प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण आज की सबसे बड़ी जरूरत है – ज्ञानेन्द्र रावत

संगोष्ठी संयोजक प्रोफेसर मोनिका अहलावत स्वागत भाषण देते हुए।

दिल्ली विश्वविद्यालय के डा. भीमराव अम्बेडकर कालेज में अंतरराष्ट्रीय वन एवं विश्व जल दिवस पर आयोजित संगोष्ठी
जंगल सिर्फ पेड़ नहीं, एक जीवित तंत्र हैं
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गत दिवस दिल्ली विश्वविद्यालय के डा. भीमराव अम्बेडकर कालेज के पर्यावरण अध्ययन विभाग ने अंतरराष्ट्रीय वन दिवस एवं विश्व जल दिवस के उपलक्ष्य में कालेज के सेमिनार हाल में एक संगोष्ठी का आयोजन किया। संगोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार एवं ख्यात पर्यावरणविद श्री ज्ञानेंद्र रावत ने मुख्य वक्ता के रूप में सहभागिता की। संगोष्ठी की शुरुआत विद्या की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती की वंदना से हुयी। इस अवसर पर संगोष्ठी की शुरुआत में संयोजक एवं पर्यावरणीय अध्ययन विभाग की प्रोफेसर मोनिका अहलावत ने सभी आगंतुक अतिथियों का स्वागत करते हुए प्रति वर्ष किये जाने वाले इस आयोजन की रूपरेखा पर प्रकाश डाला और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कालेज द्वारा किये जा रहे प्रयासों की सिलसिलेवार विस्तृत जानकारी दी। इस अवसर पर कालेज के प्राचार्य प्रो० सदानंद प्रसाद, संगोष्ठी के सह संयोजक, कालेज के पर्यावरण अध्ययन विभाग के प्रोफेसर एवं इनवायरमेंट सोशल डवलपमेंट एसोसिएशन के प्रमुख डा० जितेन्द्र नागर, प्रोफेसर.कादियान, डा० सविता, डा० भावना, डा० आशीष डोगरा, डा० सना धमीजा आदि अनेकों शिक्षाविदों व पर्यावरण अध्ययन विभाग में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय थी। संगोष्ठी में पर्यावरण से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर पर्यावरण विज्ञान के विशेषज्ञों ने अपने सारगर्भित विचार व्यक्त किये।

पर्यावरणविद ज्ञानेन्द्र रावत संबोधित करते हुए।
इस अवसर पर अपने मुख्य संबोधन में श्री ज्ञानेन्द्र रावत ने वन एवं जल की मौजूदा वैश्विक स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि आज हालत यह है कि समय-समय पर वन क्षेत्र में बढ़ोतरी के दावे दर दावे किये जा रहे हैं, यह सही भी है और वन क्षेत्र में बढ़ोतरी होनी भी चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं है। देखा जाये और सरकारी आंकड़ों की मानें तो देश में कुल वनावरण और वृक्ष आवरण 8,27,357 वर्ग किलोमीटर है जो भौगौलिक क्षेत्र का 25.1 फीसदी है। 2021 की तुलना में इसमें कुल 1.545 वर्ग किलोमीटर की बढ़ोतरी हुई है जो यह बताता है कि देश में कुल वनावरण 21.71 और वृक्ष आवरण 3.41 फीसदी है। सरकार वृक्षारोपण के माध्यम से वनावरण की कमी को पाटने का अभियान चला रही है। ऐसे समय यहां वृक्षारोपण और प्राकृतिक वन के बीच पारिस्थितिक अंतर को समझना आज पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। आधिकारिक रिपोर्टें भले कुल वन आच्छादन में स्थिरता या मामूली वृद्धि का संकेत दें, किंतु विशेषज्ञ लगातार यह रेखांकित कर रहे हैं कि वृक्षारोपण से तैयार हरियाली और प्राकृतिक, बहुस्तरीय, जैविक रूप से समृद्ध वन एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं। प्राकृतिक वन सैकड़ों वर्षों में विकसित होते हैं, जिनमें पेड़-पौधों, सूक्ष्मजीवों, कीटों, पक्षियों और स्तनधारियों का जटिल पारिस्थितिक जाल मौजूद रहता है। इसके विपरीत, एकल प्रजाति आधारित वृक्षारोपण या वाणिज्यिक प्लांटेशन अक्सर जैव विविधता की दृष्टि से सीमित होते हैं। इसी बुनियादी अंतर को नजरअंदाज करने का परिणाम है कि देश जैव विविधता के गहराते संकट से जूझ रहा है और दिनोंदिन इसके स्तर में क्षरण हो रहा है।

पर्यावरणविद ज्ञानेन्द्र रावत अपने संबोधन के अंत में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का आह्वान करते हुए।
