सादगी से इस्लामी तर्ज पर ऐमन मंसूरी व मौहम्मद जीशान का निकाह हुआ

राजस्थान मुस्लिम तैली महापंचायत, मंसूरी पंचायत संस्था, राजस्थान ने की सभी से अपील
सद्दीक अहमद की रिपोर्ट
www.daylifenews.in
जयपुर। इस्लामी तर्ज पर सादगी से होने वाले निकाही प्रोग्राम के लिए दुल्हन ऐमन मंसूरी व दुल्हा मौहम्मद जीशान मय उनके वालदेन को निकाह के बाद दिली मुबारकबाद देने वालों का ताँता लग गया। ऐमन मंसूरी व मौहम्मद जीशान का निकाह मस्जिद में सम्पन्न हुआ। यहाँ यह इस बात पर जोर देकर कहा गया कि आर्थिक स्थिति को देखते हुए इंसान अपने बच्चों के निकाह मस्जिदों में सादगी और इस्लामिक तर्ज पर करते हैं तो इससे दो परिवारों का शादी में होने वाली फिजूलखर्जी को बचा कर दूल्हा दुल्हन के भविष्य को संवारा जा सकता है।
अल्लाह तआला इस रिश्ते को मकबूलियत नीज़ दायमी कायमी बरकतों से नवाज़े।
निकाह समारोह में बताया कि इस्लामी हुक्म और नबी ऐ पाक की सुन्नत के मुताबिक हो रही है। हाँलाकि दुल्हन के वालिद मौहम्मद ताहिर मन्सूरी व उनकी एहलिया प्रचलित मंहगी रस्मों वाली बड़ी दावत के साथ भी यह शादी कर सकते थे। लेकिन समाज में मिसाल कायम करते हुऐ तथा आरको परिवार के मुखिया अब्दुल लतीफ आरको की इस कोशिश को आगे बढ़ाते हुए कि शादियों में फिजूल खर्चों से बचें और बचाई गई रकम को खानदान के जीवन स्तर को ऊँचा उठाने, खुद का रोज़गार व्यापार शुरु करने तथा अपने बच्चे बच्चियों की आला तालीम पर खर्च करें।
जबकि आजकल देखा देख अनगिनत रस्मों, जैसे सगाई, त्योहारों पर ईदी भेजना, लगन, बाण, रतजगा, तैल हल्दी, जेहज़ का सामान आख़िर में निकाह वाले दिन तकरीबन 1500 से 2000 मेहमानों की दावत करने पर कुल मिलाकर गरीब परिवार का लगभग 7 से 10 लाख, मीडियम परिवार का 10 से 15 लाख व सरमायेदारों की तो बात ही निराली है। उनके यहां तो करोडो रुपये खर्च किये जाते हैं।
इन हालात में कई मौके पर ऐसी परिस्थितियां भी मन्जरे आम पर आई हैं कि लडकियों के रिश्ते तो तय हो जाते हैं लेकिन वालदेन के पास शादी के लिए बड़ी रकम इकट्ठा नहीं होने या धीरे धीरे जुटाने में हुई देरी के कारण निकाह की तारीखें बढ़ती रहती हैं यहां तक कि तय शुदा रिश्ते भी टूटने की नौबत आ जाती है। इस तरह कौम ओ मिल्लत की बेटियां या तो बैठी रहती हैं या अपनी मर्जी से उजलत में बगैर वालदेन को बताये बैमेल नीज ना कामयाब रिश्ते में उलझ जाती है। अब तो गैर समुदाय के लोग ऐसी बच्चियों को बहला फुसलाकर कुफरिया जाल में फँसा लेते है।
देखने में यह भी आया है कि जहज़ में ऐसे बड़े बड़े कीमती सामान दे दिऐ जाते हैं जिनको रखने की रिहायशी व्यवस्था भी लड़के के पास नहीं होती। नतीजतन सामान इधर उधर पड़ा रहता है। ख़राब हो जाता है। यह सब बुराईयां नबी की सुन्नत को पामाल करने की वजह से भुगतनी पड़ती हैं।
होना तो यह चाहिऐ की शादी की तकरीब पूरी सादगी, बगैर लड़की वाले द्वारा दी जाने वाली जौनार-दावत के की जानी चाहिए। जिसके लिए थौड़े खर्चे में ही काम चल सकता है। बच्चियों के वक्त पर हाथ भी पीले हो जाऐंगें और वालदेन भी जैर बार होने से बच जाऐंगे।
उम्मीद है इस तरह की पहल समाज कुबूल कर लेगा तो वह दिन दूर नहीं जब हमारी कौम औ मिल्लत बरसरे रोज़गार तालीम तरक्की याफता बन जाऐगी।
फरमाये। अल्लाह तआला से दुआ है कि हमें अमल करने की तौफीक अता फरमाए।

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