
शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी
लेखक : डा. संजय राणा
लेखक एस्रो के निदेशक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं पर्यावरणविद हैं।
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आज भारत की शिक्षा व्यवस्था ऐसे दौर से गुजर रही है, जहाँ प्रश्न केवल विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों का नहीं, बल्कि करोड़ों युवाओं के भविष्य का है। यह चिंता किसी राजनीतिक विचारधारा की नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की चिंता है।
इसी चिंता को लेकर देश के प्रसिद्ध पर्यावरणविद्, शिक्षाविद् एवं वैज्ञानिक श्री सोनम वांगचुक शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर 19 दिनों तक आमरण अनशन पर बैठे रहे मगर आज जिस प्रकार से सरकार और व्यवस्थाओं ने उनके अनशन को बल पूर्वक खत्म किया वह सरकार की नाकामी और संवादहीनता को दर्शाता है। उनकी प्रमुख मांग थी कि देश की शिक्षा व्यवस्था और उससे जुड़ी प्रतिष्ठित परीक्षाओं को निष्पक्ष, पारदर्शी और पूर्णतः विश्वसनीय बनाया जाए।
लोकतंत्र में मतभेद का समाधान संवाद से होना चाहिए न की बल पूर्वक। इसलिए ऐसे संवेदनशील विषयों पर सरकार, शिक्षा जगत और समाज—सभी पक्षों के बीच गंभीर चर्चा आवश्यक है। शिक्षा जैसे विषय को टकराव नहीं, विश्वास की आवश्यकता है।
परीक्षा प्रणाली पर उठते प्रश्न
बीते वर्षों में NEET-UG, JEE Main, UGC-NET, CUET-UG, CTET तथा अतीत की AIPMT जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं से जुड़े प्रश्नपत्र लीक होने अथवा परीक्षा प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठे हैं। जिसका परिणाम है कि अनेक विद्यार्थियों ने आत्महत्या कर ली और बड़ी संख्या में छात्र आस्वाद की स्थिति में चले गए हैं, लाखों विद्यार्थी वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं। ऐसे में यदि परीक्षा की निष्पक्षता संदिग्ध हो जाए, तो सबसे बड़ा आघात उनके विश्वास, मनोबल और भविष्य पर पड़ता है।
परीक्षा केवल अंक प्राप्त करने का माध्यम नहीं होती, बल्कि युवाओं के जीवन की दिशा तय करती है। इसलिए परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता किसी भी विकसित राष्ट्र की आधारशिला होती है।
विचार मंथन
जब मेहनत से अधिक व्यवस्था पर प्रश्न उठने लगें, तब सबसे बड़ी हानि प्रतिभा की होती है।
*शिक्षा व्यवस्था की दूसरी तस्वीर:
शिक्षा संकट केवल प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित नहीं है। पिछले लगभग 12 वर्षों में देश में लगभग 1.12 लाख सरकारी प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों के बंद होने अथवा अन्य विद्यालयों में विलय की जानकारी विभिन्न सरकारी आँकड़ों से सामने आई है। दूसरी ओर 58 इंजीनियरिंग एवं तकनीकी महाविद्यालयों का बंद होना भी यह संकेत देता है कि चुनौती अब केवल स्कूली शिक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि उच्च शिक्षा भी इसके प्रभाव से अछूती नहीं है। वहीं केंद्रीय विश्वविद्यालयों में लगभग 26 प्रतिशत शिक्षकों के पद रिक्त हैं, जबकि अनेक राज्य विश्वविद्यालयों में 30 से 50 प्रतिशत तक शिक्षकों की कमी बताई जाती है। जब शिक्षक ही पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं होंगे, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शोध और नवाचार की कल्पना कैसे की जा सकती है?
*शिक्षा या व्यवसाय?