सच तो यह है कि विकास की दौड़ में हांफती प्रकृति, तेजी से बढ़ता प्रदूषण, भयावह स्तर तक फैलता शहरीकरण और अनियोजित विकास ने प्राकृतिक वनों पर व्यापक दबाव डाला है। पश्चिमी घाट क्षेत्र—जिसमें गोवा, केरल और कर्नाटक के हिस्से शामिल हैं—लंबे समय से जैव विविधता के वैश्विक हॉटस्पॉट माने जाते हैं। विभिन्न अध्ययनों में संकेत मिला है कि इस क्षेत्र के मूल वनों और विशिष्ट पारिस्थितिक तंत्रों का बड़ा हिस्सा खनन, कृषि विस्तार, बांधों और शहरीकरण से प्रभावित हुआ है। परिणामस्वरूप अनेक स्थानिक प्रजातियाँ संकटग्रस्त हुई हैं। उत्तर-पूर्वी भारत में भी वनों की कटाई, अवैध शिकार और भूमि उपयोग परिवर्तन ने पारिस्थितिक संतुलन को कमजोर किया है। यहां
हिमालय, पश्चिमी घाट, इंडो-बर्मा और सुंडालैंड क्षेत्र चार प्रमुख जैव विविधता हॉटस्पॉट माने जाते हैं। भारत विश्व के 17 मेगा जैव विविधता संपन्न देशों में शामिल है।

छात्र-छात्राओं के सवालों का जबाव देते हुए।
विश्व के कुल भूभाग का लगभग 2.4 प्रतिशत हिस्सा होने के बावजूद यहाँ वैश्विक प्रजातियां लगभग 7 से 8 प्रतिशत पायी जाती हैं। जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया के अभिलेखों के अनुसार देश में 96,000 से अधिक जीव-जंतुओं और लगभग 47,000 पौधों की प्रजातियाँ दर्ज हैं। देश के 10 प्रमुख जैव-भौगोलिक क्षेत्रों—वर्षावन, रेगिस्तान, मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियाँ, घासभूमियाँ और पर्वतीय पारिस्थितिक तंत्र—में विशिष्ट जैविक संपदा मौजूद है। इसके बावजूद आज प्रकृति की चेतावनी को समझने की जरूरत है। दरअसल पेड़ और जंगल केवल हरियाली का प्रतीक नहीं, बल्कि पृथ्वी की जीवन रक्षक प्रणाली का आधार हैं। स्थलीय जैव विविधता का बड़ा हिस्सा वनों पर निर्भर है। प्राकृतिक वन कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर जलवायु को संतुलित रखते हैं, मृदा अपरदन रोकते हैं, जलस्रोतों को संरक्षित करते हैं और असंख्य प्रजातियों को भोजन व आश्रय देते हैं। किंतु जब प्राकृतिक वन कटते हैं और उनकी जगह एकल प्रजाति के वृक्षों का रोपण किया जाता है, तो पारिस्थितिकीय जटिलता और जैविक विविधता का वह स्तर पुनर्स्थापित नहीं हो पाता। यही कारण है कि “नेट फॉरेस्ट कवर” में वृद्धि के बावजूद जैव विविधता में गिरावट की चिंता व्यक्त की जा रही है जो खतरनाक संकेत है। दुनिया के वैज्ञानिक बार-बार कह रहे हैं कि इंसान जैव विविधता के खात्मे पर आमादा है। अब तो वह समृद्ध जैव विविधता वाली भूमि को भी कब्जाने में लगा है। 87 फीसदी विविधता से समृद्ध भूमि पर कब्जे की होड इसका जीता-जागता सबूत है।

कालेज के प्राध्यापकों से चर्चा करते हुए।
देश में आजकल विकास परियोजनाओं के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है। देवभूमि के नाम से विख्यात उत्तराखंड में राज्य निर्माण के बाद सड़क, रेल और सुरंग परियोजनाओं को लेकर व्यापक सार्वजनिक बहस छिडी हुई है। यहां विकास के नाम पर देवदार, बांज, बुरांश, खरसू, मौरूं, फर, कैल, मुरेंडा प्रजाति के छोटे बड़े 10 लाख हरे पेड़ों को काट डाला गया है। बीते 8-9 सालों के दौरान ही ढाई लाख से ज्यादा पेड काट दिये गये हैं जिनमें से एक लाख से ज्यादा पेड आल वैदर रोड के नाम पर, शेष पर्यटन, देहरादून से लेकर दिल्ली तक सड़क चौडी़करण, ऋषिकेश – कर्णप्रयाग रेल परियोजना, सुरंग आधारित परियोजनाओं के नामपर बांज, राई, कैल और चीड जैसी प्रजातियों का तो अस्तित्व ही मिटा दिया गया है। हर साल सरकार वाणिज्यिक प्रयोग के नामपर 3 से 4 लाख पेड़ों को कटवाती है। इनमें सबसे ज्यादा राई, कैल, देवदार और चीड के पेड शामिल हैं। इससे भूस्खलन और बाढ का खतरा मंडरा रहा है। आने वाले बरसों में विकास योजनाओं के नामपर 5 हजार फीट की ऊंचाई से लेकर लगभग साढे आठ हजार ऊंचाई तक के जंगलों के 3 लाख शंकुधारी प्रजाति के पेड़ों को काटे जाने की योजना है। मध्य प्रदेश में नई रेल लाइन के लिए 1.24 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई प्रस्तावित है। सिंगरौली में कोयले की भूख के चलते घिराली कोल ब्लॉक के जंगलों में हजारों हरे-भरे पेड़ों का सफाया कर दिया गया है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में खनन और सड़क परिवहन योजनाओं से जंगल सिमटते जा रहे हैं और स्थानीय आजीविका का संकट पैदा हो गया है। यहां वन्यजीव भटक रहे हैं और जलस्रोत सूख गये हैं। गुस्साये