क्या अप्रैल की तपिश जलवायु परिवर्तन और वैश्विक संघर्षों की चेतावनी है? – डा. संजय राणा

लेखक : डा. संजय राणा
लेखक जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरणविद एवं एस्रो के निदेशक हैं।
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बीती 20 अप्रैल 2026 को विश्व में 20 ऐसे स्थान जो सर्वाधिक गर्म रहे, उनमें से 19 स्थान भारत के दर्ज किए गये जिनमें 44 से 45 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया गया। यह केवल एक मौसमी घटना भर नहीं रह गई है। यह एक गहरी चिंता का विषय है कि जिस गर्मी का चरम मई और जून में देखने को मिलता था, वह अब अप्रैल में ही दस्तक दे रही है। प्रश्न यह उठता है कि क्या यह असामान्य स्थिति केवल प्राकृतिक चक्र का परिणाम है, या इसके पीछे मानव जनित कारण-विशेषकर जलवायु परिवर्तन और वैश्विक संघर्ष-भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं?
पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारण है पिछले कुछ दशकों में पृथ्वी का औसत तापमान लगातार बढ़ा है। वैज्ञानिकों के अनुसार औद्योगिक क्रांति के बाद से कार्बन उत्सर्जन में हुई तीव्र वृद्धि ने वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों का स्तर बढ़ा दिया है। एक शोध में सामने आया है कि पृथ्वी पर मानव अस्तित्व के समय वातावरण में कार्बन स्तर लगभग 300 पार्टिकल्स पर मिलियन (पीपीएम) हुआ करता था जो वर्तमान में 420 पीपीएम से ऊपर पहुंच गया है। इसका परिणाम यह हुआ कि हीटवेव अब अधिक तीव्र, अधिक लंबी और अधिक बार आने लगी हैं। भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश, विशेष रूप से गंगा के मैदानी क्षेत्र, इस परिवर्तन के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैं।
दूसरा पहलू है प्राकृतिक जलवायु चक्रों का अनियमित होना। जब प्रशांत महासागर का तापमान असामान्य रूप से बढ़ता है, तो इसका प्रभाव वैश्विक मौसम प्रणाली पर पड़ता है। भारत में इसके परिणामस्वरूप प्रायः मानसून कमजोर होता है और गर्मी का असर अधिक समय तक बना रहता है। यदि 2026 में अल नीनो की स्थिति विकसित होती है या बनी रहती है, तो अप्रैल की यह तपिश आगे और विकराल रूप ले सकती है। अब प्रश्न आता है वैश्विक संघर्षों का। क्या युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव भी इस गर्मी के लिए जिम्मेदार हैं? प्रत्यक्ष रूप से नहीं, परंतु अप्रत्यक्ष प्रभावों को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता। रूस-यूक्रेन, अमेरिका-इजराइल और ईरान युद्ध जैसे संघर्षों ने ऊर्जा संकट को जन्म दिया, जिसके चलते कई देशों ने स्वच्छ ऊर्जा की बजाय कोयले और अन्य जीवाश्म ईंधनों का अधिक उपयोग करना शुरू कर दिया है। इससे वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि हुई, जो अंततः जलवायु परिवर्तन को और तेज करता है। इसके अतिरिक्त, युद्धों के कारण पर्यावरणीय विनाश, जंगलों की कटाई और औद्योगिक प्रदूषण भी बढ़ता है। हालांकि यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि हर असामान्य गर्मी को केवल संघर्षों से जोड़ देना एक अति सरलीकरण होगा। मौसम एक जटिल प्रणाली है, जिसमें स्थानीय कारक भी सम्मिलित है जैसे शहरीकरण, कृषि भूमि बढ़ाने एवं विकास हेतु हरित आवरण में कमी का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते है कि संपूर्ण विश्व में प्रत्येक दिन 25000 से 30000 हेक्टेयर जंगल नष्ट किए जाते हैं। अर्थात प्रत्येक दिन लगभग 4.1 करोड़ पेड़ काटे जाते है। यहां अगर संपूर्ण विश्व में सर्वाधिक पेड़ काटने वाले देशों की सूची में देखा जाए तो भारत दूसरे नंबर पर आता है।
पश्चिमी विक्षोभों की अनुपस्थिति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
उत्तर भारत में तेजी से बढ़ते कंक्रीट के जंगल ‘हीट आइलैंड’ प्रभाव को बढ़ाते हैं, जिससे शहरों में तापमान और अधिक महसूस होता है। फिर भी, यह स्पष्ट है कि वर्तमान स्थिति एक चेतावनी है। यदि अप्रैल में ही तापमान 44 डिग्री के पार जा रहा है, तो मई और जून में इसके और बढ़ने की पूरी संभावना है। वैज्ञानिक पूर्वानुमान भी इस दिशा में संकेत देते हैं कि इस वर्ष सामान्य से अधिक हीट वेव के दिन देखने को मिल सकते हैं।
जिस प्रकार भारत के उत्तरी प्रदेशों में विशेषतः बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र में गर्मी अधिक पड़ने का प्रभाव सीधे सीधे फसल, पानी एवं मानवीय स्वास्थ पर पड़ना अवश्यंभावी है, आशंका इस बात की अधिक है कि कुछ वर्ष पहले व्यवस्थाओं को बुंदेलखंड में रेल द्वारा पानी भेजना पड़ा था, अगर अभी से समाज और व्यवस्थाएं सतर्क नहीं हुई तो यही हालत इस वर्ष भी बन सकते है। जितनी ज्यादा गर्मी पड़ेगी उसका असर मानवीय जीवन के साथ साथ देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।
समाधान के स्तर पर, केवल सरकारी नीतियाँ पर्याप्त नहीं होंगी; सामाजिक और व्यक्तिगत प्रयास भी उतने ही आवश्यक हैं। स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना, वृक्षारोपण, जल संरक्षण, और शहरी नियोजन में हरित क्षेत्रों का विस्तार जैसे कदम तत्काल उठाए जाने होंगे। साथ ही, वैश्विक स्तर पर देशों के बीच सहयोग और शांति भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि संघर्ष न केवल मानव जीवन को प्रभावित करते हैं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन को भी बिगाड़ते हैं। अंततः, अप्रैल की यह असामान्य गर्मी एक स्पष्ट संकेत है—यह प्रकृति की चेतावनी है कि यदि हमने समय रहते अपने व्यवहार में परिवर्तन नहीं किया, तो आने वाले वर्षों में यह “असामान्य” ही हमारी नई सामान्य स्थिति बन सकती है। (लेखक का अपना अध्ययन एवं अपने विचार हैं)

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