
लेखक : रामगोपाल बिश्नोई
लेखक पर्यावरण संघर्ष समिति बीकानेर के संयोजक एवं जाने-माने पर्यावरण प्रेमी हैं।
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गुरु जंभेश्वर जी ने संवत 1508, कार्तिक वदी 8 को समराथल पर जो 29 नियम दिए, वो केवल धर्म नहीं, धरती का संविधान थे। “जीव दया पालणी, रूख लीलो न घावै” – उन्होंने 575 साल पहले ही चेतावनी दे दी थी कि पेड़ काटना और जीव मारना फसाद की जड़ है। “खेती करणी, बणज करणो” का आदेश दिया, लेकिन साथ में “अमर रखावै थाट” भी जोड़ा – यानी बकरे-बकरियों को काटो मत, थाट यानी बाड़ा-खोर बनाकर उसमें पालो। मारोगे तो एक बार मांस मिलेगा, पालोगे तो रोज अमृत मिलेगा। आज जब पंजाब की मिट्टी कैंसर उगल रही है और थार की खेजड़ी पर आरियां चल रही हैं, तब जंभेश्वर जी का उपदेश भारत के लिए पेरिस समझौते से बड़ा दस्तावेज बन गया है।
हरित क्रांति ने भारत का पेट तो भर दिया, पर थाली में जहर परोस दिया। मालवा आज दुनिया के नक्शे पर “कैंसर बेल्ट” के नाम से चिन्हित है। बठिंडा-बीकानेर रेलखंड पर चलने वाली ट्रेन को लोग दर्द से “कैंसर ट्रेन” कहते हैं – डिब्बे मरीजों से भरे होते हैं, उम्मीद से खाली। PGI चंडीगढ़ ने जब जांच की तो मां के दूध में भी कीटनाशक निकला। जिस देश में गाय को माता कहते हैं, उस देश में जन्म लेते ही बच्चा जहर पी रहा है। घग्घर के पानी में सीसा और कैडमियम खतरनाक स्तर से ऊपर बह रहा है। किडनी फेल, लिवर खराब, खून में जहर – ये कैसी आत्मनिर्भरता है जहां आधी आबादी अस्पतालों पर निर्भर हो गई? जमीन की जैविक कार्बन 1% से भी नीचे गिर चुकी है। केंचुए मर गए, मिट्टी मृत हो गई। ये पीर की मौत है, जिसका जिक्र जंभेश्वर जी ने किया था।
दूसरी तरफ ऊर्जा की गुलामी खड़ी कर दी गई। घर-घर उज्ज्वला का सिलेंडर पहुंचाया, फोटो खिंचवाई, वाहवाही लूटी। पर ये नहीं बताया कि तीन में से दो सिलेंडर खाड़ी देशों से उधार का है। हर साल लाखों करोड़ रुपये सऊदी, कतर, UAE को भेज रहे हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य में एक चिंगारी भड़की तो देश के चूल्हे एक साथ बुझ जाएंगे। ऊपर से यूरिया-DAP की सब्सिडी का बोझ। सरकार खजाना लुटा रही है, किसान कर्ज में डूबकर फांसी के फंदे तक पहुंच रहा है, और जमीन बंजर हो रही है। हम विदेशी मुद्रा भी गंवा रहे हैं, स्वास्थ्य भी, और संप्रभुता भी। ये विकास नहीं, सुनियोजित आत्मघात है।
इस अंधेरे में हॉलैंड ने मशाल दिखाई है। थार से भी छोटा देश, पर कृषि निर्यात में दुनिया में दूसरे नंबर पर। रहस्य क्या है? उसने गोबर को कचरा नहीं, राष्ट्रीय संपदा मान लिया। गोबर से बायोगैस – बिजली मुफ्त, रसोई मुफ्त, ट्रैक्टर मुफ्त। बायोगैस के बाद बची स्लरी – वो बिकती है, खेत सोना उगलता है, नदी साफ रहती है, डेयरी सेक्टर ने मीथेन आधा कर दिया। ये कोई चमत्कार नहीं, सर्कुलर इकोनॉमी है। और यही गुरु जंभेश्वर जी का “चराहगां मरफत” है – चरागाह को पहचानो, उसका सम्मान करो, उसे जिंदा रखो।
भारत के पास हॉलैंड से 100 गुना बड़ा गोबर-भंडार है। 20 करोड़ से ज्यादा पशुधन हर दिन 15 लाख टन गोबर देता है। वैज्ञानिक अनुमान है कि भारत का बायोगैस पोटेंशियल इतना है कि अगर सिर्फ 43% इस्तेमाल हो जाए तो देश की पूरी रसोई गैस की जरूरत खत्म हो सकती है। आयात पर निर्भरता शून्य। हर साल बचेगा वो पैसा जो आज हम कैंसर और कर्ज खरीदने में लगा रहे हैं। IARI पूसा कह चुका है कि 75% रासायनिक यूरिया के साथ गोबर की स्लरी मिलाओ तो पैदावार सबसे ज्यादा होती है। मतलब कल सुबह से 25% यूरिया बंद किया जा सकता है। धीरे-धीरे 100% बंद। प्रयागराज में हजारों किसान ये करके दिखा चुके हैं। लागत डेढ़ हजार रुपये बीघा कम, जहर जीरो, मुनाफा दोगुना। एक देसी गाय का गोबर-गोमूत्र 30 एकड़ खेत के लिए पर्याप्त अमृत बनाता है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)