ग्रामीण परियोजना बंद करने की मांग कर रहे हैं। कर्नाटक में हाल के वर्षों में 3 लाख से ज्यादा हरे-भरे वृक्षों को विभिन्न योजनाओं के नामपर काट दिया गया है। तेलंगाना में हाईवे चौडी़करण आदि विभिन्न परियोजनाओं के लिए हजारों हरे-भरे पेड़ों की कटाई को स्वीकृति दी गयी है। इससे गर्मी बढ़ेगी, बारिश कम होगी और हवा जहरीली होगी। अंडमान-निकोबार में ग्रेट निकोबार विकास परियोजना के नामपर 130 किलोमीटर के दायरे में एक से दस मिलियन तक पेडों के काटे जाने की योजना है। झारखंड की कारो ओपन कास्ट परियोजना के लिए भी लगभग 35 हजार पेड़ों की कटाई को मंजूरी मिली है, जिससे वन्यजीव आवास, पर्यावरण संतुलन और स्थानीय जीवन पर गहरा संकट खड़ा हो गया है।

कालेज के प्राचार्य प्रोफेसर सदानंद प्रसाद ज्ञानेन्द्र रावत को पटका पहनाते हुए।
श्री रावत ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार 1990 से 2020 के बीच भारत में करोड़ों हेक्टेयर वन क्षेत्र का शुद्ध ह्रास हुआ है। 2015 से 2020 के बीच के पांच सालों में 6,68,400 हेक्टेयर वनों का खात्मा हुआ है। यह आंकड़ा दुनिया में ब्राजील के बाद दूसरा सबसे ज्यादा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 1990 से 2020 के बीच 42 करोड हैक्टेयर जंगलों का सफाया हुआ। भले इसके प्राकृतिक कारण रहे हों या मानवीय। देश में खनन, सड़क, उद्योग के नामपर साल 2014 से 2019 तक एक करोड नौ लाख पचहत्तर हजार आठ सौ चवालीस पेड काटे गये। आंकड़ों की मानें तो इस दौरान 20 गुणा से अधिक जंगल विकास यज्ञ की समिधा बने हैं। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल इस मामले में सर्वाधिक प्रभावित राज्य हैं। हकीकत यह है कि हर साल तकरीबन 22 लाख से ज्यादा पेड़ों की बलि विकास यज्ञ में दी जा रही है।
अब तो राजस्थान में विकास के नाम पर कहें या सोलर ऊर्जा के नाम पर पिछले कई वर्षों से खेजड़ी के हजारों – लाखों पेड़ों की हर साल बलि दी जा रही है और यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है। वहां बीकानेर में नोखा – दइया में खेजड़ी के पेड़ों की कटाई के विरोध में साल 2024 की 18 जुलाई से विरोध स्वरूप धरना जारी है। बीकानेर कलक्ट्रेट पर भी 18 जुलाई 2025 से धरना दे रहे किसान खेजड़ी की कटाई बंद किये जाने और इसका कानून बनाये जाने की मांग पर अड़े हैं। राज्य के लाखों किसान फरवरी माह की 2 तारीख को बीकानेर में महापड़ाव और हजारों महिलाएं खेजड़ी के पेड़ों के साथ कलश प्रदर्शन कर चुकी हैं। गौरतलब है खेजड़ी के पेड़ों को विश्नोई समुदाय पूजता है। खेजड़ी उनकी आन-बान-शान और अस्तित्व का प्रतीक है। मैंने खुद उनके बीच जाकर उनके दुख-दर्द को समझा है। गौरतलब है खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा की खातिर माता अमृता देवी ने शताब्दियों पहले 363 लोगों के साथ बलिदान किया था। वहां किसान खेजड़ी को बचाने हेतु अपना बलिदान देने को उतारू हैं।

संगोष्ठी के सह संयोजक डा. जितेन्द्र नागर एवं प्राचार्य प्रोफेसर सदानंद प्रसाद ज्ञानेन्द्र रावत को स्मृति चिन्ह एवं तथागत बुद्ध की प्रतिमा भेंटकर करते हुए, साथ में हैं संगोष्ठी संयोजक प्रोफेसर मोनिका अहलावत।
इसके अलावा सच्चाई यह है कि चारागाहों पर बढ़ते मानवीय दखल, दुरुपयोग, शहरों के विस्तार, जनसंख्या वृद्धि, बढ़ती खाद्य और ईंधन की मांग और जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और भयावह बना दिया है। चारागाहों की 12.1 करोड हैक्टेयर जमीन बेकार होने से पालतू और वन्यजीव के सामने अपना पेट भरने की समस्या पैदा हो गयी है। भारत में आधिकारिक आंकड़े कुल वन आच्छादन में स्थिरता दर्शाते हैं, किंतु विशेषज्ञों का मत है कि प्राकृतिक वनों की गुणवत्ता और जैव विविधता का स्तर कम होने की प्रवृत्ति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वृक्षारोपण और प्राकृतिक वन के बीच यही पारिस्थितिक अंतर नीति-निर्माण के केंद्र में होना चाहिए लेकिन इसका अभाव समस्या का अहम कारण है। बीते पांच-छह सालों में देश में पीपल, नीम, महुआ, जामुन, शीशम सहित लगभग 53 लाख छायादार पेडो़ं का खात्मा हुआ है। इसके पीछे धान की पैदावार बढ़ाने की किसानों की लालसा है जो इन्हैं बाधा मानकर साफ कर रहे हैं। यह खतरनाक संकेत है।
