
लेखिका : ममता सिंह राठौर
कानपुर (उत्तर प्रदेश)
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खेल चल रहा था
फूल और कांटों का मेल चल रहा था
सन्नाटें में शोर चल रहा था
मन के भीतर चोर चल रहा था
जानकर भी वो अनजान चल रहा था
वो खुद के डर को निडर कह रहा था
एक दूर रास्ता इंतजार कर रहा था
कोई तो था जो साथ चल रहा था
किसी को आग से डर लग रहा था
कोई जला कर मजा ले रहा था
वो दर्द का इम्तहान ले रहा था
दरों दीवार को एहसास हो रहा था
अब वक्त बोलता जा रहा है
जितने छुपे थे राज अब खोलता जा रहा है