वर्तमान सभ्यता : दशा-दिशा और संवेदनहीन समाज- संजय राणा

लेखक : संजय राणा
लेखक जाने-माने सामाजिक कार्य कर्ता और पर्यावरणविद हैं।
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आज देश और दुनिया के हालात पर सरसरी नज़र डालना भी यह समझने के लिए पर्याप्त है कि मानव समाज किसी साधारण संकट से नहीं, बल्कि गहरे नैतिक पतन के दौर से गुजर रहा है। हाल के वर्षों में सामने आई अनेक घटनाएँ—जिनमें वैवाहिक रिश्तों के भीतर हत्याएँ, प्रेम संबंधों में क्रूरता, सत्ता के लिए 24 घंटे के अंदर पति की मृत्यु को भुलाकर संवेदना का प्रदर्शन मात्र औपचारिक बन जाना, नाबालिगों के साथ यौन अपराध, धर्म के नाम पर ठगी और वैश्विक स्तर पर शक्ति का नंगा प्रदर्शन शामिल है—यह संकेत देती हैं कि समस्या कानून या शासन की नहीं, बल्कि मानव चेतना के क्षरण की है।
जब कोई पत्नी पति की हत्या कर शव को ड्रम में छिपाती है, जब नवविवाहिता हनीमून को हत्या का अवसर बना देती है, जब एक पुरुष अपनी महिला मित्र की नृशंस हत्या कर उसके शरीर के टुकड़े करता है—तो ये घटनाएँ केवल व्यक्तिगत विकृति नहीं कही जा सकतीं। ये उस सामाजिक मानसिकता का परिणाम हैं, जिसमें रिश्ते मूल्य नहीं, उपयोग की वस्तु बन चुके हैं। इससे भी अधिक भयावह यह है कि ऐसे अपराध कुछ दिनों की सुर्खियों के बाद सामूहिक स्मृति से गायब हो जाते हैं।
इसी तरह, नाबालिग बच्चियों के साथ यौन शोषण के मामलों में आरोपियों की सूची साधारण नागरिकों से लेकर राजनीतिक और सामाजिक रूप से प्रभावशाली लोगों तक फैली हुई है। यह तथ्य किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक होना चाहिए कि बच्चों की सुरक्षा भी अब सत्ता, प्रभाव और धन के आगे असहाय दिखाई देती है। जब अपराधी वर्षों तक कानूनी प्रक्रियाओं का लाभ उठाते हैं और पीड़ितों को सामाजिक दबाव में चुप करा दिया जाता है, तब न्याय व्यवस्था नहीं, नैतिक व्यवस्था ध्वस्त होती है।
धर्म और अध्यात्म का क्षेत्र भी इस पतन से अछूता नहीं रहा। साधु-संतों के वेश में ठगी, धार्मिक पदों का राजनीतिक दुरुपयोग और प्रतिष्ठित आध्यात्मिक संस्थाओं की सार्वजनिक अवमानना यह दर्शाती है कि आस्था भी अब बाज़ार और सत्ता के अधीन होती जा रही है। महात्मा गांधी ने स्पष्ट कहा था कि धर्मविहीन राजनीति समाज को नष्ट कर देती है—आज यह कथन एक चेतावनी नहीं, बल्कि यथार्थ बन चुका है।
वैश्विक परिदृश्य में स्थिति और भी चिंताजनक है। अंतरराष्ट्रीय कानूनों और मर्यादाओं को ताकत के बल पर रौंदना, युद्ध और अपहरण जैसी कार्रवाइयों को कूटनीति का विकल्प बना देना, और प्राकृतिक संसाधनों की बेलगाम लूट—यह सब संकेत देता है कि आधुनिक सभ्यता ने सह-अस्तित्व की अवधारणा को त्याग दिया है। नदियाँ सूख रही हैं, जंगल नष्ट हो रहे हैं, जीव-जंतु विलुप्ति की कगार पर हैं, और इसे विकास का नाम दिया जा रहा है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे खतरनाक तत्व है—सामाजिक उदासीनता। जब हत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचार और पर्यावरण विनाश “रूटीन खबर” बन जाएँ, तब यह मान लेना चाहिए कि समाज की चेतना सुन्न हो चुकी है। प्रश्न यह नहीं है कि अपराध क्यों बढ़ रहे हैं, बल्कि यह है कि हम उन्हें सामान्य क्यों मानने लगे हैं।
महात्मा गांधी ने हिंसा को केवल शारीरिक कृत्य नहीं माना था। उनके लिए सत्य का त्याग, लालच का विस्तार और आत्मसंयम का अभाव भी हिंसा के ही रूप थे। आज का उपभोक्तावादी समाज मनुष्य को साध्य नहीं, साधन मान रहा है। जब “मैं” सर्वोपरि हो और “दूसरा” केवल उपयोग की वस्तु, तब हत्या, शोषण और विश्वासघात असामान्य नहीं रह जाते।
अक्सर ऐसी परिस्थितियों में ईश्वरीय न्याय की बात की जाती है। किंतु सच यह है कि ईश्वरीय न्याय की पुकार मानवीय और आत्मिक न्याय की विफलता का परिणाम होती है। गांधीवादी दृष्टि दंड से पहले आत्मचिंतन की माँग करती है। यदि समाज को इस पतन से बचाना है, तो युवाओं को केवल सफल उपभोक्ता नहीं, जिम्मेदार नागरिक बनना होगा। मौन रहना अब तटस्थता नहीं, बल्कि अन्याय में भागीदारी है।
आज आवश्यकता किसी नए अभियान या नारे की नहीं, बल्कि उस नैतिक साहस की है, जो व्यक्ति को स्वयं से प्रश्न करने की शक्ति दे। यदि यह साहस नहीं जागा, तो इतिहास हमें मनुष्य नहीं, संवेदनाशून्य और आत्मविहीन सभ्यता के रूप में दर्ज करेगा—और वह निर्णय शायद सबसे कठोर होगा। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है)

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