श्री रावत ने कहा कि यह जान लेना चाहिए कि जैव विविधता विनिमय योग्य नहीं है जबकि कार्बन विनिमय योग्य है। यदि किसी स्थान से हम जैव विविधता का एक अंश खो देते हैं या उसका वहां से ह्रास हो जाता है तो आप उसका एक अंश कहीं और नहीं जोड़ सकते। यह ऐसी मुद्रा नहीं है कि जिसका विनिमय किया जा सके। फिर जल, जंगल और जमीन का प्रश्न केवल हरित आच्छादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। वास्तविक चुनौती प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों की संरचना, उनकी जैविक विविधता और उनकी पुनरुत्पादक क्षमता को सुरक्षित रखने की है। वृक्षारोपण महत्वपूर्ण है, परंतु वह प्राकृतिक वनों का विकल्प नहीं हो सकता। जब तक नीति और विकास की प्राथमिकताओं में इस पारिस्थितिक अंतर को समझकर शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक इस संकट के समाधान की आशा बेमानी है।

कालेज के प्राचार्य एवं प्राध्यापकों के साथ ।
आज दुनिया में जलवायु परिवर्तन से मुकाबले की दिशा में पेड़ और जंगलों की महत्ता की चर्चा जोरों पर है। इसका अहम कारण जलवायु परिवर्तन के कारण समूची दुनिया में संतुलित और समग्र विकास के लक्ष्य का लगातार भीषण चुनौती बनकर सामने आना है। दुनिया में जिस तेजी से पेड़ों और जंगलों की तादाद कम होती जा रही है, उससे पर्यावरण तो प्रभावित हो ही रहा है, पारिस्थितिकी, जैव विविधता, कृषि और मानवीय जीवन ही नहीं, बल्कि भूमि की दीर्घकालिक स्थिरता पर भी भीषण खतरा पैदा हो गया है। जहां तक जंगलों के खत्म होने की गति का सवाल है,उसे देखते हुए ऐसा लगता है कि वह दिन दूर नहीं जब दुनिया से जंगलों का नामोनिशान तक मिट जायेगा और वह किताबों की वस्तु बनकर रह जायेंगे। हकीकत में हर साल दुनिया में एक करोड़ हेक्टेयर जंगल लुप्त होते जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र भी इसकी पुष्टि करता है। कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने इसका खुलासा किया है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार दुनिया में कीडे़-मकोडे़ भी 3.5 करोड़ हैक्टेयर जंगल हर साल बर्बाद कर रहे हैं। इससे ऐसा लगता है कि इंसान तो क्या दूसरे जीव भी जीवन के लिए जरूरी पेडो़ं-जंगलों के दुश्मन बनते जा रहे हैं। दुनिया के वैज्ञानिक बार-बार कह रहे हैं कि इंसान जैव विविधता के खात्मे पर आमादा है। जबकि जैव विविधता का संरक्षण ही हमें बीमारियों से बचाता है। यहां इस कटु सत्य को नकारा नहीं जा सकता कि यदि वनों की कटाई पर अंकुश नहीं लगा तो प्रकृति की लय बिगड़ जायेगी और उस स्थिति में वैश्विक स्तर पर तापमान में दो डिग्री की बढो़तरी को रोक पाना बहुत मुश्किल हो जायेगा। ऐसी स्थिति में सूखा और स्वास्थ्य सम्बंधी जोखिम से आर्थिक हालात और भी प्रभावित होंगे जिसकी भरपायी आसान नहीं होगी। सबसे बड़ी बात यह कि पेड़ों- जंगलों का होना हमारे जीवन के लिए महत्वपूर्ण ही नहीं, बेहद जरूरी है। यह न केवल हमें गर्मी से राहत प्रदान करते हैं बल्कि जैव विविधता को बनाये रखने, कृषि की स्थिरता सुदृढ़ करने, सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करने और जलवायु को स्थिरता प्रदान करने में भी अहम योगदान देते हैं। विडम्बना यह है कि यह सब जानते समझते हुए भी हम इनके दुश्मन क्यों बने हुए हैं, यह समझ से परे है।
उन्होंने कहा कि दरअसल आज देश-दुनिया की स्थिति के बारे में बीते कई बरसों से दुनिया के वैज्ञानिक, पर्यावरणविद और वनस्पति व जीव विज्ञानी चेता रहे हैं कि अब हमारे पास पुरानी परिस्थिति को वापस लाने के लिए समय बहुत ही कम बचा है। यह भी कि हम जहां पहुंच चुके हैं वहां से वापस आना आसान काम नहीं , वह बहुत ही टेडा़ काम है। कारण वहां से हमारी वापसी की उम्मीद केवल और केवल पांच फीसदी से भी कम ही बची है। असल में बीते दो दशकों में समूची दुनिया में 78 मिलियन हैक्टेयर यानी 193 मिलियन एकड़ पहाडी़ जंगल नष्ट हो गये हैं। जबकि पहाड़ दुनिया के 85 फीसदी से ज्यादा पक्षियों, स्तनधारियों और उभयचरों के आश्रय स्थल या यूं कहें कि घर हैं। इस बारे में