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जयपुर। वक्फ संपत्ति बचाओ विंग इकाई धरतीपुत्र राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष एवं प्रदेश महामंत्री मोहम्मद रियाज खान एवं प्रदेश की उपाध्यक्ष शमशाद अली ने आज फोन पर चर्चा की करने के बाद ये बताया कि कौम के रहनुमा पर सबसे पहला हमला अपनी ही कौम करती है!
इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी कौम का कोई मुख़लिस रहनुमा उसे ग़फ़लत से जगाने, उसकी तक़दीर बदलने और उसे नई राह दिखाने के लिए खड़ा हुआ, तब-तब उसे सबसे पहले अपनों की मुख़ालफ़त का सामना करना पड़ा।
हज़रत नूह अलैहिस्सलाम हों, हज़रत शोएब अलैहिस्सलाम हों, हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम हों या आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद रसूलुल्लाह ﷺ — इतिहास में इन पैग़म्बरों को अपनी-अपनी क़ौम के एक हिस्से की मुख़ालफ़त झेलनी पड़ी। सच्चाई की आवाज़ उठाना आसान नहीं होता, क्योंकि वह सिर्फ़ बाहर के दुश्मनों के हितों को चुनौती नहीं देती, बल्कि अपने समाज के भीतर जड़ जमा चुकी ग़लत सोच, स्वार्थ और वर्चस्व को भी चुनौती देती है।
आज भी जब मुस्लिम समाज का कोई शख़्स क़ौम की सियासी ताक़त, आर्थिक ख़ुशहाली, तालीमी बेदारी और सामाजिक तरक़्क़ी की बात करता है, तो उसकी राह में सबसे पहले अपने ही लोग दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं। उसकी नीयत पर सवाल उठाए जाते हैं, उसके किरदार पर हमले होते हैं और उसके हर क़दम में ऐब तलाशे जाते हैं। अफ़सोस! जिस क़ौम को उसके साथ खड़ा होना चाहिए, उसी का एक हिस्सा उसके हौसले तोड़ने में लग जाता है।
आख़िर ऐसा क्यों होता है?
इसकी एक बड़ी वजह यह है कि हर समाज में कुछ लोग अपनी व्यक्तिगत हैसियत, अपने प्रभाव और अपने हितों को समाज की सामूहिक तरक़्क़ी से ऊपर रखने लगते हैं। उन्हें डर होता है कि अगर कोई नई सोच कामयाब हो गई, तो उनकी पुरानी चौधराहट और नेतृत्व को चुनौती मिल सकती है। कुछ लोग बदलाव को समझने से पहले उसका विरोध करने लगते हैं, तो कुछ बिना किसी पड़ताल के दूसरों के विरोध में खड़े हो जाते हैं।
नतीजा यह होता है कि जिस क़ौम को एकजुट होकर अपने असल मसलों से लड़ना चाहिए, वह आपसी खींचतान में अपनी ताक़त गंवा बैठती है।
और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि असल विरोध करने वाली ताक़तें अक्सर दूसरी सफ़ों में बिखरी होती हैं, लेकिन मुख़लिस रहनुमा को कमज़ोर करने के लिए पहली सफ़ में अपने ही लोग खड़े दिखाई देते हैं। इससे उन ताक़तों का काम और आसान हो जाता है जो क़ौम को कमज़ोर देखना चाहती हैं।
हालाँकि हर विरोध करने वाला दुश्मन नहीं होता और हर रहनुमा सही नहीं होता। आलोचना और सवाल किसी भी समाज की ज़रूरत हैं। लेकिन बिना तथ्य जाने किसी की नीयत पर हमला करना, हर नई पहल को कुचलना और व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए सामूहिक हितों की क़ुर्बानी देना किसी भी ज़िंदा समाज की निशानी नहीं हो सकती।
आज मुस्लिम समाज को यह तय करना होगा कि उसे व्यक्तियों की चौधराहट बचानी है या आने वाली नस्लों का मुस्तक़बिल बनाना है। उसे आपसी रंजिशों में उलझना है या तालीम, कारोबार, रोज़गार, सियासी हिस्सेदारी और क़ानूनी अधिकारों के लिए एकजुट होना है।
किसी रहनुमा से सवाल ज़रूर कीजिए, उसकी ग़लतियों पर एतराज़ भी कीजिए, मगर किसी मुख़लिस कोशिश को सिर्फ़ इसलिए मत कुचलिए कि वह आपके बनाए हुए दायरे से बाहर निकलकर कुछ नया करना चाहती है।
याद रखिए, क़ौमों की तबाही हमेशा बाहरी दुश्मनों की ताक़त से नहीं होती; कभी-कभी उनकी अपनी अंदरूनी फूट बाहरी ताक़तों से ज़्यादा नुक़सान पहुँचा देती है।
वक़्त की ज़रूरत है कि हम किसी रहनुमा की अंधी पैरवी न करें, मगर किसी मुख़लिस कोशिश की अंधी मुख़ालफ़त भी न करें। इंसान को नहीं, उसके काम को परखें; उसकी जाति या गुट को नहीं, उसकी नीयत और नतीजों को देखें।
क्योंकि जब क़ौम अपने सच्चे ख़ैरख़्वाहों को पहचानना छोड़ देती है, तो एक दिन उसे एहसास होता है कि उसने अपने दुश्मनों से लड़ने से पहले ही अपने मददगारों को अकेला कर दिया था।
क़ौम की असल ताक़त किसी एक रहनुमा में नहीं, बल्कि उस शऊर में है जो सही और ग़लत में फ़र्क़ करना सिखाए, मुख़लिस कोशिशों का साथ दे और निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर सामूहिक मुस्तक़बिल की फ़िक्र करे। क़ौम को मुख़लिस रहनुमा की तलाश से पहले, मुख़लिस रहनुमा को पहचानने का शऊर पैदा करना होगा। अथ्यक्ष एवं संस्थापक डॉ. शब्बीर खान पठान वक्फ सम्पति बचाओ बिंग इकाई धरतीपुत्र राजस्थान ने दी।