
लेखक – डा. शिवसिंह रावत
लेखक सिंचाई विभाग हरियाणा के सेवानिवृत्त अधीक्षण अभियंता और वाक फार यमुना के संयोजक हैं।
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हाल ही में हथीन के विधायक चौधरी इसराईल की पलवल स्थित जगेश्वर मंदिर में आयोजित सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में उपस्थिति ने पूरे क्षेत्र में नई चर्चा को जन्म दिया। एक मेव विधायक का सार्वजनिक रूप से हिंदू मंदिर में शामिल होना स्वाभाविक रूप से सोशल मीडिया और समाज में बहस का विषय बना हुआ है। कुछ धार्मिक संगठनों और हिंदू संतों ने इसका खुलकर विरोध किया, जबकि समाज के एक वर्ग ने इसे सामाजिक सद्भाव, आपसी सम्मान और भाईचारे का सकारात्मक संदेश बताया।
लेकिन इस विषय पर आगे बढ़ने से पहले यह समझना आवश्यक है कि भारत, जिसकी मूल सांस्कृतिक आत्मा सनातन परंपरा रही है, वहाँ इस्लाम का आगमन और विस्तार कैसे हुआ।
7वीं शताब्दी में अरब व्यापारियों के माध्यम से इस्लाम भारत पहुँचा और बाद में मुस्लिम आक्रमणों तथा सल्तनत व मुगल शासन के जरिए इसका राजनीतिक विस्तार हुआ। इतिहास यह भी बताता है कि इस्लाम की शुरुआत व्यापार, सूफी संतों की शिक्षाओं, सामाजिक समानता और विभिन्न सामाजिक-आर्थिक कारणों से हुआ। वहीं कुछ कालखंडों में तलवार की नोक पर जबरन धर्मांतरण और धार्मिक दबाव की घटनाएँ भी इतिहास का हिस्सा रही हैं।
भारत के अधिकांश मुसलमानों, विशेषकर मेव समाज, की सांस्कृतिक जड़ें भारतीय सनातन परंपरा से जुड़ी रही हैं। रहन-सहन, बोली, खान-पान और सामाजिक परंपराओं में आज भी गहरा साम्य दिखाई देता है। मुख्य अंतर पूजा-पद्धति और धार्मिक रीति-रिवाजों का है।
मुगल काल में जहाँ अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक समन्वय को बढ़ावा दिया, वहीं औरंगजेब के शासनकाल को लेकर कठोर धार्मिक नीतियों संबंधी विवाद भी इतिहास में दर्ज हैं।
19वीं और 20वीं शताब्दी में आर्य समाज ने हिंदू समाज में आत्मजागरण और सामाजिक सुधार का व्यापक अभियान चलाया। महर्षि दयानंद सरस्वती और स्वामी श्रद्धानंद ने शुद्धि आंदोलन के माध्यम से “घर वापसी”, सामाजिक समानता, शिक्षा और कुरीतियों के विरोध का संदेश दिया। यद्यपि समय के साथ यह आंदोलन सीमित होता गया, फिर भी इसने हिंदू समाज में आत्मसम्मान और सामाजिक चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अब पुनः विधायक इसराईल के मंदिर जाने के प्रसंग पर लौटते हैं। यदि कोई व्यक्ति सच्चे मन, श्रद्धा और आस्था से सनातन परंपरा के प्रति सम्मान प्रकट करता है या उसे अपनाना चाहता है, तो उसका स्वागत होना चाहिए। “देर आए, दुरुस्त आए” की भावना भारतीय संस्कृति का हिस्सा रही है।
लेकिन यदि यह केवल राजनीतिक स्वार्थ, प्रचार या दिखावे का माध्यम बन जाए, तो वह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण बल्कि निंदनीय भी माना जाएगा। समाज स्वाभाविक रूप से व्यक्ति के आचरण और उसकी नीयत-दोनों को देखता है।
इसी वर्ष 15 फरवरी को विधायक इसराईल द्वारा उटावड़ में 36 बिरादरी की तथाकथित महापंचायत आयोजित की गई, जिसमें दहेज प्रथा, फिजूलखर्ची, नशाखोरी, गो-तस्करी और साइबर ठगी जैसी सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध जागरूकता का संदेश देने का प्रयास किया गया। इस पंचायत के बाद हथीन के गोकुल भवन में आयोजित होली मिलन समारोह में हिंदू और मुस्लिम समाज ने फूलों की होली खेलकर प्रेम, सम्मान और धार्मिक संवेदनशीलता तथा क्षेत्र की साझा विरासत और गंगा-जमुनी तहज़ीब का संदेश देने का प्रयास किया।
यदि उटावड़ महापंचायत, हिंदू-मुस्लिम मिलन समारोह और अब मंदिर में उपस्थिति वास्तव में नेक नीयत, सामाजिक सुधार और आपसी सद्भाव की भावना से प्रेरित प्रयास हैं, तो समाज स्वाभाविक रूप सें इसराईल से अपेक्षा करेगा कि मेवात के लोगों की एक महापंचायत आयोजित कर अपने समाज को उनकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जड़ों से पुनः जोड़ने की दिशा में पहल करें, जिसमें शुद्धिकरण और हिंदू धर्म में घर वापसी जैसे विषयों पर भी चर्चा हो। इससे सामाजिक एकता और समरसता, शांति, अमन और भाईचारे का संदेश और अधिक मजबूत हो सकता है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार है।)