एशिया,उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, अफ्रीका और यूरोप का जायजा लें तो पाते हैं कि पहाडी़ जंगलों के खात्मे की दर में एशिया 39.8 मिलियन हैक्टेयर वन नुकसान के मामले में सर्वोपरि है। उसके बाद उत्तरी अमेरिका, 18.7 मिलियन हैक्टेयर के साथ दूसरे पायदान पर, दक्षिणी अमेरिका 8.3 मिलियन हैक्टेयर के साथ तीसरे, अफ्रीका 6.4 मिलियन हैक्टेयर के साथ चौथे पायदान पर है। दुनिया में आधे से अधिक वन रूस में 81.5 करोड़ हैक्टेयर, भारत में 80.9 करोड़ हैक्टेयर, ब्राजील में 49.7 करोड़ हैक्टेयर, कनाडा 34.7 करोड़ हैक्टेयर और संयुक्त राज्य अमेरिका के 31 करोड़ हैक्टेयर क्षेत्र में हैं।

कालेज में बाबा साहेब अम्बेडकर की मूर्ति के समीप संगोष्ठी के आयोजकों के साथ।
गौरतलब है और अब यह जगजाहिर है कि हर साल जितना जंगल खत्म हो रहा है, वह एक लाख तीन हजार वर्ग किलोमीटर में फैले देश जर्मनी, नार्डिक देश आइसलैंड, डेनमार्क, स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों के क्षेत्रफल के बराबर है। लेकिन सबसे बडे़ दुख की बात यह है कि इसके अनुपात में नये जंगल लगाने की गति बेहद धीमी है। लंदन के थिंक टैंक एनर्जी ट्रांसमिशन कमीशन, ईटीसी की मानें तो समूची दुनिया में हर मिनट औसतन दस फुटबाल मैदान के बराबर यानी 17.60 एकड़ जंगल काटे जा रहे हैं। बीते 30 सालों में 42 करोड़ हैक्टेयर जंगल को मैदान बना दिया गया है। जहां तक धरती का फेफडा़ कहे जाने वाले दक्षिण अमेरिका के अमेजन बेसिन के बहुत बडे़ भूभाग पर फैले अमेजन के वर्षा वन विनाश के कगार पर हैं। बढ़ते तापमान, भयावह सूखा, वनों की अंधाधुंध कटाई और जंगलों में आग की बढ़ती घटनाओं के चलते अमेजन के जंगल खतरे के दायरे में हैं। मौजूदा अमेजन के जंगलों के 10 से 47 फीसदी हिस्से पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। जबकि अमेजन के जंगलों का 18 फीसदी हिस्सा तो पहले ही नष्ट हो ही चुका है। यदि यह आंकडा़ 20-25 फीसदी तक पहुंच गया तो यह जंगल पूरी तरह सवाना यानी घास के मैदान में बदल जायेगा। हकीकत में अब अमेजन के लिए ‘रेड अलर्ट’ का ऐलान करने का समय आ गया है। इसमें जलवायु परिवर्तन के चलते पड़ने वाले सूखा और गर्मी व आग सहित बहुतेरे कारकों की बडी़ भूमिका है। अमेजन वनों का लगभग आधा हिस्सा 2050 तक खत्म हो जायेगा। ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है। दरअसल दुनिया में जंगलों का सबसे ज्यादा विनाश ब्राजील में हुआ है और यह सिलसिला आज भी जारी है। उसके बाद डेमोक्रेटिक रिपब्लिक आफ कांगो और बोलीविया का नम्बर आता है।
यदि मैरीलैंड यूनीवर्सिटी और वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट के ग्लोबल वाच की हालिया रिपोर्ट की मानें तो 2001 से 2023 के बीच भारत में तकरीब 23.3 लाख हेक्टेयर जंगल खत्म कर दिये गये। 2013 से 2023 के बीच के दस सालों में देश में हुए जंगलों के 95 फीसदी खात्मे में जंगलों की अवैध कटाई और आग की घटनाओं में बेतहाशा बढो़तरी की अहम भूमिका रही है। यदि यू के स्थित साइट यूटिलिटी बिडर की नयी रिपोर्ट की मानें तो भारत ने बीते 30 वर्षों में जंगलों की कटाई में भारी बढो़तरी हुयी है। इसमें 2015 से 2020 के इन पांच वर्षों के दौरान तो जंगल कटाई ने कीर्तिमान बनाया है। इस दौरान देश में 6,68,400 हैक्टेयर वनों का खात्मा हुआ। यह आंकडा़ दुनिया में ब्राजील के बाद दूसरा सबसे अधिक है। इसमें देश के पांच राज्यों यथा आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, उत्तराखंड, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश शीर्ष पर हैं। दुखदायी यह कि यह सिलसिला आज भी जारी है।
दरअसल जैव विविधता को संरक्षित करने में वन की उपयोगिता जगजाहिर है लेकिन विडम्बना है कि हम उन्हीं के साथ खिलवाड़ कर अपने जीवन के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। मौजूदा दौर की हकीकत यह है कि दुनिया में हर मिनट 21. 1 हैक्टेयर में फैले जंगलों का खात्मा हो रहा है। फिर भी हम इस सबसे बेखबर मौन हैं।
हम यह क्यों नहीं समझते कि यदि अब भी हम नहीं चेते तो हमारा यह मौन हमें कहां ले जायेगा और क्या मानव सभ्यता बची रह पायेगी ?
