सम्पूर्ण माँ बनिए, आधी-अधूरी माँ नहीं

लेखिका : विजय लक्ष्मी जांगिड़ ‘विजया’
टीचर, MPS इंटरनेशनल, राइटर, एंकर
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आज मातृदिवस है और जब मैं सुबह पूजा कर रही हूँ तो ‘ पूत कपूत सुने बहुतेरे, माता सुनी न कुमाता’ और माँ दुर्गा की आरती की ये पंक्तियाँ कानों में गूँज रही हैं। क्या सच में माँ कुमाता नहीं हो सकती?
और अगर कुमाता नहीं है तो सुमाता कैसी होगी? यह प्रश्न मैंने कई माताओं से पूछा। अधिकांश के उत्तर बच्चे की देखभाल, पालन-पोषण व संस्कारोपण पर आधारित थे, मगर ये उत्तर मुझे संतुष्ट नहीं कर सके।
हर प्रश्न का उत्तर प्रकृति के पास है—यह पढ़ा था और मेरी खोज शुरू हुई। मैंने प्रकृति माँ की गोद में जाकर जाना कि माँ होना क्या होता है। आइए चिंतन करते हैं—
अच्छी माँ होना चिड़िया से सीखा जा सकता है । वह सिर्फ अपने बच्चे के लिए ही घोंसला बनाती है, उसे उड़ना सिखाती है और फिर बच्चे को खुले गगन का रास्ता दिखाकर स्वयं भी उस घोंसले से उड़ जाती है, अपनी ही दिशा में।
माँ होने का मतलब सिर्फ माँ होना नहीं है। माँ एक स्त्री भी है— एक जीवित देह, चिंतनशील मन, भाव, उहापोह, इच्छाएँ और अपने अस्तित्व की ललक—ये सब उसके व्यक्तित्व का हिस्सा हैं।

Mother’s day greeting card with beautiful blossom flowers

न जाने कब स्त्री के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को माँ तक सीमित कर दिया गया । उसका पूरा जीवन संतान के इर्द-गिर्द किसने रच दिया? विधाता ने उसे केवल ममत्व ही नहीं दिया, अन्य गुण, भाव और विचार भी दिए हैं। क्या कभी इस ओर किसी स्त्री का ध्यान जाता है?
बचपन से ही उसे इस विचार और संस्कार के साथ पाला जाता है कि उसे विवाह करना है, नई पीढ़ी को जन्म देना है, उनका पोषण करना है और इसी में जीवन गुजार देना है। क्या ऐसी माँ, जो स्वयं कुंठित, डरी, आत्मविश्वासहीन, दूसरों पर निर्भर और असहाय है, अपने संतान के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कर सकती है?
एक माँ जब तक सम्पूर्ण स्त्री नहीं बनेगी, वह सम्पूर्ण माँ कैसे बनेगी?
जरा सोचिए— क्या उसका जन्म सिर्फ संतान को बड़ा करने, खाना खिलाने और उसकी देखभाल करने के लिए ही हुआ है?
नहीं! याद कीजिए हमारे इतिहास की महान व आदर्श माताओं को— माता सीता, माता कैकेयी, माता जीजाबाई, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, माता यशोधरा, माता कौशल्या, माता कुंती। इन्होंने अपनी संतान का जो व्यक्तित्व गढ़ा, उसमें उनकी शिक्षा, कला, कौशल, आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता, आत्मविश्वास और वीरता—इन सबका योगदान था। क्या वे सिर्फ अपने बच्चों को खाना खिला रही थीं या उनकी देखभाल कर रही थीं?
नहीं! इसके साथ-साथ वे उनका चरित्र गढ़ रही थीं, उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण कर रही थीं।
स्मरण रहे— मूर्ति का रंग, रूप और आकार पत्थर में नहीं, मूर्तिकार के विचारों में होता है। उसकी सधी हुई कल्पना, विचार और हाथ ही स्मरणीय कलाकृतियों का निर्माण करते हैं। जरा-सा भी संतुलन बिगड़ा तो मूर्ति खंडित हो जाती है।
हमें नहीं भूलना चाहिए वन में माता सीता द्वारा की गई लव-कुश की परवरिश को। उन्हें घर से निष्कासित किया गया, तब भी उन्होंने दुःख, कुंठा और निराशा में डूबने की बजाय अपने बच्चों को पिता की आदर्शतम तस्वीर दिखाई और कुल की ख्याति से परिचित करवाया। एक राजकुमारी वन में रहकर कष्ट उठाकर भी संतान का सकारात्मक पोषण और पालन कर रही थी।
माता कुंती ने वनवास में पांडवों के व्यक्तित्व को अकेले गढ़ा। माता यशोधरा ने अपने पति सिद्धार्थ के गौतम बुद्ध बन जाने के बाद राहुल की जो परवरिश की, उसका साक्षात प्रमाण है कि उन्होंने अपने इकलौते पुत्र को अपने पति के साथ उनके ही मार्ग पर भेज दिया।
भक्त प्रह्लाद की माता, ध्रुव की माता—इन सबने अपनी संतान को अपने स्नेह बंधन में नहीं बाँधा, बल्कि उनके स्वतंत्र व्यक्तित्व के विकास में सहायक बनीं।
इसलिए कहा गया है—“माँ बालक की प्रथम गुरु होती है।”
याद रखिए, बच्चे हर समय माँ को देखते हैं। वह कैसे संबंध निभा रही है, कैसे आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता से निर्णय ले रही है, कैसे सभी कार्यों को संतुलित कर रही है, और कैसे मुश्किलों में मजबूत हो रही है—ये सब बच्चे सीखते हैं।
निराश, कुंठित, डरी, सहमी, परनिर्भर और अशिक्षित स्त्री अपने माँ के स्वरूप में जाने-अनजाने यही गुण स्थानांतरित कर रही होती है।
अभिमन्यु का उदाहरण हमारे सामने है कि माँ की मनोदशा का गर्भ में भी बच्चे पर गहरा और अमिट प्रभाव होता है।
बच्चा सबसे ज्यादा माँ के करीब होता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि आप अपना गुस्सा, चिड़चिड़ापन, कुंठा, ग्लानि, संकोच और नकारात्मक सोच अपने बच्चों को दे रही हैं?
जीवन में चाहे जो परिस्थितियाँ मिलें, संतान को सकारात्मक रूप में ढालना ही माँ होना है।
सम्पूर्ण माँ बनिए, आधी-अधूरी माँ अपने संतान को भी वैसा ही बना पाएगी। यह बात कड़वी है , किन्तु सत्य है।
खुद को जलन, आक्रोश, अपेक्षा, परनिर्भरता, अति-वैचारिकता, अनिर्णय, ढुलमुल जीवन-शैली, निराशा, उदासी, कुंठा, क्लेश, फैशन और केवल साज-सज्जा से बाहर निकालिए।
शिक्षित, आत्मनिर्भर, सकारात्मक, कला एवं कौशल में निपुण, विचारशील, संवेदनशील, आधुनिक, सामंजस्य बैठाने वाली और जीवंत बनाइ ए।
आपको कुछ करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी—आपके बच्चे स्वयं वैसे ही बन जाएंगे जैसे आप उन्हें दिखेंगी। (लेखिका के अपने विचार हैं)

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