
गांधी जयंती 2 अक्टूबर पर विशेष
प्रख्यात गांधीवादी डा. शांति स्वरूप डाटा से तीन दशक पूर्व अलवर में हुयी बातचीत पर आधारित।
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11अगस्त सन 1911 को मोहनदास करमचंद गांधी ने जोहान्सबर्ग के एक सिनेमा हाल में भारतीयों की एक सभा बुलायी थी, जिसमें विशेषकर गुजरात के बोहरा, मेमन व खोजा सम्प्रदाय के लोग शामिल थे। इन लोगों की संख्या लगभग तीन हजार के करीब थी। यह सभा ब्रिटिश सरकार द्वारा जनरल स्मार्ट के माध्यम से जो भारतीय वहां रहते थे, उनको अपनी दसों उंगलियों की छाप देकर वहां रहना होगा, के आदेश के विरोध में थी। यह कहना अतिशयोक्ति होगी कि सत्याग्रह या सिविल रेजिस्टेंस का प्रादुर्भाव 11 अगस्त की उसी भारतीयों की बैठक में हुआ, क्योंकि गांधी जी के जीवन से पता चलता है कि गांधी जी ने जब अपने छोटे से कस्बे पोरबंदर में हरिश्चंद्र और श्रवण कुमार जैसे नाटक, जिनमें सत्य के प्रति आग्रह और अपने माता-पिता के प्रति देवतुल्य भावना रखने का अंकुर तो उनके हृदय में उसी समय उत्पन्न हो गया था। गांधी जी का सारा जीवन ही आत्म निरीक्षण से भरा हुआ है।

वे जब बैरिस्टरी करने के लिए लंदन रवाना हुए, तब उनका जहाज अलेक्जेंडरिया, जो मिश्र की राजधानी थी, में रुका और दूसरे यात्रियों की तरह उस बंदरगाह के साथ बसी हुयी वेश्याओं की बस्ती में जैसे और यात्री आनंद के लिए पहुंचे थे, वैसे ही गांधी जी भी वहां गये और जब वेश्याओं ने उनको एक ग्राहक समझकर आमंत्रित किया, तब उनको याद आया कि पोरबंदर से चलते समय अपनी माताश्री से वे किन वचनों से प्रतिबद्ध होकर बैरिस्टरी की पढ़ाई के लिए रवाना हुए थे। जैसे ही उनको वह बात याद आई, उन्होंने उस महिला को बहिन और मां के रूप में देखा और बहुत समय तक ध्यान की मुद्रा में बैठे रहे। उसके बाद वह सीढियों से नीचे उतरकर आ गये।
गांधी जी जो दक्षिण अफ्रीका मुस्लिम बोहरों की एक फर्म के मुकदमे में एक सलाहकार के रूप में गये थे और उसके बाद उन्होंने वहां के अंग्रेज शासक का वहां के काले वाशिंदों के साथ जिनको नीग्रो कहा जाता था और जिनके साथ श्वेत रंग के लोगों का व्यवहार बिल्कुल अमानवीय था देखा। वहां धोबी काले आदमी के कपड़े धोने को तैयार नहीं था,नाई हजामत को तैयार नहीं था और काला आदमी फर्स्ट क्लास की टिकट लेकर भी गोरे आदमी के साथ यात्रा नहीं कर सकता था। ये सब उन्होंने वहां अपनी आंखों से देखा। यही नहीं रेल यात्रा के दौरान उन्होंने गोरों के इस व्यवहार को खुद भोगा भी। उन्होंने टॉलस्टॉय, रूसो और रस्किन को पढ़ा था और रस्किन ने बाइबल के एक अध्याय को अपनी किताब में इंगित करते हुए जो लिखा, वह उनके मन में बैठ गया था। आज सारे विश्व में क्राइस्ट और मोहम्मद के बाद गांधी के विचार और उन्होंने अहिंसक तरीके से अन्याय और अत्याचार के खिलाफ प्रतिकार का जो रास्ता भारतीयों को दिखाया, वह दुनिया के इतिहास में एक अद्भुत और नई चीज बन गयी। गांधी जी जिस तरह टॉलस्टॉय और रस्किन से प्रभावित हुए थे, उसी प्रकार वे बचपन में ध्रुव, श्रवण कुमार और हरिश्चंद्र से प्रभावित हुए थे, इसीलिए उन्होंने अपनी आत्मकथा का नाम ‘सत्य के प्रयोग’ रखा।

