आज भी आचमन योग्य नहीं है गंगाजल – ज्ञानेन्द्र रावत

लेखक : ज्ञानेन्द्र रावत
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद हैं।
www.daylifenews.in
राष्ट्रीय नदी गंगा जिसे हम पुण्य सलिला, जीवनदायिनी और मोक्षदायिनी आदि-आदि नामों से जानते हैं और जिसकी देश में मां के समान पूजा की जाती है, वह चार दशक बाद भी आज मैली है और आज भी अपने ताड़नहहार की प्रतीक्षा में है कि कोई भगीरथ आयेगा और उसे प्रदूषण रूपी दानव से मुक्ति दिलायेगा। विडम्बना यह है कि राजीव गांधी के 1984 में सत्तासीन होने के बाद 1986 में गंगा एक्शन प्लान लागू होने के बाद बीते इन चार दशकों में गंगा शुद्धि के नाम पर हजारों-हजार करोड़ की राशि खर्च करने के बावजूद देश की आस्था की पहचान गंगा देशवासियों के स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित नहीं रह गयी है। वह सेहत के लिए खतरनाक साबित हो रही है। हकीकत में उसका जल आचमन लायक भी नहीं रह गया है। वह पुण्य नहीं मौत का सबब बन गया है। यहां यह गौरतलब है कि गंगा के उद्गम गोमुख से लेकर गंगासागर में मिलने तक गंगा कुल 2525 किलोमीटर का रास्ता तय करती है। गंगा की 2525 किलोमीटर की यात्रा में पड़ने वाले राज्यों की पड़ताल से पहले यदि गंगा के मायके उत्तराखंड में ही गंगा की शुद्धि का जायजा लें तो हकीकत खुद-ब-खुद सामने आ जाती है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक ( कैग ) की उत्तराखंड में नमामि गंगे कार्यक्रम पर केंद्रित वर्ष 2018 से 2023 की लेखा परीक्षा रिपोर्ट तो गंगा की बदहाली की ओर ही इशारा कर रही है। कैग की यह रिपोर्ट जो इस दौरान गंगा में प्रदूषण रोकने, नियंत्रित करने या उसे कम करने की कार्यक्रम की प्रभावशीलता के आंकलन से सम्बंधित थी, पिछले दिनों राज्य विधान सभा के बजट सत्र में सदन के पटल पर रखी गयी थी। रिपोर्ट के अनुसार गोमुख से लेकर देवप्रयाग तक गंगा का पानी आचमन योग्य यानी ए श्रेणी में है जबकि इससे आगे ऋषिकेश और हरिद्वार तक नहाने योग्य यानी बी श्रेणी का है। कैग ने लेखा परीक्षा के कार्यक्रम में कई खामियों की ओर इशारा किया है। इसमें कहा गया है कि राज्य सरकार ने गंगातट पर बसे शहरों में पूरक सीवेज सुविधाओं में वृध्दि हेतु धन ही आवंटित नहीं किया गया। उसकी रिपोर्ट के मुताबिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के डिज़ाइन में खामियां, इंफ्रास्ट्रक्चर का खराब रखरखाव, गंगा में गिरने वाले नालों को रोकने में नाकामी और नदियों व छोटी धाराओं के पास कचरा फेंके जाने पर अंकुश लगा पाने आदि में नाकामियों शामिल हैं।
सीएजी की रिपोर्ट को देखें तो 2014 में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद गंगा शुद्धिकरण के बाबत बनी महत्वाकांक्षी योजना ‘नमामि गंगे’ के लागू होने के बाद के हालात गंगा शुद्धिकरण की दिशा में’ नाकामियों का पिटारा ‘ ही कहे जायेंगे। वह चाहे गंगा के लिए वानिकी हस्तक्षेप का मामला हो, जिसमें 885.91 करोड़ के बजट में 54,855.43 हैक्टेयर में पेड़ों को लगाने के निर्धारित लक्ष्य के विपरीत आवंटित फण्ड का केवल 16 फीसदी यानी कुल 144.27 करोड़ ही खर्च किया जाना, 44 एसटीपी में से केवल 3 से 5 का एनजीटी के और 6 से 12 एसटीपी पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के मानकों और शर्तों के मुताबिक पाया जाना, गंगा बेसिन के किसी भी जिले में जिला गंगा योजनाओं का गठन न किया जाना, टिकाऊ इंफ्रास्ट्रक्चर की योजना में स्थानीय लोगों को शामिल नहीं किये जाने और न गंगा किनारे बसे कस्बों में साफ-सफाई हेतु फंड का आवंटन न किए जाने का दुष्परिणाम सीवेज इंफ्रास्ट्रक्चर का लेशमात्र भी इस्तेमाल नहीं हो पाया। वहां न एसटीपी बने और न घरों को सीवर कनेक्शन ही दिये गए। चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी और उत्तरकाशी में वहां की सांस्कृतिक रीति-रिवाज और स्थानीय जरूरतों को समझे बिना 11 श्मशान घाटों का निर्माण जो न तो इस्तेमाल हो रहे हैं और न ही उनका