श्री रावत ने कहा कि जहां तक जल समस्या का सवाल है, यह वैश्विक समस्या है। पानी की कमी दुनियाभर में लोगों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय है। जलवायु परिवर्तन के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में लोग सबसे अधिक इससे चिंतित हैं। प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा भारत सहित 9 देशों में किये सर्वे में यह खुलासा हुआ है। यही हाल सूखे का है। सर्वे में कहा गया है कि 47 फीसदी लोगों ने सूखे और पानी की कमी को दूसरे खतरों की तुलना में दोगुणा बड़ा खतरा बताया है। 56 फीसदी लोगों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से व्यक्तिगत रूप से उन्हें ज्यादा नुकसान उठाना पड़ रहा है। अर्जेंटीना, इंडोनेशिया, केन्या और दक्षिण अफ्रीका में लगभग दस में से सात लोगों की यही राय है जबकि तुर्की में यह एक तिहाई है। बहुत ही कम लोगों का यह मानना था कि मौसम, बाढ, तूफान या समुद्र का बढ़ता जलस्तर खतरा है। 2015 के बाद से इंडोनेशिया, मैक्सिको, दक्षिण अफ्रीका और तुर्की में सूखे को अपनी सबसे बड़ी समस्या और चिंता बताने वालों की तादाद में काफी इजाफा हुआ है।
हकीकत में दुनिया में पेयजल की समस्या दिनों दिन विकराल होती चली जा रही है। दैनंदिन कार्यों की बात छोड़ दें, इसकी भयावहता का सबूत यह है कि दुनिया में आज लगभग 4.4 अरब लोग केवल पीने के साफ पानी से महरूम हैं। यह भीषण खतरे का संकेत है। स्विस फेडरल इंस्टीट्यूट आफ एक्वाटिक साइन्स एण्ड टेक्नोलाजी के अध्ययन कर्ता एस्टर ग्रीनबुड की मानें तो यह स्थिति बेहद भयावह और अस्वीकार्य है कि दुनिया में इतनी बड़ी आबादी की पीने के साफ पानी तक पहुंच नहीं है। इन हालात को तत्काल बदले जाने की जरूरत है। विडम्बना यह है कि इसके बावजूद दुनिया की सरकारें पेयजल को बचाने और जल संचय के प्रति क्यों गंभीर नहीं हैं, यह समझ से परे है। हमें बारिश से 4000 अरब घनमीटर जल हर साल मिलता है लेकिन उसका संचय कर पाने में नाकामी ही हमारे जल संकट की असली वजह है। यदि वह हम कर लें तो काफी हद तक इस संकट से निजात मिल सकती है। संयुक्त राष्ट्र बरसों से चेतावनी दे रहा है कि जल संकट समूची दुनिया के लिए एक बहुत बड़ी समस्या बन जायेगा और अगर अभी से पानी की बढ़ती बर्बादी पर अंकुश नहीं लगाया गया तथा जल संरक्षण के उपाय नहीं किए गये तो हालात और खराब हो जायेंगे जिसकी भरपायी असंभव हो जायेगी। हम दावे भले कुछ भी करें असलियत में अब यह स्पष्ट है कि दुनिया अपने बुनियादी लक्ष्यों तक को पाने के मामले में बहुत पीछे है। यह अच्छे संकेत नहीं हैं। इन हालातों में 2015 में संयुक्त राष्ट्र का मानव कल्याण में सुधार के लिए सतत विकास लक्ष्य के तहत सभी के लिए 2030 तक सुरक्षित और किफायती पेयजल की आपूर्ति सपना ही रहेगा । संयुक्त राष्ट्र की मानें तो साफ पानी की पहुंच से दूर देशों के मामले में दक्षिण एशिया शीर्ष पर है जहां 1200 मिलियन लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं, वहीं उप सहारा अफ्रीकी देशों के 1000 मिलियन, दक्षिण पूर्व एशिया के 500 मिलियन और लैटिन अमेरिकी देशों के 400 मिलियन लोग आज भी साफ पानी से महरूम हैं। यह पानी के मामले में दुनिया की शर्मनाक स्थिति है। हकीकत यह है कि इन क्षेत्रों में पानी में दूषित पदार्थों की मौजूदगी सबसे बड़ी समस्या है। गौर करने वाली बात यह है कि आज हालत यह है कि लगभग 61 फीसदी आबादी एशिया में साफ पानी के संकट से जूझ रही है।