1917 में चंपारण में गांधीजी
गांधी जी का सारा जीवन प्रयोगों में गुजरा। सबसे आखिर में जब वे नोआखाली में सद्भावना यात्रा कर रहे थे, तब एक रात में वे उठे और तब वे अपनी डायरी में लिखने बैठे। उन्होंने तब लिखा कि महर्षि पतंजलि ने अपने योगशास्त्र में लिखा है कि जो व्यक्ति मन, वचन और कर्म से अहिंसक और सत्य का पुजारी होता है, उसके पास तो सिंह जैसा हिंसक पशु भी बिना दूसरों को आतंकित किये शांति से बैठ जाता है। उस समय उनके मन में यह विचार भी आया कि तू बहुत लम्बे समय से ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर रहा है लेकिन उसके बावजूद लोगों के मन में तुम्हारे आचरण के बारे में संदेह है। उन्हें स्मरण आया कि कुछ वर्ष पूर्व देश के सर्वश्रेष्ठ नागरिकों में से एक महामना मदन मोहन मालवीय ने गांधी जी को एक पत्र लिखा था उसमें महामना ने लिखा था कि- सर्वपल्ली राधाकृष्णन जो उस समय बनारस यूनिवर्सिटी के उपकुलपति थे, उन्होंने दो विद्यार्थियों को किसी साथ पढ़ने वाली युवती से अत्यंत निकट का संपर्क करते देखा था। जब सर राधाकृष्णन ने उन विद्यार्थियों को अपने पास बुलाया तो उन्होंने अपने बचाव में एक बात कही कि जब गांधी जी दो लड़कियों के कंधों पर हाथ रखकर नित्य प्रति टहलने जा सकते हैं तो क्या हमें यह अधिकार नहीं कि हम उन लड़कियों के कंधे पर हाथ रखकर चल सकें। सर राधाकृष्णन ने यह बात मालवीय जी से कही थी, तब उन्होंने गांधी जी को पत्र लिखा था। गांधी जी ने मालवीय जी को लिखा था कि यह आदत मुझे दक्षिण अफ्रीका में ही लग गयी थी। मैं इसे छोड़ने का प्रयत्न करूंगा। थोड़े दिन तक तो गांधी जी इस आदत से छुटकारा पा सके लेकिन वे बाद में इसके आदी हो गये।

6 अप्रैल 1919, सविनय अवज्ञा आंदोलन में गांधीजी
गांधी जी ने अपने अंतिम दिनों में अपने साथ रहने वाली तीन विदुषी महिलाओं से यह चर्चा की कि मैं यह देखना चाहता हूं कि मैंने सचमुच हिंसा और ब्रह्मचर्य पर काबू पा लिया है। उन्हें अंत तक इस बात का गहरा अफसोस रहा कि मेरे पूर्ण अहिंसक होने के बावजूद नोआखाली के हर गांव में, जहां भी वे गये, वहां के मुसलमानों ने उनके खिलाफ नारे लगाये और अभद्र शब्दों के साथ लिखा कि इसे नोआखाली से भगाओ। गांधी जी अपने ब्रह्मचर्य और अहिंसा के प्रयोगों के बारे में आश्चर्यचकित थे। राजेन्द्र बाबू, जवाहर लाल और बल्लभभाई पटेल तीनों ही उनके पास प्रार्थना करने गये कि वे इस प्रकार कोई प्रयोग न करें। समाज इसे स्वीकार नहीं करेगा। इस विवाद को लेकर उनके सबसे निकट के व्यक्ति जो हरिजन का संपादन भी करते थे और गांधी जी के संपूर्ण जीवन से परिचित थे, किशोर लाल मशरूवाला और नरहरि पारीख, उन्होंने हरिजन के संपादन का कार्य छोड़ दिया। फ्रंटियर के खान अब्दुल गफ्फार खान अकेले एकमात्र व्यक्ति थे, जिन्हें पूरा विश्वास था कि गांधी इस सारे विश्व में एकमात्र व्यक्ति हैं जो गलत काम कर ही नहीं सकते। इसलिए जिस अग्नि परीक्षा से वह निकलना चाहते हैं, उसे उनको करने देना चाहिए।

रौलेट एक्ट के विरोध में गांधीजी
गांधी जी की शहादत क्राइस्ट और सुकरात के समकक्ष थी। विश्व के इतिहास में प्रभु ईसा मसीह का बलिदान हिमालय के शिखर जैसा है। दुनिया के इतिहास में एकमात्र ईसा थे जिन्होंने अपना क्रूस जिसपर उन्हें गाड़ा जाना था, उसे वे स्वयं अपने कंधे पर लेकर चले जबकि यहूदी बच्चे रास्ते भर उनको अपमानित करते रहे और उनको जगह-जगह कीकर के बड़े कांटों की मालायें पहनाते रहे। सुकरात ने सारी रात शिष्यों से वाद-विवाद किया और अंत में कहा कि जो सत्य है, उसको कहने से मैं नहीं रुकूंगा और सुबह वह जहर का प्याला पीकर अमर हो गये। गांधी जी भी अपने सब प्रयोगों के बाद जब दिल्ली आये, उस समय दिल्ली में जिस तरह की हिंसा और नफरत समाज के दो अंगों, हिन्दू और मुसलमानों में थी, उसको उन्होंने देखा और अंत में आर एस एस और सावरकर के विचारों से प्रभावित एक नौजवान ने उन्हें अपनी गोली का निशाना बना दिया। आइंस्टीन की श्रद्धांजलि आज भी सारी दुनिया में गूंज रही है कि आने वाली पीढ़ियां इस बात पर विश्वास नहीं करेंगी कि कभी हाड़मांस का एक व्यक्ति इस धरती पर चलता था। आज हम उनके आदर्शों को कुछ सीमा तक समझ सकें, यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। (लेखक के अपने विचार है।)