रखरखाव ही हो रहा है। हालात गवाह हैं कि वहां गंगा किनारे ही चिताएं जलती रहती हैं। राज्य के अधिकारी राज्य नदी संरक्षण प्राधिकरण द्वारा 2020 तक बिना ट्रीट किया शहरी गंदा पानी और औद्योगिक कचरा गंगा में गिरने से रोकने हेतु 13 साल बाद भी कोई योजना बनाने में नाकाम रहे हैं। गंगा किनारे बसे सात शहर नंदप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, कीर्तिनगर, चमोली, श्रीनगर, श्रीकोट और जोशीमठ में बने 21 एसटीपी में से एक भी घर का किसी एसटीपी से न जुड़ना, सीवर लाइन की कमी और ट्रीटमेंट की अपर्याप्त क्षमता के कारण घरों में सीवेज कनेक्टिविटी का कुछ ही घरों तक ही सीमित रहना जबकि हरिद्वार और ऋषिकेश में क्षमता से ज्यादा सीवेज मिलने से एसटीपी का ओवरलोडिंग की समस्या से जूझना और जोशीमठ और देवप्रयाग में सीवेज का बहाव कम होना साबित करता है कि एसटीपी अपने मकसद में नाकाम रहे। यह भी कि जर्मन डेवलपमेंट बैंक जैसी संस्थाओं द्वारा फंडेड केवल हरिद्वार और ऋषिकेश तक ही सीमित रहा। हालत यह है कि ढालवाला ( ऋषिकेश ), कीर्तिनगर, रुद्रप्रयाग, श्रीकोट, गोपेश्वर, कर्णप्रयाग में बने 12 एसटीपी बिना ट्रीट किए सीवेज सीधे गंगा में बहा रहे हैं। 44 में से 8 एसटीपी चार साल से ज्यादा समय से बिना पीसीबी की मंजूरी के चालू हैं। यह जहां नियम-कानूनों का खुला उल्लंघन है, वहीं पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं। 18 एसटीपी तो निर्माण के बाद से आजतक उत्तराखंड पेयजल निगम द्वारा उत्तराखंड जल संस्थान को सौंपे ही नहीं गये हैं। अनिवार्य सुरक्षा आडिट न होने के चलते रुद्रप्रयाग में स्थित 75 किलोलीटर क्षमता वाला एक एसटीपी 2021 में भूस्खलन की चपेट में आ गया और चमोली स्थित एसटीपी में 2023 की आपदा के चलते बिजली का करंट लगने से 16 लोगों की मौत हुईं। उपरोक्त उदाहरण गंगा शुद्धिकरण की दिशा में वह चाहे राज्य सरकार के अधिकारियों, प्रशासन और नमामि गंगे योजना की नाकामी को ही दर्शाता है जिसके कारण एसटीपी अपने मकसद में नाकाम रहे या यूं कहें कि सीवेज से जुड़ी समस्याओं के निस्तारण का प्रबंधन ठीक से न हो सका।

गंगा की यह हालत तो गंगा के मायके उत्तराखंड की है जहां गंगा का उदगम स्थल है। इससे यह साबित हो जाता है कि गंगा की यह बदहाली उसके मायके उत्तराखंड में है तो उसके बहाव क्षेत्र उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में तो क्या होगी,उसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। वह बात दीगर है कि गंगा शुद्धिकरण के और नमामि गंगे योजना की कामयाबी के दावे कितने भी किये जायें। जबकि गंगा आज भी मैली है। इसका अहम कारण गंगा के बहाव क्षेत्र के अधिकांश जगहों पर कोलिफार्म बैक्टीरिया की मात्रा मानक से 45 गुणा से भी ज्यादा पायी गयी है। गंगा के प्रदूषित जल में जानलेवा बीमारियां पैदा करने वाले ऐसे जीवाणु मिले हैं जिनपर अब एंटीबायोटिक दवाओं का भी असर नहीं होता। हालिया अध्ययन इसके जीते जागते सबूत हैं। शोध- अध्ययनों में खुलासा हुआ है कि गंगा बेसिन में माइक्रोप्लास्टिक के उच्च प्रसार के चलते न केवल पारिस्थितिकीय तंत्र बल्कि पानी के स्रोत भी इसकी चपेट में हैं। दरअसल माइक्रोप्लास्टिक बायोडिग्रेबल नहीं होता। वह पर्यावरण में जमा होता रहता है। इससे समुद्री तंत्र, जीव-जंतु, कई सरी सृप, मीन और पक्षी प्रजातियों के लिए भीषण खतरा है। इनकी गंगा में मौजूदगी मानव स्वास्थ्य ही नहीं, प्राणी मात्र के लिए भी भीषण खतरा है। इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। यह कम चिंतनीय नहीं है और देश की करोडो़ं-करोड़ धर्मभीरू जनता के लिए खतरे की घंटी भी है।

