
लेखक : प्रोफेसर (डॉ.) सोहन राज तातेड़
पूर्व कुलपति सिंघानिया विश्वविद्यालय, राजस्थान
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राम राज्य की कल्पना भारत में सुशासन के लिए कि जाती है। भगवान् राम अयोध्या के महाराजा दशरथ के सबसे बड़े पुत्र थे। महाराज दशरथ के चार पुत्र थे। उनके नाम थे, राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न। महाराज दशरथ के तीन रानियां थी- कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा। महाराज दशरथ के कौशल्या से भगवान श्रीराम, कैकेयी से भरत और शत्रुघ्न और सुमित्रा से लक्ष्मण का जन्म हुआ था। चारों भाई बड़े प्रेम से रहा करते थे और पिता के आज्ञाकारी थे। बाल्यावस्था में महर्षि वशिष्ठ के संरक्षण में चारों भाइयों का शिक्षण प्रशिक्षण हुआ। कुछ समय के बाद महर्षि विश्वामित्र ने राम और लक्ष्मण को दशरथ से मांगकर ले गये, जिससे कि वनों में रहने वाले ऋषियों और महर्षियों की साधना निर्विघ्न पूरी हो सके। यद्यपि महाराज दशरथ यह नहीं चाहते थे कि बालक राम उनकी आंखों से ओझल हो किन्तु महर्षि वशिष्ठ के कहने पर महाराज दशरथ ने राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र को सौंप दिया। विश्वामित्र ने राम और लक्ष्मण को सभी विद्याओं का ज्ञान करा दिया। धीरे-धीरे जब राम और लक्ष्मण बड़े हुए तो एक बार महर्षि विश्वामित्र मिथिला से होकर जा रहे थे। संयोग अच्छा था कि उसी समय महाराज जनक के दरबार में सीता स्वयंवर का आयोजन था। गुरु विश्वामित्र की आज्ञा से राम और लक्ष्मण ने भी स्वयंवर में भाग लिया और शिव धनुष तोड़कर भगवान राम ने सीता का पाणिग्रहण किया। इसी समय महाराज जनक के परिवार के अन्य तीन पुत्रियों के साथ भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का भी पाणिग्रहण सम्पन्न हुआ। चूंकि महाराज दशरथ के भगवान राम सबसे बड़े पुत्र थे, इसलिए एक दिन मंत्रियों से सलाह कर दशरथ ने राम को राज्यभार सौंपना चाहा। किन्तु जब यह बात कैकेयी को पता चला तो उनकी दासी मंथरा ने कैकेयी को राम के विरुद्ध उकसाकर कैकेयी के दिमाग को पलट दिया। कैकेयी कोपभवन में चली गयी। जब राजा दशरथ को कैकेयी के कोपभवन में जाने का पता चला तो कैकेयी को मनाने के लिए राजा दशरथ उसके पास गये। किन्तु कैकेयी ने राजा दशरथ की एक न मानी और पूर्व में दिये गये वचन के अनुसार महाराज दशरथ से तीन वर मांग लिये। एक वर मंे राम के लिए चौदह वर्ष के वनवास को मांगा। इसको सुनते ही महाराज दशरथ मूर्च्छित होकर गिर पड़े। किन्तु रघुकुल की यह मर्यादा थी कि- ‘‘प्राण जाय पर वचन न जायी’’ अर्थात् प्राण भले चला जाये पर वचन अवश्य पूरा होना चाहिये। जब इस बात का पता भगवान राम को चला तो उन्होंने सहर्ष बन जाना स्वीकार कर लिया। राम लक्ष्मण और सीता के साथ वन के लिए प्रस्थान कर दिया। वन मंे उन्होंने मर्यादापूर्वक चौदह वर्ष बिताये। वहां पर तपस्या में विघ्न डालने वाले राक्षसों का संहार भी किया। सज्जनों का कल्याण और दुष्टों का विनाश करने के लिए जिस राज्य की स्थापना हुई थी वहीं राम राज्य है। जब भरत को राम के वन गमन की सूचना मिली तो वह वन में जाकर के भगवान राम से अयोध्या चलने की बहुत प्रार्थना की। किन्तु पिता के वचन के अनुसार राम चौदह वर्ष तक वन में ही रहे। भरत ने भगवान राम की चरण पादुका को लाकर सिंहासन पर स्थापित किया और चौदह वर्ष तक उसकी पूजा की। वन में रावण के द्वारा सीता का हरण भी हो गया था। राम ने हनुमान और अन्य अपने सहयोगियों की सहायता से रावण की नगरी लंका पर आक्रमण करके दुष्टों का संहार करके सीता को वापस लाया और अयोध्या जाने पर उनका राज्याभिषेक करके राजा बनाया गया। भगवान राम ने जिस मर्यादा के साथ सुशासन स्थापित किया वही राम राज्य कहलाता है। राम राज्य का मतलब है कि जनता को किसी प्रकार का कष्ट न हो, सभी सुखी रहे, न्याय का शासन हो, भाई के प्रति स्नेह हो, आदर्श राज्य हो, अन्याय का प्रतिरोध और न्याय की स्थापना हो, समाज और देश के अंदर कही किसी प्रकार का उपद्रव न हो, प्रकृति समयानुकूल आचरण करे। यही राम राज्य का मुख्य आदर्श है। महात्मा गांधी ने भी अंग्रेजों से भारत के स्वतंत्र होेने के पश्चात् राम राज्य की कल्पना की थी। राम राज्य के लिए उन्होंने सर्वोदय, हिन्दस्वराज्य, सविनय अवज्ञाआन्दोलन, सत्याग्रह इत्यादि आन्दोलनों के द्वारा सुशासन की स्थापना करने का प्रस्ताव रखा था। उनका विचार था कि सादगी पूर्ण जीवन और रोटी, कपड़ा, मकान सबको मिले। शिक्षा और स्वास्थ्य सबके लिए सुलभ हो। किसी को किसी भी प्रकार का कष्ट न हो। यही राम राज्य का उद्देश्य था। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सबका साथ सबका विकास नारा देकर राम राज्य की स्थापना करने का प्रयास कर रहे है। इसके पूर्व गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए वे गुजरात में विकास का ऐसा खाका खींचा जो सम्पूर्ण देश के लिए अनुकरणीय रहा है। गुजरात में जनता की बुनियादी सेवाएं इतनी सुदृढ़ है कि कोई वहां जाकर देखे तो उसको यह पता चलता है कि यहां के जनता का जनजीवन कितना सुखमय है। जनता को बुनियादी सुविधाएं सदैव मिलती रहे, जनता को किसी प्रकार का कष्ट न रहे, ऐसी व्यवस्था सरकार की तरफ से की जानी चाहिए। राम राज्य में जनता प्रसन्न थी। किसी को किसी प्रकार का कष्ट नहीं था। दैहिक, दैविक और भौतिक ताप से जनता मुक्त थी। अतिवृष्टि और अनावृष्टि का प्रकोप नहीं होता था। प्रकृति और मानव का तादात्म्य स्थापित था। लोग अहिंसा पूर्ण आचरण करते थे और सबका जीवन खुखहाल था। भारत की इसी परम्परा के कारण इसे विश्व गुरु कहा जाता है क्योंकि सभ्यता का प्रसार यही से हुआ। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)