बाढ़ प्रकृति का कहर या मानव की हठधर्मिता का परिणाम : राम भरोस मीणा

लेखक: राम भरोस मीणा
प्रकृति प्रेमी व स्वतंत्र लेखक हैं।
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“पहाड़ी क्षेत्रों में खत्म होती वन सम्पदा व वनस्पतियों के नष्ट होने से पानी तेज़ बहाव के साथ मैदानी क्षेत्रों की ओर दौड़ता हुआ आता है, मैदानी बहाव क्षेत्रों में बने अवरोधों से पानी को आगे बढ़ने से रोका जाता है और थोड़ी वर्षा से बाढ़ जैसे हालात पैदा हो जातें हैं, जबकि वर्षा जल को एक साथ रोकना आपदाओं को बुलावा देना है”।
“शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में सुनियोजित विकास नहीं होना, आबादी का तेजी से बढ़ना, प्राकृतिक जल संरचनाओं, बहाव क्षेत्रों को अतिक्रमण की चपेट में लेना, वर्षा जल संग्रह जैसे कार्यों की अनदेखी के चलते हालातों पर काबू नहीं पाया जा सकता।
पिछले दो चार दिनों से राजस्थान में इन्द्र देव की कृपा से कहीं खुशी में, कहीं गम में ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में माहोल तब्दील होता दिखाई दे रहा हैं, और होना भी था, प्रकृति कहर बरपा रही है। लेकिन वर्षा से व्यक्ति ख़ुश मिजाज ज्यादा दिखाई दे रहें हैं, दूसरी तरफ लोग अपने बचाव में लगे परेशान भी दिख रहें है। कोटा, बूंदी, बारां, सवाईमाधोपुर, करौली में कहीं गांव टापू बने हुए हैं, शहरों में नदी नालों जैसा उफान दिखाई दे रहा है। अब बात यह आती है कि खेत खलिहान में फसलें नष्ट हो रही, जन-जीवन प्रभावित हो रहा, आर्थिक विकास अवरूद्ध बना है । यह स्वाभाविक भी है, जब प्राकृतिक आपदाएं होती है तब विकास भी रुकेगा और जन जीवन प्रभावित भी होगा, यह सम्पूर्ण जैव मण्डल पर होता आया है और होता रहेगा, केवल राजस्थान या इण्डिया में नहीं। वैसे भी यह आम बात है, जब प्रकृति का कहर बरपा हों और वहां परेशानी नहीं हो, सम्भव नहीं। अब चाहे हम बादल फटने की बात करें, प्रकृति के कहर बरपाने की, धरती धंसने की या फिर हिमालय के सैलाबों की, झीलें फटने की। “खैर यहीं क्यों” अकाल सुखाड़ में भी जन जीवन प्रभावित होते हैं, लोग पलायन कर जाते हैं, पशु पक्षी चारे पानी के अभाव में तड़पते हैं। हालांकि ये सभी होते आएं हैं, इन्हें रोक नहीं सकते, टोक नहीं सकते, रास्ते अवरुद्ध नहीं कर सकते, क्योंकि प्रकृति स्वमं अपने आप चलतीं है ना कि उसे कोई सिस्टम चलाता है।
अब बात यह आती है कि जहां पहाड़ी रेगिस्तानी और मैदानी इलाकों के साथ विविध प्रकार की संरचनाएं लिए धरा का निर्माण हुआ हो, जहां पौराणिक व्यवस्थाएं सुदृढ़ हो, फिर ना जाने क्यों उस देश के लोग परेशान हो रहे है। आखिर बाढ़ के हालात पैदा क्यों है? वैसे बाढ़ कहीं भी आ सकती है और आ भी जाती है। पहले हिमालयी क्षेत्र में आई धराली जैसी समस्या और अब राजस्थान के कोटा, बुंदी, बारा, सवाईमाधोपुर और अब टोंक निवाई में वर्षा को लेकर जन जीवन परेशान होता दिखाई दे रहा है। स्वाभाविक यह होना भी था, क्योंकि मकानों में पानी आ रहा है, जन जीवन प्रभावित हो रहा है, राज कार्य नहीं हो पा रहे हैं, विकास अवरूद्ध हो रहा है, आखिर बात क्या है?
समस्याओं की जड़ मानवीय हठधर्मिता, अनैतिक विकास, सड़क निर्माण के साथ नालों के बहाव क्षेत्रों की अनदेखी, कालोनियों के विकास में पानी की निकासी पर ध्यान नहीं देना, जोहड़ नदी नालों के रास्ते अवरुद्ध करना, बहाव क्षेत्रों में आबादी बसाना, वर्षा पानी के रास्तों पर कचरे के पहाड़ बनाना तथा पहाड़ों से वन सम्पदा ओ का नष्ट होना, बाढ़ के हालात पैदा करने में अपनी अहम् भूमिका निभा रहे हैं।
वर्तमान परिवेश में जहां मौसम चक्र गड़बड़ा रहा हों, अतिवृष्टि अनावृष्टि की सम्भावना बनी हुई हों, उन परिस्थितियों में पारिस्थितिकी सिस्टम को मजबूत बनाने की कोशिशें करने के साथ हमें सुनियोजित विकास की तरफ ध्यान देना चाहिए, नदी नालों को संरक्षण मिलना चाहिए, वन वनस्पतियों को बढ़ावा देना चाहिए, प्राकृतिक जल संग्रह केन्द्रों को जनोपयोगी बनाएं रखना चाहिए, सभी प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षण प्रदान करने के साथ स्वमं मानव को अपनी हठधर्मिता त्याग कर उन सभी स्थानों, जगहों का त्याग करना चाहिए जिससे उसे कभी भी आर्थिक नुकसान के साथ जन हानि होने की सम्भावना बनती हों, उस विकास का त्याग करना चाहिए जिससे हमारे प्राकृतिक संसाधनों का विनाश सर्वाधिक होता हों, यदि हम प्रकृति और परिस्थितियों को समझते हुए अपने विकास को गति देंगे तब ही टिकाऊ, सुव्यवस्थित, सुनियोजित विकास हो सकेगा, आपदाओं से बच सकेंगे। (लेखक के अपने निजी विचार है।)

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