बेहद खतरनाक है पिघलते ग्लेशियरों से उपजा संकट – ज्ञानेन्द्र रावत

लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
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धरती तप रही है। इसमें मानवजनित गतिविधियों के चलते ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की अहम भूमिका है। इससे दुनिया भर में ग्लेशियरों पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है और वे तेजी से पिघल रहे हैं। इस खतरे को बढ़ाने में प्रदूषित हवाओं की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। ग्लेशियरों की यह प्राचीन बर्फ धरती का सबसे नाजुक हिस्सा है। सर्दी में इसकी ऊपरी तह मोटी हो जाती है जबकि गर्मी के दिनों में इसकी निचली तह पिघलती है। इसका पूरा जीवन इसके कितना बनने और कितने पिघलने पर निर्भर करता है। समूची दुनिया में ये ग्लेशियर ग्लोबल वार्मिंग के बैरोमीटर माने जाते हैं। ग्रीनहाउस गैसों के असर से पूरी दुनिया के साथ साथ हिमालय भी गरम हुआ है। उत्तर पश्चिम हिमालय के औसत तापमान में पिछले तकरीब 30-35 सालों में अनुमानत: दो से तीन डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुयी है। यह आंकड़ा पिछले सौ-सवा सालों में हुयी बढ़ोतरी से कहीं ज्यादा है। फिर हिमालयी अंचल में जंगलों की आग और बाहर से आने वाली प्रदूषित हवाएं ग्लेशियरों के पिघलने का खतरा और बढ़ा रही हैं। इससे हिमालय में ब्लैक कार्बन की मात्रा बढ़ने से जहां तापमान में बढ़ोतरी हो रही है,वहीं ग्लेशियरों के पिघलने की दर भी तेजी से बढ़ रही है। इसका खुलासा वाडिया इंस्टीटयूट के अध्ययन ने किया है। उसकी मानें तो वायु प्रदूषण का बड़ा हिस्सा ब्लैक कार्बन का है। इससे ग्लेशियरों के पिघलने का खतरा दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। ब्लैक कार्बन का करीब 78 फीसदी हिस्सा वाहनों, उद्योगों और मैदानी इलाकों के प्रदूषण का है। दुनिया के अध्ययन चेतावनी दे रहे है कि जैसे-जैसे ग्लेशियर पिघलेगे, वैसे-वैसे आने वाले दशकों में बाढ़ की विभीषिका बढ़ेगी और उसके बाद नदियां सूखने लगेंगी। चिंता की बात तो यह है कि ग्लेशियरों के पिघलने की यदि यही रफ्तार रही तो 21 वीं सदी के अंत तक एशिया और आने वाले दस सालों यानी 2035-2036 तक हिमालय के ग्लेशियर पूरी तरह गायब हो जायेंगे। इस सबके लिए औद्योगिकीकरण को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। लेकिन इसमें इंसानी गतिविधियों की भूमिका को भी नकारा नहीं जा सकता जो इसकी भयावहता के लिए कम दोषी नहीं है।

देखा जाये तो 1850 के करीब औद्योगिक क्रांति से पहले की तुलना में धरती एक डिग्री गर्म हुयी है। हालात गवाह हैं और वैज्ञानिकों का भी मानना है कि उनके द्वारा 2 डिग्री की सीमा को 2100 तक बचा पाना संभव नहीं है। यदि ऐसा हुआ तो एशिया में ग्लेशियरों का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। नीदरलैंड और हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय भूभौतिकी अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने तो काफी पहले यह चेतावनी दे दी थी। यह भी कि ग्लेशियरों की बर्फ पिघलने से भविष्य में समुद्री जलस्तर में 1से 1.2 फीट तक की और बढ़ोतरी हो सकती है जिसका असर मुंबई, न्यूयार्क, पेरिस और लंदन जैसे शहरों पर पड़ेगा। कृत्रिम झीलें बनने से 2013 में आयी केदारनाथ जैसी आपदा के खतरे भी बढ़ेंगे। फिर जलवायु परिवर्तन का असर भी इस संकट को और भयावह बना रहा है। मिजोरम यूनिवर्सिटी के नये शोध ने खुलासा किया है कि यदि मौजूदा गर्मी बढ़ने का सिलसिला जारी रहा तो सदी के आखिर तक हिमालय की तकरीबन 60 फीसदी बर्फ यानी स्नो कवर समाप्त हो सकती है। मध्य और पूर्वी हिमालयी इलाके की स्थिति तो इस बारे में काफी चिंताजनक और खतरनाक है।
सबसे बड़ी चिंताजनक स्थिति यह है कि जहां इंसानी दखल बेहद सीमित है, वहां के भी ग्लेशियर तेजी से पिघलकर सिकुड़ रहे हैं।खतरनाक तो यह है कि वहां ग्लेशियर झीलें अपना आकार बढ़ा रही हैं। इसका खुलासा इसरो ने किया है। वैज्ञानिकों ने वहां 10 हैक्टेयर से भी ज्यादा क्षेत्रफल की 2431 बड़ी झीलें चिन्हित की हैं जो कभी भी फट सकती हैं। उस स्थिति में तबाही के अंदेशे से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ग्लोबल वार्मिंग की गति यदि यही बरकरार रही तो आने वाले समय में हिमालयी अंचल में ऐसी घटनाओं की बढ़ोतरी की आशंका को नकारा नहीं जा सकता। इससे संकट और भयावह रूप अख्तियार कर सकता है।

असलियत यह है कि वर्ष 1990 से लेकर 2020 के बीच के 30 सालों के बीच यहां की 30 फीसदी बर्फ घट गयी है। यही नहीं 1980 से 2020 के बीच के 40 सालों में इस इलाके का तापमान प्रति दशक 0.2 से 0.3 डिग्री सेल्सियस की दर से बढ़ा है। यह वैश्विक औसत से दोगुणा है। इसमें बदलते बारिश के पैटर्न और बढ़ते तापमान ने अहम भूमिका निबाही है। फिर हिमालयी अंचल में बर्फबारी के पैटर्न बदलने का सीधा असर वाटर बैंक माने जाने वाले ग्लेशियरों पर पड़ रहा है। यह चिंताजनक स्थिति है। इस बदलाव का अहम कारण पश्चिमी विक्षोभ में आयी असमानता है। सर्दियों में पश्चिमी विक्षोभ के कमजोर पड़ने से बारिश और बर्फबारी में कमी और गर्मियों में इसके बढ़ने से बर्फबारी के साथ-साथ बारिश, ओलावृष्टि और आपदाओं के खतरे बढ़ रहे हैं। आने वाले दिनों में इससे जहां जल – स्रोत प्रभावित होंगे ही, आपदायें आयेंगीं। इससे आर्थिक के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा और सामाजिक नुकसान होगा सो अलग जिसकी भरपायी नामुमकिन होगी। इससे न केवल हिमालयी अंचल का पारिस्थितिकीय तंत्र बल्कि दक्षिणी-मध्य एशिया के करोड़ों-करोड़ लोगों की जल सुरक्षा, कृषि और जीवन पर गहरा और गंभीर असर पड़ेगा। (लेखक के अपने विचार है)

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