
क्या केवल शब्द बदले हैं, व्यवस्था भी बदली है?
लेखक : श्रीप्रकाश सिंह निमराजे
अध्यक्ष- गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर, मध्य प्रदेश
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आजकल समरसता के विषय पर सम्मेलन, बैठकें और विचार-विमर्श आयोजित किए जा रहे हैं। इन आयोजनों में बड़े-बड़े विद्वानों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक चिंतकों को आमंत्रित किया जाता है। समाज में सद्भाव, एकता और पारस्परिक सहयोग की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन ऐसे आयोजनों के बीच एक बुनियादी प्रश्न उठाना भी आवश्यक है कि क्या समरसता की नई शब्दावली के साथ सामाजिक वास्तविकताओं में भी कोई ठोस बदलाव आया है, अथवा पुराने प्रश्नों को नए शब्दों और नए मंचों के माध्यम से प्रस्तुत किया जा रहा है?
शब्द बदलने और व्यवस्था बदलने में अंतर है। किसी अवधारणा को नया नाम देना, उस पर सम्मेलन आयोजित करना और विद्वानों के विचार सुनना अपने आप में सामाजिक परिवर्तन का प्रमाण नहीं है। परिवर्तन की वास्तविक कसौटी यह है कि समाज में समानता कितनी बढ़ी, भेदभाव कितना कम हुआ, वंचित समुदायों को शिक्षा और रोजगार के अवसर कितने मिले, सार्वजनिक संसाधनों का न्यायपूर्ण उपयोग कितना हुआ तथा संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का लाभ आम नागरिक तक कितना पहुँचा।
समरसता शब्द का प्रयोग सामाजिक सद्भाव और पारस्परिक सम्मान के अर्थ में किया जाए, तो यह सकारात्मक उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है। लेकिन यदि समरसता की चर्चा सामाजिक असमानताओं, ऐतिहासिक वंचना और अधिकारों से जुड़े प्रश्नों को पीछे छोड़ देती है, तो उसके उद्देश्य और परिणामों की समीक्षा जरूरी हो जाती है। सामाजिक सद्भाव तभी स्थायी हो सकता है, जब वह न्याय, समानता और मानवीय गरिमा पर आधारित हो।
भारतीय संविधान ने देश के नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता का आदर्श प्रस्तुत किया है। संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता, अनुच्छेद 15 निर्दिष्ट आधारों पर भेदभाव के निषेध, अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में अवसरों की समानता और अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता के उन्मूलन से संबंधित है। संविधान का अनुच्छेद 46 कमजोर वर्गों, विशेष रूप से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शैक्षणिक एवं आर्थिक हितों को बढ़ावा देने तथा उन्हें सामाजिक अन्याय और शोषण से बचाने के लिए राज्य को दिशा देता है।
इन प्रावधानों की मौजूदगी हमें यह समझने का अवसर देती है कि सामाजिक परिवर्तन का मूल्यांकन केवल विचार-मंचों पर व्यक्त धारणाओं से नहीं, बल्कि संवैधानिक अधिकारों के वास्तविक क्रियान्वयन से किया जाना चाहिए। यदि कोई सम्मेलन समरसता की बात करता है, तो उसके साथ यह चर्चा भी होनी चाहिए कि सामाजिक भेदभाव रोकने के लिए कौन-से प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं, वंचित समुदायों की शिक्षा और आजीविका में क्या सुधार हुआ है, महिलाओं की निर्णय-प्रक्रिया में भागीदारी कितनी बढ़ी है और सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक किस सीमा तक पहुँच रहा है।
यह भी विचारणीय है कि ऐसे सम्मेलनों में आमंत्रित विद्वानों के विचारों को जमीनी परिस्थितियों से किस प्रकार जोड़ा जाता है। क्या सम्मेलन के बाद कोई कार्ययोजना बनती है? क्या स्थानीय समस्याओं की पहचान की जाती है? क्या सार्वजनिक नीतियों के क्रियान्वयन की समीक्षा होती है? क्या वंचित समुदायों के अनुभवों को पर्याप्त स्थान दिया जाता है? क्या आयोजन के निष्कर्षों के आधार पर जिम्मेदार संस्थाओं से जवाबदेही माँगी जाती है? यदि इन प्रश्नों के उत्तर स्पष्ट नहीं हैं, तो सम्मेलन के प्रभाव का मूल्यांकन केवल उसके भव्य आयोजन या आमंत्रित व्यक्तियों की प्रतिष्ठा के आधार पर नहीं किया जा सकता।
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सामाजिक और आर्थिक असमानताओं के रहते राजनीतिक लोकतंत्र के सामने उपस्थित चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाया था। उनका चिंतन इस बात पर जोर देता है कि समान नागरिकता का आदर्श सामाजिक जीवन में भी प्रतिबिंबित होना चाहिए। केवल औपचारिक समानता पर्याप्त नहीं, बल्कि लोगों को सम्मान, अवसर और अधिकारों का वास्तविक लाभ मिलना भी आवश्यक है। इसलिए किसी भी सामाजिक अवधारणा की उपयोगिता इस आधार पर परखी जानी चाहिए कि वह संविधान के मूल्यों को मजबूत करती है या वास्तविक असमानताओं पर चर्चा को सीमित करती है।
यहाँ प्रश्न किसी सम्मेलन, विद्वान या आयोजक की मंशा पर संदेह करने का नहीं है। प्रश्न यह है कि सामाजिक विमर्श का परिणाम क्या है। यदि समरसता पर होने वाली बैठकें सामाजिक भेदभाव को कम करने, शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ाने, सार्वजनिक संस्थाओं को जवाबदेह बनाने और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने में योगदान देती हैं, तो उनका स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन यदि विमर्श केवल भाषणों, घोषणाओं और प्रतीकात्मक गतिविधियों तक सीमित रह जाता है, तो उसके प्रभाव पर प्रश्न उठाना लोकतांत्रिक अधिकार और बौद्धिक जिम्मेदारी है।
आज आवश्यकता केवल शब्दों की नई व्याख्या करने की नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों को धरातल पर उतारने की है। समरसता के प्रत्येक सम्मेलन में यह चर्चा होनी चाहिए कि समाज में असमानताओं को कम करने के लिए क्या किया जाएगा, जिम्मेदार कौन होगा, समयसीमा क्या होगी और परिणामों का मूल्यांकन कैसे किया जाएगा। जब तक विचारों को कार्ययोजना, कार्ययोजना को क्रियान्वयन और क्रियान्वयन को मापने योग्य परिणामों से नहीं जोड़ा जाता, तब तक सामाजिक परिवर्तन का दावा अधूरा रहेगा।
निष्कर्षतः, समरसता का विरोध करना उद्देश्य नहीं है; उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समरसता के नाम पर संवैधानिक समानता और सामाजिक न्याय के प्रश्न पीछे न छूट जाएँ। शब्द बदलना आसान है, लेकिन व्यवस्था बदलने के लिए नीतिगत प्रतिबद्धता, संस्थागत जवाबदेही और निरंतर सामाजिक प्रयास आवश्यक हैं। किसी भी सम्मेलन की वास्तविक सफलता इस बात से तय होनी चाहिए कि उससे समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के जीवन में कितना सकारात्मक परिवर्तन आया।
समरसता के सम्मेलन अवश्य हों, विद्वानों के विचार भी सुने जाएँ, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही रहे: संविधान का बेहतर क्रियान्वयन कितना हुआ? शब्द बदले हैं—क्या सामाजिक वास्तविकताएँ भी बदली हैं? (लेखक के अपने विचार हैं)