आज शिक्षा का व्यवसायीकरण भी गंभीर चिंता का विषय बन चुका है।
निजी विद्यालयों में पहली से पाँचवीं कक्षा तक पढ़ने वाले एक बच्चे पर अभिभावकों का वार्षिक खर्च अनेक स्थानों पर लगभग 50 हजार रुपये या उससे अधिक पहुँच जाता है। कक्षा बढ़ने के साथ यह खर्च भी लगातार बढ़ता जाता है।
उच्च शिक्षा की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। निजी मेडिकल कॉलेजों में MBBS की पढ़ाई पर लगभग 1 से 1.5 करोड़ रुपये तक का व्यय हो सकता है, जबकि निजी इंजीनियरिंग संस्थानों में B.Tech की पढ़ाई पर सामान्यतः 20 लाख रुपये तक, और कुछ प्रतिष्ठित निजी संस्थानों में इससे भी अधिक खर्च आता है।
ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अब केवल आर्थिक रूप से सक्षम परिवारों तक सीमित होती जा रही है?
*यह केवल शिक्षा का नहीं, राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है
यह संकट केवल संस्थानों के बंद होने या शिक्षकों की कमी तक सीमित नहीं है। इसके पीछे बदलती जनसंख्या, घटते नामांकन, शिक्षा की गुणवत्ता, रोजगार की उपलब्धता, कौशल विकास और शिक्षा नियोजन जैसे अनेक गंभीर प्रश्न जुड़े हुए हैं। यदि शिक्षा को स्थानीय आवश्यकताओं, उद्योगों, कौशल विकास और रोजगार से समय रहते नहीं जोड़ा गया, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहरा सकता है।
आज देश में अक्सर यह कहा जाता है कि हर कार्य सम्मानजनक है और स्वरोज़गार भी रोजगार का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। यह बात अपनी जगह सही है, किंतु इससे यह प्रश्न समाप्त नहीं हो जाता कि क्या करोड़ों युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, निष्पक्ष प्रतियोगी परीक्षाएँ और समान अवसर उपलब्ध हो रहे हैं?
रील बनाना या पकौड़े बेचना किसी व्यक्ति का सम्मानजनक व्यवसाय हो सकता है, लेकिन यदि एक राष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप अवसर उपलब्ध न करा सके, तो यह गंभीर आत्ममंथन का विषय अवश्य है।
*अब उत्तरदायित्व तय होना चाहिए
यह विषय किसी एक विद्यार्थी, एक परिवार या एक राज्य का नहीं है। यह देश के प्रत्येक घर का प्रश्न है।
संपन्न परिवार अर्थात राजनेता, अभिनेता, उद्योगपति अपने बच्चों को देश या विदेश के महंगे संस्थानों में पढ़ा सकते हैं, लेकिन एक सामान्य भारतीय परिवार की पूरी जीवन भर की कमाई भी कई बार अपने बच्चे को निजी मेडिकल कॉलेज में पढ़ाने के लिए पर्याप्त नहीं होती।
हम अपनी आने वाली पीढ़ी को स्वच्छ जल, स्वच्छ वायु, उपजाऊ मिट्टी और सुरक्षित पर्यावरण देने के संघर्ष में पहले से ही पीछे हैं। कम-से-कम उन्हें ऐसी शिक्षा व्यवस्था तो दें, जहाँ उनका भविष्य उनकी मेहनत से तय हो, न कि भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता और अव्यवस्था से।
अब समय आ गया है कि शिक्षा को राजनीतिक बहस का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए। क्योंकि विद्यालयों में बैठा विद्यार्थी ही कल का वैज्ञानिक, शिक्षक, चिकित्सक, अभियंता, न्यायाधीश, सैनिक और राष्ट्र का नेतृत्व करने वाला नागरिक बनेगा। यदि शिक्षा कमजोर होगी, तो राष्ट्र की नींव भी कमजोर होगी। इसलिए शिक्षा व्यवस्था को बचाना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का साझा दायित्व है। (लेखक के अपने विचार हैं)