
लेखक : लोकपाल सेठी
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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लगभग सभी विपक्षी दलों ने सरकार द्वारा वक्फ कानून में संशोधन का डट कर विरोध किया था। मुस्लिम संगठनों ने इसको लेकर देश भर में लम्बा आन्दोलन किया था। इन सबका कहना था कि यह अल्पसंख्यक समुदायों के हकों पर कुठाराघात से कम नहीं। अंग्रेजों की हकुमत के काल के बाद ही इस समुदायों को मस्जिदों, मजारों तथा उनके ऐसे ही धार्मिक संस्थानों और सम्पतियों का प्रबंधन के लिए वक्फ बोर्ड बनाये गए थे। 2014 के लोकसभा चुनावों सेकुछ पहले तत्कालीन कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने वक्फ बोर्ड कानून में कई ऐसे संशोधन किये जिससे वक्फ बोर्ड को बहुत से और अधिकार मिल गए। एक संशोधन यह था कि वक्फ बोर्ड किसी भी सम्पति पर अपना अधिकार होने का दावा कर सकता है। यह उस व्यक्ति अथवा संस्था, जिसके कब्ज़े में वह जगह है, की जिम्मेदारी होगी कि वह कोर्ट में जाकर यह सिद्ध करे कि कानूनी रूप से यह जगह उसकी है न कि वक्फ बोर्ड की।
बीजेपी नीत एन.डी.ए. सरकार ने पिछले साल इस संशोधित कानून में कई सारे बदलाव कर वक्फ बोर्ड के अधिकारों में कई बदलाव और कटौतियां कर दी। जिसका मुस्लिम समुदाय के नेताओं ने जोरदार विरोध किया। उनका कहना था कि बीजेपी हर तरह से मुस्लिम समुदाय को प्रताड़ित करने में लगी है। जैसा कि पहले से ही यह संकेत मिलने लगे थे ,सुप्रीम कोर्ट में संसद द्वारा पारित पारित इस संशोधित कानून को चुनौती दी गई तथा इसके लागू करने पर रोक लगाने की मांग की। इस मामले पर कई दिन कोर्ट में बहस हुई। कोर्ट ने अपने अंतरिम फैसले में कहा कि वह कानून को लागू करने पर रोक नहीं लगाएगा। साथ ही सरकार को यह निर्देश दिया कि जब तक इस केस पर अंतिम फैसला नहीं होता तब तक वह इसके कुछ प्रावधानों को लागू नहीं करे।
लेकिन जिन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें थीं या हैं, वे इस कानून को लागू ने करने में कई प्रकार के अड़ंगे लगाने में लग गईं। इस मामले में तमिलनाडु तथा केरल आगे रहे। हॉल के विधानसभा चुनावों से पहले तमिलनाडु में द्रमुक की सरकार थी तथा केरल में वाममोर्चा सत्ता में था। चूँकि यह एक केन्द्रीय कानून हैं इसलिए इसे लागू करना जरूरी था तथा नए कानून के अनुसार राज्य वक्फ बोर्ड का गठन किया जाना था। नए कानून के अनुसार राज्यों के 11 सदस्यों वाले बोर्ड में कम से कम दो गैर मुस्लिम को सदस्य बनाया जाना जरूरी है। लेकिन इन दोनों राज्यों की तत्कालीन सरकारों ने बोर्ड को गठित करने और सदस्यों को नामजद करने में एक खेल कर दिया। दोनों सरकारों ने बोर्ड के 9 मुस्लिम सदस्यों को तो नामजद कर दिया पर दो गैर मुस्लिम सदस्यों की नामज़दगी नहीं की . केवल यह लिख दिया गया कि “ये दो नियुक्तियां बाद में की जाएगी”।
यह बात तब खुलकर सामने आई जब केरल के एक बीजेपी नेता तथा नामी वकील शोने जोर्ज ने हाल ही में केरल हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की जिसमें इस बोर्ड के गठन के वैधता को चुनौती दी गई थी . उनका कहना था कि उन्होंने यह कहा कि चूँकि बोर्ड का गठन ही अवैध है इसलिए इसके दवारा लिए गए निर्णय भी अवैध है . उन्होंने याचिका में कहा कि दो गैर मुस्लिम सदस्यों के स्थान जान बूझकर खाली रखे गए ताकि राज्य का मुस्लिम समुदाय इससे नाराज़ न हो जाये . राज्य में मुस्लिम आबादी लगभग 26 प्रतिशत है . चूँकि बोर्ड गठन एक निर्धारित अवधि के भीतर ही किया जाना था इसलिए सरकार बोर्ड के गठन के लिए बाध्य थी . लेकिन विधानसभा चुनाव सिर पर थे और वाम मोर्चा हर हालत में मुस्लिम समुदाय को खुश रखना चाहता था इसलिए एक प्रकार से पतली गली निकाली गई . हाई कोर्ट ने इस याचिका पर सरकार को नोटिस जारी किया है . सरकार के कम से कम दो मत्रियों का कहना है कि कानून राय के बाद ही कोर्ट के नोटिस का जवाब दिया जायेगा।
चुनावों के बाद राज्य कांग्रेस नीत संयुक्त लोकतान्त्रिक मोर्चे की सरकार बनी है। राज्य मुस्लिम लीग ने यह चुनाव कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा था। इसके 22 विधायक चुने गए थे जिनमें से 5 को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। अब सरकार क्या जवाब देती है यह आने वाले दिनों में ही पता चलेगा।
संसद में वक्फ बोर्ड कानून में संशोधन को लेकर कांग्रेस विरोध करने में सबसे आगे थी इसलिए। इसके नेताओं ने बोर्ड में दो गैर मुस्लिम सदस्य नामजद किये जाने का डटकर विरोध किया था। इसलिए अब यह इस बात की संभावना है कि नई सरकार ऐसे दो गैर मुस्लिम सदस्य नामज़द करने को टालने का कोई रास्ता निकाल ही लेगी। यह भी कहा जा रहा है कि हो सकता है वह गैर मुस्लिम के नाम पर दो ईसाई सदस्य नामजद कर दे। राज्य में ईसाई आबादी लगभग 17 प्रतिशत है। इन चुनावों में मुस्लिम और ईसाई समुदायों ने खुलकर कांग्रेस नीत मोर्चे का समर्थन किया था। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विकार हैं)