अब तो रहम करो

लेखिका : लता अग्रवाल
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान)
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भाजपा सरकार देश को बर्बाद करने के साथ ही एक पूरी युवा पीढ़ी को तबाह करने पर तुली है। 2026 नीट का पेपर लीक हो गया। अभिभावक अपने खून पसीने की कमाई से अपने बच्चों को पढ़ाते हैं ताकि वह बड़े होकर अफसर बने। मध्यमवर्ग जमीन व गहने गिरवी रखता है और अपने बच्चों को पढाता है, श्रमिक वर्ग अपनी दिहाड़ी से अपना पेट काटकर अपने बच्चों को पढ़ाता है। प्रतिभावान बच्चे भी दिन रात मेहनत करते हैं। उनका खाना पीना तक छूट जाता है, कुछ बच्चे तो परीक्षा के तनाव से अवसाद में आ जाते हैं। जिन गरीब के घर में लाइट नहीं है लालटेन व चिमनी से पढ़ते हैं। परीक्षा की तैयारी में जी-जान से लगे रहते हैं। परीक्षा की तिथि घोषित होते ही वे और कठिन परिश्रम करने लगते हैं। उनके साथ-साथ अभिभावक भी अपने बच्चों की देखभाल, खान-पान का विशेष ध्यान रखते हैं‌ और जब सब तैयार है तो पेपर लीक हो जाता है। एकदम से विद्यार्थी व अभिभावकों को सदमा लगता है कई विद्यार्थी तो अवसाद में आ जाते हैं कोई-कोई तो आत्महत्या भी कर लेते हैं।
मैं सरकार से ये जानना चाहती हूं कि नेताओं के कार्यक्रम की भनक तक नहीं लगती, सांसद, विधायक की सुरक्षा इतनी कड़ी होती है कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता है। सरकार पेपर की भी इतनी कड़ी व्यवस्था नहीं कर सकती है क्या? बाईस लाख विद्यार्थी के साथ-साथ उनके परिवार वाले भी पीड़ित हैं उनके बच्चों की पीड़ा सहनी पड़ रही है। मोदी जी इतना बोलते हैं कि जनता उनके भाषण सुनकर ऊब चुकी है क्योंकि देश व जनता की तो उन्हें कोई परवाह ही नहीं है। वो केवल अपने घुमने फिरने की जुगाड में लगे रहते हैं। उनके भक्तों को राजनीति संरक्षण में रखते हैं‌। पेपर लीक मामले में भी मोदी जी के चहेते बीजेपी नेता दिनेश विवाल और मोहम्मद जुबेर ने मिल कर तीस लाख रू में पेपर खरीदा और बाईस लाख विद्यार्थियों के भविष्य को अधर में लटका दिया।
पूरे मीडिया में कहीं भी इन दोनों का कहीं जिक्र नहीं है बस ये कह रहें है अपराधी पकड़े गए हैं। हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या, अवैध कारोबार, घोटाले, दुष्कर्म सभी को राजनीति संरक्षण प्राप्त है। क्या इंसान को पैसे का लालच इतना लग चुका है कि बच्चों के भविष्य से ही खिलवाड़ कर दिया। पैसा
उनके नैतिक पतन व जीवन मूल्यों से ज्यादा महत्वपूर्ण है। अगर सरकार ने कठोर कदम नहीं उठाए तो आगे भी यह सिलसिला यूँ ही जारी रहेगा। (लेखिका के अपने विचार हैं)

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