जहां तक भारत का सवाल है,नीति आयोग की मानें तो देश की तो 60 करोड़ से भी ज्यादा आबादी की साफ पानी तक पहुंच ही नहीं है। देश के दूरदराज के और ग्रामीण क्षेत्रों की बात तो दीगर है, देश की राजधानी दिल्ली के लोग भी पीने के पानी के लिए मारामारी करते हैं। कहीं-कहीं तो लोगों का टैंकर ही एकमात्र सहारा होता है लेकिन वहां भी एक बाल्टी पानी के लिए लोग एक दूसरे की जान के प्यासे हो जाते हैं । हकीकत यह है कि राजधानी के नये इलाकों में ही नहीं, पुराने इलाकों में भी लोग पीने के पानी की भारी किल्लत से बेहाल रहते हैं। यह हालत तब है जबकि दिल्ली की भाजपा की रेखा गुप्ता सरकार दिल्ली वालों को पानी की समुचित आपूर्ति का दावा करते नहीं थकती। लेकिन फिर भी संकट बरकरार है। गर्मी के दिनों में तो अक्सर लोग मटके फोड़ने पर उतारू हो जाते हैं। क्यों? इसका जबाव किसी के पास नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि दिल्ली वालों को जरूरत के मुताबिक जल बोर्ड द्वारा पानी न मिल पाने की स्थिति में वे सबमर्सिबल के जरिये बेतहाशा भूजल निकाल अपनी जरूरत पूरी करते हैं। फिर प्राइवेट संस्थान, छोटे -छोटे धंधे वाले, निजी अस्पताल , वर्कशाप, आटोमोबाइल सेंटर, वाहन धुलाई केंद्र और भवन निर्माण में भूजल का दोहन कीर्तिमान बनाये हुए हैं। यह स्थिति अकेले देश की राजधानी की ही नहीं कमोबेश पूरे देश की है। एक अनुमान के मुताबिक और दिल्ली जल बोर्ड द्वारा विधानसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में तकरीबन 22,000 से ज्यादा अवैध सबमर्सिबल चल रहे हैं। ऐसे हालात में भूजल स्तर में कमी आयेगी ही।इस समस्या को देखते हुए एनजीटी कितने भी लुप्त हो चुके जल निकायों की बहाली के निर्देश दे लेकिन उस पर अमल करने की जिम्मेदारी जिनकी है, उनकी नाकामी इस समस्या को और बढ़ा रही है। यह पूरे देश में हो रहा है।
इसमें सरकारों को ही दोष देने से काम नहीं चलेगा, इस सबके लिए हम भी उतने ही दोषी हैं। इसके लिए हमारी जीवन शैली में आये बदलाव की अहम भूमिका है। समस्या की विकरालता की एक अहम वजह यह भी है। दूसरी वजह देश में अधिक अन्न उत्पादन की लालसा के पीछे रासायनिक खादों का बढ़ता उपयोग और उसके लिए साठ के दशक में डीजल पंपों के इस्तेमाल की बढ़ती प्रवृत्ति। जिसका दुष्परिणाम हमारी जमीन की उर्वरा शक्ति दिनोंदिन क्षीण होते जाने के रूप में और हमारे भूजल भंडार पर पड़ा। दिनोंदिन बंजर होती जमीन और भूजल भंडार का निरंतर नीचे चला जाना इसका जीता जागता सबूत है। प्रदूषण के चलते भूजल की गुणवत्ता भी लगातार प्रभावित हो रही है। इसमें कृषि कार्यों व घरेलू उपयोग हेतु भूजल पर अति निर्भरता भूजल के अति दोहन का प्रमुख कारण है। भूजल में टी डी एस और क्लोराइड की मात्रा सीमा को पार कर गयी है। रसायनों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी और भूजल का स्वास्थ्य बिगड रहा है। इससे जहां कृषि प्रभावित होती है, वहीं पीने के पानी की समस्या और विकराल होती जा रही है।
यहां गौरतलब है कि हम अक्सर पुरातन परंपराओं, मान्यताओं और संस्कृति की दुहाई देते हैं, लेकिन क्या हम अपने जीवन में उन्हें अमल में लाते हैं। नदियों को हम मां मानते हैं जो हमारे जीवन की आधार हैं। उनके किनारे ही सभ्यता पनपी। लेकिन क्या उनकी हम रक्षा कर पाते हैं। यह जानते-समझते हुए भी कि नदियां ही जलापूर्ति का सबसे बड़ा आधार हैं। उसके बावजूद जीवनदायिनी नदियों को हम खुद प्रदूषित करते हैं। सरकार दावा भले करे लेकिन हकीकत यह है कि वह चाहे पुण्यसलिला गंगा हो, यमुना हो या फिर कोई और नदी। आज हालत यह है कि कमोबेश देश की अधिकांश नदियां प्रदूषित हैं। अब तो मैदानी इलाकों की बात छोडिए, पर्वतीय राज्यों में भी नदियां प्रदूषित हैं। सीपीसीबी के आंकड़े इस बात के प्रमाण हैं। देखा जाये तो देश की 271 नदियों में 296 जगहों पर उनका पानी प्रदूषित है। हकीकत यह है कि देश की कमोबेश 465 नदियां प्रदूषित हैं। सी एस ई तो यही दावा करती है।
