षेत्र में सभी पाण्डव-कौरव थक-हारकर मनुष्य के मंगल की अभिलाषा लेकर ही आएंगे-जाएंगे। धैर्य से सुनिये मनुष्य जाति के भूत, भविष्य और वर्तमान को। मनुष्य का रास्ता ही साहित्य का रास्ता है और साहित्य का वास्ता ही मनुष्य का वास्ता है। शेष चराचर भौतिक है और क्षणिक है। चलते रहिये, चलते रहिये। थकिये और भटकिये मत। यह अंधेरा जितना बढ़ेगा आपका सवेरा उतना ही प्रखर और अवश्यसम्भावि होगा। इसलिए भागो मत। अपने को बदलो, तथा भय, भाग्य और भगवान की काराओं से बाहर निकलो। (लेखक के अपने विचार हैं)

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