दमित भावनाएँ फूटती हैं, तो प्रतिरोध का स्वर ग्रहण करती हैं- डॉ. हरिराम मीना

वरिष्ठ साहित्यकार दयाराम वर्मा के काव्य-संग्रह का लोकार्पण एवं कृति-चर्चा आयोजित
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जयपुर। प्रतिष्ठित साहित्यकार हरिराम मीणा ने दयाराम वर्मा के काव्य संग्रह चिंग तम अमत्तनि’ शीर्षक को मणिपुर की प्रकृति के सौन्दर्य से जोड़ते हुए कहा कि विचार के बिना कविता संभव नहीं है। जब दमित भावनाएँ ज्वालामुखी की तरह फूटती हैं, तो वे प्रतिरोध का स्वर ग्रहण कर लेती हैं। उनके अनुसार, इन कविताओं में संवेदना और वैचारिक प्रतिबद्धता का प्रभावशाली मेल दिखाई देता है। वरिष्ठ साहित्यकार नंद भारद्वाज ने कहा कि प्रकृति, मणिपुर और देश की वर्तमान परिस्थितियों के संदर्भ में एक जागरूक नागरिक की पीड़ा को दयाराम वर्मा ने कवि के रूप में बखूबी व्यक्त किया है। उनकी कविताएँ अपने समय की विद्रूपताओं और अन्याय के विरुद्ध निर्भीक प्रतिरोध का स्वर बनकर सामने आती हैं। वरिष्ठ व्यंग्यकार फ़ारूक़ आफरीदी ने कहा कि दयाराम वर्मा ने कवि के दायित्व बोध को गहराई से अनुभूत करते हुए समय को दर्ज किया है। उनकी कविताओं में मानवीय सरोकारों की गहरी उपस्थिति है। उन्होंने इन कविताओं पर और अधिक विस्तार से चर्चा की आवश्यकता रेखांकित की।
राजस्थान समग्र सेवा संघ के शारदा पुस्तकालय सभागार में वरिष्ठ साहित्यकार दयाराम वर्मा के काव्य-संग्रह ‘चिंग तम अमत्तनि’ का लोकार्पण एवं कृति-चर्चा का अयोजन किया गया। कार्यक्रम का संयोजन एवं संचालन राही सहयोग संस्थान की अध्यक्ष कविता मुखर ने किया। वक्ताओं ने कहा कि ‘चिंग तम अमत्तनि’ का आशय मणिपुर की पहाड़ियाँ और घाटियाँ मिलकर एक भूभाग बनाती हैं तथा उनके बीच मूलतः कोई विभाजन नहीं है। पुस्तक का शीर्षक मणिपुर की परिस्थितियों के संदर्भ में है। इसमें संवेदनहीनता के विरुद्ध मानवीय सरोकारों की सशक्त अभिव्यक्ति है। वक्ताओं ने कहा कि काव्य-संग्रह की कविताएँ अपने समय के प्रश्नों, अंतर्विरोधों और पीड़ाओं से संवाद करती हैं। कवि की वैचारिक प्रतिबद्धता और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस इन रचनाओं को विशिष्ट बनाता है।
वरिष्ठ कवयित्री, अजंता देव ने संग्रह की शीर्षक कविता ‘चिंग तम अमत्तनि’ , कवयित्री चेतना शर्मा ने ‘अनेक थे एक थे’, कवयित्री अनुपमा तिवारी ने ‘प्यारे रफ़ूगर’, कथाकार एवं चर्चित बालगीत ‘ओ री चिरैया’ के रचनाकार महेश कुमार ने ‘बच्चे, मेरे प्यारे बच्चे सुन’ का पाठ किया । पत्रकार उमा ने कहा कि संग्रह की प्रत्येक कविता अपनी विशिष्ट पहचान रखती है और वर्तमान समय की जरूरतों से जुड़ती है। कमल मेहता ने कहा कि कविताएँ प्रकृति से आत्मीय संबंध को अभिव्यक्त करती हैं। वरिष्ठ साहित्यकार प्रेमचंद गांधी और साकार श्रीवास्तव ने इन कविताओं को एक साहसी कवि की रचनाएँ बताया।
रचनाकार दयाराम वर्मा ने ने बताया कि उनके आरंभिक जीवन, भारतीय वायु सेना और बैंकिंग सेवा में कार्यकाल तथा पर्यटन के दौरान प्राप्त अनुभवों ने उनकी संवेदना को आकार दिया और उद्वेलित किया। जीवन के इन विविध अनुभवों और सामाजिक यथार्थ के प्रति उनकी सजग दृष्टि का परिणाम यह काव्य-संग्रह है।उन्होने बताया कि वे तटस्थ बने रहने के पक्ष में नहीं हैं और उन्होंने तय किया कि उन्हें किस पक्ष में खड़ा होना है। उनकी कविताएँ इसी प्रतिबद्धता को स्वर देती हैं। पुस्तक की प्रस्तावना में डॉ. दीप्ति गुप्ता ने कविताओं को कवि के भीतर की बेचैनी, प्रश्नों और आत्मसंवाद की अभिव्यक्ति बताया है। किसी कवि की पहचान केवल उसकी भाषा से नहीं, बल्कि उसकी संवेदना से होती है।कार्यक्रम में विनोद भारद्वाज, राजेंद्र बोड़ा, अशोक मुखर्जी, मणिमाला शर्मा, ज्योत्सना सक्सेना, डॉ. सुषमा शर्मा, शिवराज पाल सिंह, ओमेन्द्र और अरुण ठाकर सहित अनेक रचनाकार और शोधार्थी शामिल थे।

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