यदि 1986 से गंगा की सफाई पर सरकार द्वारा किये गये खर्च को छोड़ भी दिया जाये तो देश में 2014 में मोदी जी के सत्तारूढ़ होने के बाद से केन्द्र ने 32,914,40 करोड़ रुपये के बजट के साथ 409 परियोजनाएं शुरू की हैं, सरकार ने नेशनल मिशन फार क्लीन रिवर गंगा को 2014-15 से 31 जनवरी 2023 तक 14084.72 करोड की राशि रिलीज की है, 31 दिसम्बर 2022 तक 32,912,40 करोड़ की लागत से 409 प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया जा चुका है। इनमें 232 प्रोजेक्ट पूरे हो चुके हैं और 2026 तक के लिए केन्द्र सरकार ने 22,500 करोड़ की राशि की स्वीकृति भी दे दी है। यह जानकारी केन्द्रीय जल संसाधन राज्यमंत्री संसद में दे चुके हैं। उसके बावजूद गंगा नदी की सफाई का मुद्दा इतने सालों बाद आज भी अनसुलझा क्यों है और गंगा अपने ताड़नहार की बाट जोह रही है। यह बेहद दुखद है। सबसे दुखदायी बात तो यह है कि गंगा के पूरे बहाव क्षेत्र के 71 फीसदी इलाके में कोलिफार्म की मात्रा खतरनाक स्तर पर पायी गयी है। यह हालात की भयावहता का सबूत है। इसकी पुष्टि तो केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी कर चुका है। जहां तक नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का सवाल है, उसके मुताबिक भी गंगा के 60 फीसदी हिस्से में बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे गंदगी बहायी जा रही है। इसका परिणाम यह है कि गंगा का जल पीना तो दूर, वह अब आचमन लायक भी नहीं रह गया है। इसका अहम कारण सालिड और लिक्विड वेस्ट है जो सीधे सीथे गंगा में गिराया जा रहा है।
यूनीवर्सिटी आफ शिकागो के एनर्जी पालिसी इंस्टीट्यूट के शोध में खुलासा हुआ है कि गंगा के किनारे लगते मैदानी इलाकों में प्रदूषण का स्तर बढ़ते जाने से लोगों की उम्र सात साल कम हो गयी है। और तो और अब तो यह भी साबित हो चुका है कि गंगा के पानी में घुले एंटीबायोटिक जानलेवा साबित हो रहे हैं। यूनीवर्सिटी आफ यार्क के वैज्ञानिकों के शोध के निष्कर्षों के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र ने एंटीबायोटिक की प्रतिरोधक क्षमता समाप्त होने को वर्तमान में स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याओं में सबसे बडी़ समस्या माना है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वैक्टीरिया या वायरस पर एंटीबायोटिक्स के बेअसर होने के कारण दुनिया में हर साल सात लाख मौतें होती हैं। 2030 तक यह आंकडा़ बढ़कर 10 लाख को पार कर जायेगा।असलियत में गंगा के पानी के साथ सबसे बडी़ समस्या यह है कि धार्मिक भावना के वशीभूत होकर इसमें बहुत बडी़ तादाद में लोग नहाते हैं। यही नहीं उसके जल का आचमन भी करते हैं। इससे गंगाजल के सीधे मुंह में जाने से एंटीबायोटिक प्रतिरोधी वैक्टीरिया सीधे शरीर में प्रवेश कर जाता है और शरीर पर अपना असर दिखाने लगता है।

यहां यह भी जान लेना जरूरी है कि गोमुख से लेकर गंगासागर में मिलने तक गंगा कुल 2525 किलोमीटर का रास्ता तय करती है। गंगा के इस सफर में कुल 445 किलोमीटर हिस्सा बिहार में पड़ता है। यहां 730 मिलियन लीटर सीवर का पानी बिना शोधन के सीधे गंगा में गिराया जा रहा है। यहां गंगा में हानिकारक कीटाणुओं की तादाद इतनी खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी है जिससे चर्म रोग होने के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। यहां टोटल कोलिफार्म और फीकल कोलिफार्म का स्तर औसत से
कई गुणा ज्यादा है। एनजीटी द्वारा गठित समिति भी गंगा में प्रदूषण की मौजूदा तथ्यात्मक स्थिति का अध्ययन कर रही है। गंगा शुद्धि के अभियान में केन्द्र सरकार के सात मंत्रालयों की साख दांव पर है। फिर सवाल उठता है कि इसके बावजूद गंगा मैली क्यों है? हकीकत में गंगा तब तक साफ नहीं होगी जब तक स्थानीय निकाय ईमानदारी से अपनी भूमिका का निर्वहन न करने लग जायें और इस अभियान में जन भागीदारी की अहमियत समझते हुए उनका सहयोग लिया जाये। फिर सबसे अहम योगदान देश की धर्म प्राण जनता की जागरूकता का है। जब तक वह अपनी मां का महत्व नहीं समझेगी और गंगा को खुद ब खुद साफ रखने का संकल्प नहीं लेगी, तब तक गंगा की सफाई की ये सारी कबायदें बेमानी रहेंगी और गंगा साफ हो पायेगी, यह सपना सपना ही बना रहेगा। (लेखक के अपने विचार हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *