रामत्व का मर्म: त्याग, अनुशासन, मर्यादा और चरित्र बोध का जीवंत दर्शन

लेखक : मोहित चौहान रमाला
(सोशल एक्टिविस्ट)
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आज का दौर एक गहरे विरोधाभास से गुजर रहा है। एक तरफ भव्यता का महासमंदर है—ऊँचे शिखर, गूंजते जयकारे, सोशल मीडिया पर राम नाम के नारों की बाढ़ और हर ओर धर्म की मुखर चर्चाएं। परंतु दूसरी तरफ यदि उसी समाज के भीतर देखा जाए, तो नैतिक पतन का एक गहरा दलदल भी दिखाई देता है। स्वार्थ की अंधी दौड़, टूटते पारिवारिक संबंध, वृद्ध माता-पिता की उपेक्षा, नारी सुरक्षा पर उठते गंभीर प्रश्न, पद-प्रतिष्ठा का घमंड और नियम-कानूनों की अवहेलना करने की होड़ हर जगह व्याप्त है। ऐसे माहौल में एक तीखा और विचारणीय प्रश्न हम सभी के सामने आता है कि क्या हम सचमुच राम को समझ पाए हैं, या हमने राम को केवल एक पूजन सामग्री, एक नारा या अपनी धार्मिक अस्मिता का साधन मात्र बनाकर रख दिया है।
राम के जीवन को समझे बिना और उनके त्याग को आत्मसात किए बिना हम ‘राम’ के वास्तविक स्वरूप को कदापि नहीं समझ सकते। जिस क्षण एक युवा को अखंड भारत के सबसे समृद्ध साम्राज्य का सिंहासन मिलने वाला था, उसी क्षण उन्हें चौदह वर्षों के कठोर वनवास का आदेश मिला। बिना किसी आक्रोश, बिना किसी शिकन और बिना किसी शिकायत के केवल पिता के वचन और धर्म की मर्यादा के लिए राजसी वैभव का क्षणभर में त्याग कर देना ही रामत्व की पहली सीढ़ी है। आज के आधुनिक मानव की त्रासदी यह है कि वह अधिकारों की बात तो दिन-रात करता है, लेकिन कर्तव्यों और त्याग का नाम सुनते ही पीछे हट जाता है। छोटी-सी संपत्ति या छोटे-से पद के लिए सगे संबंधों में दरारें आ जाती हैं। जब तक हमारे भीतर स्वार्थ और लिप्सा का त्याग करने की क्षमता नहीं होगी, तब तक राम केवल एक शब्द बने रहेंगे, वे जीवन का आंतरिक बोध नहीं बन पाएंगे।
श्रीराम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहा गया है। मर्यादा का अर्थ कोई संकुचित बंधन नहीं, बल्कि अपनी शक्ति, अपने अधिकारों और अपनी इच्छाओं पर स्व-नियंत्रण है। राम चक्रवर्ती सम्राट के पुत्र थे और अप्रतिम पराक्रम के स्वामी थे, किंतु उनकी वाणी में कभी घमंड का एक बोल भी नहीं था। वे शबरी के भक्ति-भाव से दिए गए बेरों को सहर्ष स्वीकार करते हैं, निषादराज को भ्रातृवत् गले लगाते हैं और रावण जैसे शत्रु के धराशायी होने पर भी लक्ष्मण को उससे ज्ञान प्राप्त करने भेजते हैं। युद्ध का मैदान हो या जीवन का कठिन संघर्ष, राम ने कभी अपनी सुविधा के लिए मर्यादाओं को नहीं तोड़ा। उनका अनुशासन किसी बाह्य दबाव का परिणाम नहीं, बल्कि आंतरिक विवेक और धर्म-बोध से उपजा था। आज जब समाज में व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं के लिए नियमों को ताक पर रखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तब राम की मर्यादा हमें याद दिलाती है कि बिना सीमाओं और नियमों के कोई भी समाज सुरक्षित नहीं रह सकता।
रामायण केवल एक युद्ध की कथा नहीं, बल्कि हमारे भीतर चल रहे दो विपरीत विचारों और प्रवृत्तियों का दर्पण है। एक तरफ श्रीराम हैं जो त्याग, कर्तव्य, मर्यादा और समभाव के प्रतीक हैं, वहीं दूसरी तरफ लंकापति रावण है जो संग्रह, भोग-विलास, अधिकार और अहंकार का प्रतिनिधित्व करता है। रावण कोई साधारण व्यक्ति नहीं था; वह चारों वेदों का ज्ञाता, महाज्ञानी, शिव-भक्त और अपार शक्ति का स्वामी था। परंतु उसके पास जो नहीं था, वह था चरित्र, संयम और मर्यादा। उसने अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों को डराने और अन्याय करने में किया। ज्ञान और शक्ति होना बड़ी बात नहीं है, बल्कि उनका उपयोग किस दिशा में हो रहा है, यह तय करता है कि मनुष्य पूज्य बनेगा या विनाशकारी। आज के शिक्षित समाज को यह सोचने की आवश्यकता है कि क्या हम अपनी डिग्री, तकनीक और संपत्ति के अहंकार में अपने भीतर एक रावण तो नहीं पाल रहे हैं।
आज के आधुनिक युग में राम के पदचिह्नों पर चलने के लिए हमें जंगल जाने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि अपने दैनिक जीवन और आचरण में परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। पारिवारिक जीवन में अधिकारों से पहले कर्तव्यों को प्राथमिकता देना और रिश्तों में निष्ठा लाना ही रामत्व है। सामाजिक जीवन में जाति, पद या वर्ग से परे उठकर हर मनुष्य का सम्मान करना और कमजोर का संबल बनना ही राम का मार्ग है। व्यक्तिगत जीवन में अपनी बात और वादे पर टिके रहना, विषम परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखना और इंटरनेट तथा तकनीक के इस युग में अपनी इच्छाओं पर संयम रखना ही सच्ची मर्यादा है। कार्यक्षेत्र या प्रशासन में ईमानदारी, पारदर्शिता और अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति का कल्याण सुनिश्चित करना ही वास्तविक रामराज्य की भावना है।
राम केवल मंदिर के पत्थरों में कैद रहने वाली मूर्ति नहीं हैं, वे एक जीवंत जीवन-दर्शन हैं। जब तक हम राम के आदर्शों को केवल ग्रंथों में पढ़ेंगे और अपने आचरण में रावण जैसा अहंकार पालेंगे, तब तक न तो समाज सुधरेगा और न ही राष्ट्र का वास्तविक उत्थान होगा। आज समय आ गया है कि हम दिखावे से बाहर निकलें और अपने भीतर छिपे स्वार्थ, लोभ और मर्यादाहीनता का वध करें। राम को केवल पूजने से काम नहीं चलेगा, अब राम के विचारों को अपने आचरण में ढालना होगा। जब हमारे दैनिक व्यवहार में सत्य, करुणा, अनुशासन और त्याग उतरेगा, सही मायनों में तभी ‘रामराज्य’ का प्रादुर्भाव होगा। (लेखक के अपने विचार हैं)

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