जहां तक सरकारों का सवाल है, सरकारें तो अपने हिसाब से काम करती हैं और वे करेंगीं भी। उन पर पूरी तरह निर्भर रहना ठीक नहीं। जनता को भी आगे आना होगा। यह सत्य है कि हर क्षेत्र की स्थिति भिन्न होती है। लेकिन आप प्रयास तो कर ही सकते हैं। आप अपने खेत में तालाब बनायें जिससे जहां वर्षा जल संचित होगा, भूजल स्तर में बढोतरी होगी, आपकी पीने के पानी की परेशानी दूर होगी और सिंचाई के लिए आपको किसी पर निर्भर नहीं रहना होगा। जरूरत है विलुप्त हो चुके प्राकृतिक जल संसाधनों को पुनर्जीवित करने की और तालाब, पोखर समेत पारंपरिक जल स्रोतों को बचाने की। फिर सरकारी संस्थाओं, निजी प्रतिष्ठानों, आवासीय समितियों व नागरिकों द्वारा वर्षा जल संचयन के उपायों को अनिवार्य किए जाने और जल की बर्बादी पर अंकुश से जल संकट में काफी हद तक राहत मिल सकती है। इस हेतु जनजागरण बेहद जरूरी है।
यह जगजाहिर है कि जल का हमारे जीवन पर प्रत्यक्ष तथा परोक्ष रूप से प्रभाव पड़ता है। यह भी कि जल संकट से एक ओर कृषि उत्पादकता प्रभावित हो रही है, वहीं दूसरी ओर जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा और मानव स्वास्थ्य पर भी खतरा बढ़ता जा रहा है। आखिरकार इस वैश्विक समस्या के लिए जिम्मेदार कौन है? जाहिर है इसके पीछे मानवीय गतिविधियां जिम्मेदार हैं जिसमें कहीं न कहीं उसके लोभ, स्वार्थ और भौतिकवादी जीवनशैली की अहम भूमिका है।। वैश्विक स्तर पर देखें तो अभी तक यह स्थिति थी कि दुनिया में दो अरब लोगों को यानी 26 फीसदी आबादी को सुरक्षित पेयजल उपलब्ध नहीं था। पूरी दुनिया में 43.6 करोड़ और भारत में 13.38 करोड़ बच्चों के पास हर दिन की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त पानी नहीं है। फिर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के चलते हालात और खराब होने की आशंका है। दुनिया में वह शीर्ष 10 देश जहां के बच्चे पर्याप्त पानी से महरूम हैं, उसमें भारत शीर्ष पर है जिसके 13.38 फीसदी बच्चे पर्याप्त पानी से महरूम हैं। जल संकट के लिए दुनिया में अति संवेदनशील माने जाने वाले 37 देशों की सूची में भारत भी शामिल हैं। यह सबसे चिंतनीय है। यूनीसेफ की मानें तो 2050 तक भारत में मौजूद जल का 40 फीसदी हिस्सा खत्म हो चुका होगा। यही सबसे अधिक चिंता का विषय है कि तब क्या होगा देखा जाये तो जल, जंगल और जमीन के मुद्दे आपस में गहरे तक जुड़े हुए हैं। प्राकृतिक संसाधनों का उचित प्रबंधन आज की सबसे बड़ी जरूरत है। तभी सामुदायिक प्रयासों को प्रोत्साहित कर धरती को बचाया जा सकता है। अन्यथा यह संकट गहराता ही चला जाएगा। इसमें दो राय नहीं।
व्याख्यान के अंत में कालेज प्राचार्य प्रोफेसर सदानंद प्रसाद द्वारा पर्यावरण व प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की शपथ दिलायी गयी। इस अवसर पर आयोजित पर्यावरण विषयक विभिन्न प्रतियोगिताओं यथा पेन्टिंग, रंगोली, फोटोग्राफी, वाद-विवाद आदि में विजयी छात्र-छात्राओं को प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। समारोह के अंत में कालेज के प्राचार्य प्रोफेसर सदानंद प्रसाद ने श्री ज्ञानेंद्र रावत को पटका पहनाकर व प्रोफेसर मोनिका अहलावत व प्रोफेसर डा० जितेन्द्र नागर ने भगवान तथागत बुद्ध की प्रतिमा व स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया। समापन के अवसर पर प्रोफेसर मोनिका अहलावत ने कार्यक्रम की सफलता हेतु सभी आगंतुकों का आभार व्यक्त किया और आश्वस्त किया कि पर्यावरण संरक्षण हेतु जनजागरण की दिशा में कालेज सदैव अग्रणी भूमिका का निर्वहन करता रहेगा।
प्रस्तुति : सद्दीक अहमद
सम्पादक (डे लाइफ), जयपुर

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